Billionaire Empire System – Chapter 811
झोपड़ी पहुँचकर उसने क़ासिम भाई को खाट पर लिटाया। सीता देवी फौरन उठकर आईं, हाथ में गंगाजल का लोटा। पिंकी ने पीछे से जला हुआ हींग का टुकड़ा लाकर ज़ख़्म पर पकड़ा। उसकी आवाज़ ज़रूर हल्की काँप रही थी, पर हाथ नहीं काँप रहे थे।
"बेटा, धीरे…" सीता देवी बोलीं। "ये घाव दो दिन पुराना लग रहा है।"
"कुछ नहीं हुआ," क़ासिम भाई ने कहा, पर उनकी आवाज़ बैठी हुई थी।
रवि ने पानी से घाव धोया और सफ़ेद पट्टी बाँधी। माँ ने चूल्हे पर पानी गरम किया। पिंकी बैठकर क़ासिम भाई का हाथ पकड़े रही — जैसे उसे लग रहा हो कि छोड़ देगी तो बूढ़ा हवा में उड़ जाएगा।
रवि क़ासिम भाई के सामने पत्थर पर बैठ गया और सीधा मुँह देखकर पूछा —
"आपने कहा कि मेहरा आज रात ही बोलेगा। कैसे?"
क़ासिम भाई ने आँखें बंद कीं और कुछ देर साँस लेते रहे। फिर बोले, धीरे-धीरे, जैसे पुरानी किताब के पन्ने उलट रहे हों।
"दस साल में मैंने सिर्फ़ एक चीज़ की है, रवि। इंतज़ार।"
"और?"
"और एक काम किया।" उन्होंने आँखें खोलीं। "मेहरा के पास एक टेप है। पुरानी वाली कैसेट। उसमें ज़ुबैर का फ़ोन है — वो फ़ोन जो मेरे बेटे ने अपने डर के मारे उस रात रिकॉर्ड कर लिया था। ज़ुबैर की आवाज़ है उसमें। 'अशोक का इलाज हो चुका है' — यही टेप।"
रवि की साँस रुक गई। "तो वो टेप आपके पास क्यों नहीं?"
"क्योंकि मेरा बेटा उसे अपनी जान की गारंटी समझता है।" क़ासिम भाई का स्वर चटक गया। "वो सोचता है, जिस दिन उसने टेप किसी को दिया, उस दिन ज़ुबैर उसे मिटा देगा। और मैं उसे दोष नहीं देता, रवि। उसने वहाँ अशोक का खून अपनी आँखों से देखा था। तेरह साल का लड़का था।"
झोपड़ी में चूल्हे की लपट चटकी। पिंकी ने अपना हाथ और कसकर पकड़ लिया।
"तो आपने उसे क्या भेजा?" रवि ने पूछा।
क़ासिम भाई ने अपनी धोती की जेब से एक छोटा काग़ज़ निकाला — कार्बन पेपर पर उतारी कॉपी, जिसके कोने मैले थे।
"आज सुबह। एक आदमी से भिजवाई है। शब्द मैंने खुद चुने हैं।" उन्होंने काग़ज़ रवि की तरफ़ सरकाया।
रवि ने पढ़ा — "मेहरा। माँ की तरह कह रहा हूँ। अगर तू आज रात खुद नहीं आया, तो कल सुबह मैं वो सारी बात पुलिस ने बता दूँगा जो मैं दस साल से सीने में लिए बैठा हूँ। तेरे पास सिर्फ़ एक रात है। — बाबा।"
"बाबा?" रवि ने पूछा।
"वो मुझे बचपन में 'बाबा' ही कहता था," क़ासिम भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक किसी और उम्र से आने लगी। "दस साल बाद मैंने खुद को फिर 'बाबा' लिखा।"
रवि ने काग़ज़ मोड़कर रखा। "तो क्या वो आएगा?"
