Billionaire Empire System – Chapter 809
रवि रेंगकर पुल के खंभे की और सरक गया, अंधेरे में, कीचड़ में, साँस रोककर। उसने अपनी कलाई दबाई — घड़ी वहीं थी, वहीं चल रही थी। फिर उसकी उँगलियाँ फिसलीं, और घड़ी उसकी कलाई से छूटकर पत्थर पर गिरी।
छन्।
और उस घंटी जैसी आवाज़ के ठीक बाद, उसी छोटी चाँदी की घड़ी से एक आवाज़ आई — जो उसने पहले कभी नहीं सुनी थी। बहुत धीरे, बहुत गहरी, किसी दूर के कुएँ में गूँजती आवाज़:
"बेटा… सँभल।"
रवि की पीठ खंभे से चिपक गई। ऊपर से पत्थरों पर पाँव उतरने लगे, और उनके बीच एक आवाज़ साफ़ सुनाई दी — कोई चमड़े का दस्ताना पहने हुए आदमी, जो बहुत शांत था, बिलकुल शांत।
"बूढ़े, साहब ने कहा है — पन्ना दे दे, और अपनी उस बही का सारा सच पेट में दबा ले।"
रवि ने अपनी मुट्ठी भींची। कीचड़ उसकी अँगुलियों के बीच से फिसल रहा था, और उसका पूरा शरीर चेतावनी दे रहा था — भाग जा, भाग जा — पर उसने पाँव नहीं हिलाए। उसने सिर्फ़ अपनी जेब में हाथ डाला, जहाँ एक छोटी सी चीज़ थी। और उसने अपनी आँखें बंद करके वो आवाज़ सुनी जो उसकी अपनी घड़ी ने अभी-अभी बोली थी।
क़ासिम भाई ने ऊपर देखा। उनके हाथ में अब भी वो पन्ना था, और रवि ने दूर से देखा कि बूढ़े के चेहरे पर डर नहीं है। बस एक अजीब सी शांति है, जैसे कोई दस साल का लंबा इंतज़ार आख़िर खत्म हो रहा हो।
"मेरा बेटा," क़ासिम भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कोई हँसी फूटी। "मेरे बेटे को तुम लोग पहले ही मार चुके हो। जिस दिन उसने अपने हाथों में अशोक का खून देखा, उसी दिन वो खत्म हो गया। अब मेरे पास देने को कुछ नहीं, सिवाय—"
उन्होंने पन्ना ऊँचा करके, ऊपर से आ रही उन गाड़ियों की रोशनी में, सबके सामने बोला — "—सिवाय एक सच्चाई के, जो अब पूरे शहर में नहीं गूँगी।"
चटाक।
थप्पड़ की आवाज़ पुल के नीचे गूँज गई, और क़ासिम भाई साथ ही पत्थरों पर लुढ़ककर गिरे। रवि ने अपना मुँह अपनी हथेली से दबाया, नहीं तो चीख निकल जाती। उसने गिरते हुए बूढ़े को देखा — छड़ी, चश्मा, बही का पन्ना, सब ऊपर हवा में। फिर देखा कि क़ासिम भाई अपनी कोहनी पर उठे, होंठ फटा, और फिर भी हँसे — सूखी, कटी हुई, डरावनी हँसी।
रवि ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसके हाथ की मुट्ठी और भींच गई। उसकी साँस रुक गई, जैसे अंदर कुछ ठंडा बन रहा हो। और जब उसने आँखें खोलीं, तो उसके चेहरे पर वो नहीं था जो डर के वक़्त होता है।
उसने अपनी जेब से घड़ी निकालकर अपनी बाएँ हाथ में पहनने की जगह मुट्ठी में ले लिया, और उसी पल, उसके कान के अंदर एक छोटी चटपटी आवाज़ बोली।
"नया मिशन: क़ासिम को ज़िंदा निकालो। इनाम: तीन हज़ार पॉइंट।"
रवि ने पत्थरों के बीच से ऊपर देखा, जहाँ पाँच सफ़ेद कुर्ते वाले उस झुके बूढ़े को घेरकर खड़े थे, और उनमें से एक ने हाथ बढ़ाकर उस पन्ने की तरफ़ हाथ बढ़ाया। और रवि ने अपने मुँह से बस इतना कहा, धीरे से, अपने ही सीने में —
"अब मैं नहीं छिपूँगा।"
॥
