Billionaire Empire System – Chapter 810
दस्ताने वाला आदमी रुका, कुछ सोचा, और फिर अपने आदमियों को इशारा करके पीछे हट गया। जाते-जाते उसने रवि की तरफ़ देखा और कहा, "चाय वाले, साहब ने तुम्हें तीन दिन दिए हैं। उन्हें बर्बाद मत करना।"
वो चले गए। पुल के नीचे सिर्फ़ कीचड़ की गंध रह गई, और क़ासिम भाई की साँस।
रवि दौड़कर उनके पास पहुँचा और घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपनी जेब से रुमाल निकाला — गीला, मैला — और बूढ़े के होंठ पर लगाया। उनके हाथ ठंडे थे।
"आप ठीक हैं?" रवि की आवाज़ फट रही थी।
क़ासिम भाई ने उसकी तरफ़ देखा। चश्मा टूटा नहीं था, पर कीचड़ से ढँका था। उन्होंने धीरे से उसे उतारा और रवि की तरफ़ देखा — बिना चश्मे के, पहली बार। छोटी, धँसी आँखें। और उनमें पानी था।
"तू आया," क़ासिम भाई ने फुसफुसाया। "मैंने सोचा था तू भाग जाएगा। मैंने तो तुझसे कहा था — जा।"
रवि ने उनका सिर अपने घुटने पर रख लिया और उनके घाव पर रुमाल दबाया।
"भागना मेरे पापा ने सिखाया नहीं था," उसने कहा।
क़ासिम भाई हँसे — इस बार वो हँसी सूखी नहीं थी, थोड़ी गीली थी। उन्होंने रवि का हाथ पकड़ा और कहा, "पापा नहीं… ये तो तेरी माँ का सिखाया है। वो भी जब गिरती थी, तब हँसती थी।"
रवि ने अपना सिर नीचे किया। उसकी आँखों में कुछ जल रहा था, पर उसने उसे आने नहीं दिया। उसने अपनी आवाज़ सँभाली और पूछा, "आपने कहा कि मेहरा आज रात बोलेगा। कैसे?"
क़ासिम भाई ने उसकी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो शांति लौट आई जो टूटने के बाद आती है।
"दस साल," उन्होंने कहा। "दस साल मैंने इस शहर के श्मशान के पास एक झोपड़ी में बैठकर सिर्फ़ एक चीज़ की है। मेहरा के पास एक टेप है। उस टेप में ज़ुबैर की आवाज़ है — उसी रात की, जब उसने फ़ोन पर किसी को कहा था, 'अशोक का काम हो जाए, काग़ज़ क़ासिम के पास हैं।' मेहरा ने वो टेप अपने बेटे की जान की गारंटी समझकर छिपाकर रखा है।" वो रुके और साँस ली। "और आज सुबह मैंने उसे एक चिट्ठी भेजी है। माँ की तरह लिखी है — कि अगर तू आज रात खुद नहीं आया, तो मैं सारी बात पुलिस को बता दूँगा।"
रवि ने नीचे कीचड़ में पड़ा पन्ना उठाया और साफ़ किया। उस पर पापा की लिखाई थी — वो नाम, जो उसने गंगा पुल पर पहली बार पढ़ा था।
"तो क्या वो आएगा?" रवि ने पूछा।
क़ासिम भाई ने आसमान की तरफ़ देखा। पुल के नीचे से आसमान सिर्फ़ एक पतली पट्टी जैसा दिखता था, जिसमें तीन तारे टिमटिमा रहे थे।
उनकी आँखें भर आईं।
"आएगा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई। "वो मेरा बेटा है, रवि। कितना ही बड़ा हो जाए, अपने बाप की चिट्ठी पढ़कर वो आएगा। मुझे बस डर है… कि ज़ुबैर उसे आने से पहले रोक न दे।"
रवि ने उन्हें उठाया। क़ासिम भाई का पूरा वज़न उसके कंधों पर आ गया — बूढ़ा, हल्का, जैसे सूखी लकड़ी। रवि ने उनका एक हाथ अपने गले में डाला और कीचड़ से बाहर खींचा।
"आपकी झोपड़ी चलिए," उसने कहा। "घाव धोना है।"
"और तेरी माँ?"