क़ासिम भाई ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने दीवार की तरफ़ देखा। झोपड़ी की टूटी दीवार पर, जहाँ लकड़ी का एक टुकड़ा ठुका हुआ था, एक पुरानी फ़ोटो टँगी थी — धुँधली, पीली, जिसमें स्कूल की वर्दी में एक दुबला-पतला लड़का खड़ा था, हाथ में स्लेट, आँखों में वो चमक जो बड़े होकर सिर्फ़ बच्चों की किताबों में दिखती है।
क़ासिम भाई की आँखें भर आईं।
"आएगा," उन्होंने कहा। "वो मेरा बेटा है। दस साल से सिर्फ़ मेरी आवाज़ सुनने को तरसा है। ज़ुबैर उसे डॉक्टर बना सकता था, पैसा दे सकता था — पर माँ-बाप की आवाज़ कोई नहीं खरीद सकता। वो आएगा।"
वो थोड़ी देर चुप रहे। फिर बोले — धीरे, जैसे खुद से बात कर रहे हों।
"मैंने उसे डॉक्टर बनाया था, रवि। इंसान नहीं बना पाया।"
रवि को कुछ समझ नहीं आया कि क्या कहे। उसने सिर्फ़ हाथ बढ़ाया और बूढ़े का झुर्रियों वाला ठंडा हाथ पकड़ लिया। क़ासिम भाई ने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ अपना दूसरा हाथ उसके हाथ पर रख दिया।
सीता देवी ने पीछे से आकर कहा, "चाय बना दूँ? रात लंबी है।"
"बना दो, माँ," रवि ने कहा। "पर आज आप ज़्यादा देर मत जागना। आपकी साँस…"
"मेरी साँस इतनी सस्ती नहीं है," सीता देवी ने कहा और चूल्हे की तरफ़ मुड़ गईं।
लुट्टन आठ बजे आया, हाथ में पान का डिब्बा और पीछे-पीछे रघु। दोनों के चेहरे पर धूल थी — रघु कह रहा था कि बस्ती की तरफ़ सफ़ेद कुर्ते वाले घूम रहे हैं।
"यार रवि," लुट्टन ने डिब्बा खटखटाया, "ज़ुबैर का आदमी गली में खड़ा है, और मुझे देखकर मुस्कुराया। मैंने कहा — भाई साहब, पान खाओगे? वो बोला, तेरा पान तो कड़वा है। मैंने कहा — ज़िंदगी की तरह।" वो हँसा, पर हँसी में डर था।
रवि ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "आज रात बस यहाँ रुक जाओ।"
"यहीं सोऊँगा," लुट्टन ने कहा। "पर तेरी झोपड़ी की ज़मीन कड़वी है, यार — पत्थर जैसी।"
"तो पान के पत्ते बिछा ले," पिंकी ने कहा और सब हँस पड़े — पहली बार उस रात।
नौ बजे माँ ने सबको खिचड़ी परोसी। रवि ने दो कौर खाए और उठ गया। बाहर आकर उसने घड़ी निकाली। टिक-टिक चल रही थी, बिना रुके। उसने कान से लगाया — सिर्फ़ टिक-टिक। वो आवाज़, वो बूढ़ी औरत वाली आवाज़, अब नहीं थी।
सवा नौ बजे क़ासिम भाई ने उसे पास बुलाया। बूढ़े ने उसका हाथ पकड़ा और कान में कहा —
"जब वो आए, तो उससे कुछ मत माँगना। अपनी माँ के लिए भी नहीं। सिर्फ़ इतना कहना — 'मेहरा साहब, आपके बाबा आपका इंतज़ार कर रहे हैं।' बाकी वो खुद कहेगा।"
"और अगर वो ज़ुबैर के साथ आया?"
"तो भी इतना ही कहना।" क़ासिम भाई की आवाज़ में वो शांति फिर आ गई। "मेरा बेटा अगर ज़ुबैर के साथ आया, तो वो मेरा बेटा नहीं है। और तब ये बूढ़ा उसी रात मर जाएगा — पर तेरा काम हो जाएगा।"
"आप ऐसी बात मत कीजिए।"
"मैं बूढ़ा हूँ, रवि।" उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की, पर होंठ सिर्फ़ काँपे। "बूढ़ों को अपनी बात कहने दिया कर।"
दस बजे की सुई अब क़रीब थी। सीता देवी, पिंकी और लुट्टन खाट के पास बैठे थे। लुट्टन बार-बार बाहर झाँक रहा था। रघु दरवाज़े पर खड़ा था, कान बाहर की तरफ़।
रवि झोपड़ी के सामने पत्थर पर बैठा था। उसके हाथ ठंडे थे। उसने घड़ी फिर निकाली और उसके काँच पर उंगली फेरी।
"पापा," उसने धीरे से कहा, "अगर आप सुन रहे हैं, तो आज रात मुझे बहादुर मत बनाइए। बस ईमानदार बनाइए।"
झींगुर बोल रहे थे। दूर कहीं कुत्ता भौंका और चुप हो गया।
दस बजकर सात मिनट पर — दरवाज़े पर दस्तक हुई।
तीन धीमी थपकियाँ। इतनी धीमी कि जैसे कोई हाथ उठाने में डर रहा हो।
लुट्टन उठा, पर रवि ने हाथ से रोक दिया। रवि खुद दरवाज़े तक गया। उसने कुंडी खोली और दरवाज़ा खींचा।
बाहर चाँदनी में एक आदमी खड़ा था। सफ़ेद कोट, जिसकी जेब पर नीली स्याही से नाम लिखा था, और हाथ में एक पुरानी कैसेट — काली, चिपचिपी, जिस पर धूल जमी थी। उम्र चालीस के आसपास। चेहरा पतला, आँखों के नीचे गड्ढे, और वो आँखें — वो आँखें रवि ने कहीं देखी थीं। टूटी दीवार पर टँगी उस धुँधली फ़ोटो में।
आदमी रो रहा था। चुपचाप, बिना आवाज़। सिर्फ़ आँसू, जो ठुड्डी तक आकर गिर रहे थे।
"बाबा…" उसने कहा, और आवाज़ टूट गई। "मैं आ गया।"
क़ासिम भाई खाट पर बैठ गए थे। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और उसे अपनी धोती पर रख दिया। फिर उन्होंने हाथ आगे किया — बस हाथ, कुछ नहीं कहा। मेहरा ने दरवाज़ा पार किया और सीधे उस हाथ की तरफ़ चला, जैसे तेरह साल का लड़का अपने बाप के पास लौट रहा हो।
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