"माँ क़ासिम भाई के पास हैं," रवि ने कहा। "वो सबसे सुरक्षित जगह है जो मेरे पास है।"
वो दोनों पुल के नीचे से निकले। रास्ते में क़ासिम भाई ने एक बार पीछे मुड़कर देखा, जहाँ गाड़ी खड़ी थी। उन्होंने धीरे से कहा, "रवि, एक बात याद रखना। जब वो आए, तो उससे कुछ मत माँगना। उसके पास जो कुछ है, वो खुद देगा। बस उससे कहना — 'मेहरा साहब, आपके पापा आपका इंतज़ार कर रहे हैं।'"
रवि ने सिर हिलाया। उसकी जेब में घड़ी थी, और उसके अंदर कुछ था जो उसने पहले महसूस नहीं किया था — एक हल्की सी गर्माहट, जैसे घड़ी के अंदर कोई दिल धड़क रहा हो।
झोपड़ी पहुँचकर उसने क़ासिम भाई को खाट पर लिटाया और गंगा-जल से उनका घाव धोया। बूढ़े की साँस धीरे-धीरे सामान्य होने लगी। सीता देवी पास में बैठी थीं और उनका हाथ पकड़े हुए थीं। पिंकी ने एक कोने से कपड़ा लाकर रवि को दिया।
रवि बाहर निकला और झोपड़ी के सामने पत्थर पर बैठ गया। आसमान अब हल्का हो रहा था — पूरब में एक पतली लाल लकीर। उसने घड़ी को हाथ में लिया। वो चल रही थी। पर उसकी सुइयाँ अब कुछ अजीब कर रही थीं — आगे-पीछे, आगे-पीछे, जैसे कोई जवाब दे रहा हो।
फिर उसकी उँगलियाँ फिसलीं, और घड़ी उसके हाथ से छूटकर नीचे पत्थर पर गिरी।
छन्।
और उस आवाज़ के ठीक बाद, रवि ने अपनी पीठ सीधी कर ली — क्योंकि घड़ी से वो आवाज़ आई जो उसने कभी नहीं सुनी थी। कोई औरत थी। बहुत बूढ़ी, बहुत धीमी, चाय की केतली की सीटी जैसी मीठी:
"बेटा… आज रात खुद पर भरोसा रखना। वो आएगा। पर उसके साथ कोई और भी आएगा।"
रवि ने घड़ी उठाई और उसे अपने कान से लगाया। अब सिर्फ़ टिक-टिक। बस टिक-टिक। उसने चारों तरफ़ देखा — कोई नहीं था। सिर्फ़ पूरब में फैलती सुबह, और दूर श्मशान की तरफ़ से उड़ता एक कौआ।
तभी झोपड़ी के दरवाज़े पर क़ासिम भाई की आवाज़ आई, टूटी पर साफ़:
"रवि… ज़रा आना। उसने जवाब भेज दिया है।"
रवि अंदर गया। क़ासिम भाई के हाथ में एक काग़ज़ था, जिस पर किसी ने जल्दी में कुछ लिखा था — स्याही अभी भी गीली थी, जैसे अभी लिखकर भेजा गया हो।
रवि ने उसे पढ़ा। सिर्फ़ एक लाइन थी:
"आज रात दस बजे, वही जगह — जहाँ पापा मरे थे। अकेले आना।"
क़ासिम भाई ने रवि की तरफ़ देखा और फुसफुसाए, "वो जगह…"
रवि ने काग़ज़ अपनी मुट्ठी में भींच लिया और खिड़की से बाहर देखा, जहाँ सुबह की पहली किरण श्मशान की दीवार पर पड़ रही थी।
"मुझे पता है," उसने कहा। "वो जगह।"
॥
गाड़ी की लाइट सामने से आई और सारा कीचड़ चमक उठा। रवि के हाथ से घड़ी फिसलते-फिसलते बची, क्योंकि उसने उसे सीने से चिपका लिया था। खिड़की से ज़ुबैर की आवाज़ आई — और वो आवाज़ उतनी ठंडी नहीं थी, जितनी हमेशा होती थी। उसमें कुछ टूटा हुआ था।
"बूढ़े, तूने मुझे धोखा दिया… तेरा बेटा मेहरा कल सारी कहानी पुलिस को बता देगा।"
क़ासिम भाई पुल के नीचे खड़े थे। उनका हाथ रवि के कंधे पर था, दूसरा हाथ कीचड़ में लगी अपनी लाठी पर। उन्होंने गाड़ी की तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने सिर्फ़ उस अंधेरे को देखा जहाँ से आवाज़ आ रही थी, और बहुत धीरे से कहा —
"तो सुन ले, ज़ुबैर। मेहरा कल नहीं… आज रात ही बोलेगा।"
गाड़ी के अंदर एक पल के लिए बिलकुल चुप्पी छा गई। फिर खिड़की चढ़ी, गाड़ी की लाइट फिर आँखों में आई, और इंजन की आवाज़ दूर होती गई।
रवि के सिर में एक झटका आया। उसने आँखें बंद कीं और सिर हिलाया। क़ासिम भाई की आवाज़ में वो धमकी नहीं थी — नहीं, कुछ और था। एक शांति, जैसे कोई बहुत पहले से तय कर चुका हो कि अब सब कुछ रात को होना ही है। जैसे किसी ने टाइमर सेट कर दिया हो और अब उसे बंद करने का कोई बटन नहीं।
"क़ासिम भाई… आपने ऐसा क्यों कहा?"
"क्योंकि वो सच है," बूढ़े ने कहा। "अब चल, यहाँ खड़े रहेंगे तो बात अधूरी रह जाएगी।"
रवि ने झुककर क़ासिम भाई को कंधे पर उठाया। बूढ़ा हल्का था, पर रवि की टाँगें अब भी काँप रही थीं। पुल के नीचे से निकलते वक़्त एक बार ठंडी हवा आई, और रवि को लगा कि उसकी पीठ पर कोई नज़र है। उसने पलटकर देखा — सिर्फ़ अंधेरा।
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