घड़ी की वो आवाज़ रवि के कानों में अब भी गूँज रही थी — "बेटा… सँभल।" — जब ऊपर पुल की सड़क पर तीन गाड़ियों के दरवाज़े एक साथ खुले। धड़… धड़… धड़… जूते पत्थरों पर उतरने लगे। रवि ने अपनी पीठ खंभे से और चिपका ली और साँस अंदर ही रोक ली। कीचड़ उसके घुटनों तक था, ठंडा और बदबूदार।
पाँच आदमी उतरे। सब सफ़ेद कुर्ते में। उनके बीच से एक आदमी आगे बढ़ा, जिसके हाथ पर चमड़े का दस्ताना था। उसकी आवाज़ बहुत शांत थी, जैसे कोई बाज़ार में भाव तैया कर रहा हो।
"बूढ़े, साहब ने कहा है — बही का आख़िरी पन्ना दे दे। और बदले में…" उसने रुककर क़ासिम भाई की तरफ़ झुककर देखा, "तेरा बेटा ज़िंदा रहेगा।"
क़ासिम भाई पत्थरों पर बैठे थे, एक हाथ में पन्ना, दूसरे में छड़ी। उन्होंने धीरे से सिर ऊपर किया। और फिर वो हँसे। रवि ने उन्हें पहले कभी ऐसे नहीं हँसते देखा था — सूखी, कटी, किसी पुराने ज़ख़्म से निकलती हँसी।
"मेरा बेटा?" क़ासिम भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो हँसी अभी भी काँप रही थी। "मेरा बेटा तो दस साल पहले ही मर गया था। जिस दिन उसने अपने हाथों में अशोक का खून देखा, उसी दिन वो खत्म हो गया। तुम लोग जिसे बचाने की बात कर रहे हो, वो सिर्फ़ एक लाश है जो अभी साँस ले रही है।"
दस्ताने वाले आदमी का हाथ उठा।
चटाक!
आवाज़ पुल के नीचे गूँज गई। क़ासिम भाई पत्थरों पर लुढ़क गए, पन्ना उनके हाथ से छूटकर कीचड़ में गिरा। रवि ने अपनी हथेली अपने मुँह पर दबा ली, नहीं तो चीख निकल जाती। उसने देखा कि बूढ़े के होंठ फट गए हैं, और खून की एक पतली लकीर ठुड्डी से बह रही है।
पर क़ासिम भाई फिर हँसे। एक कोहनी पर उठकर, कीचड़ में, होंठ फटे हुए, वो फिर हँसे।
"मारो," उन्होंने कहा। "मारते रहो। ये पन्ना तुम्हारे हाथ नहीं आएगा। और जिस दिन ये बाहर आया, उस दिन तुम्हारा साहब भी इसी कीचड़ में होगा।"
तभी रवि के कान के अंदर वो छोटी चटपटी आवाज़ बोली।
"नया मिशन: क़ासिम को ज़िंदा निकालो। इनाम: तीन हज़ार पॉइंट। चेतावनी — एक साथ दो शक्ति नहीं चलेंगी।"
रवि ने आँखें बंद कीं। उसकी मुट्ठी में घड़ी थी, ठंडी, धड़कती हुई। उसने एक गहरी साँस ली — वो साँस जो वो हर बात से पहले लेता था — और अपने पैर कीचड़ से खींचकर ऊपर उठा।
उसने पास में पड़ा लोहे का एक टुकड़ा उठाया, जो पुल की ज़ंग लगी रेलिंग से टूटा था। और वो पत्थरों पर चढ़कर सामने आ गया।
"छोड़ो उन्हें।"
पाँचों आदमी पलटे। दस्ताने वाले ने आँखें सिकोड़कर देखा।
"ये कौन है?"
"चाय वाला," रवि ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी थी, बिलकुल धीमी। "और मैं तुम्हारे साहब से बात करना चाहता हूँ। ये बूढ़ा मेरा रास्ता है। इसे छूना मत।"
दो आदमी आगे बढ़े। रवि ने लोहे का टुकड़ा उठाया, पर उसके हाथ काँप रहे थे — नहीं, काँप नहीं रहे थे, वो उस पूरी रात की थकान से काँप रहे थे। उसने अपनी नज़र दस्ताने वाले पर जमाई और कहा, "तुम्हारे साहब ने मुझे तीन दिन का वक़्त दिया है। अगर आज ये बूढ़ा मरा, तो वो तीन दिन तीन घंटे बन जाएँगे।"
दस्ताने वाले ने उसकी तरफ़ देखा। फिर क़ासिम भाई की तरफ़, जो अब भी कीचड़ में बैठे मुस्कुरा रहे थे। और फिर उसने अपना हाथ उठाया — नहीं, इस बार मारने के लिए नहीं, रोकने के लिए।
"छोड़ो," उसने कहा। "साहब खुद सुन लेंगे।"
उसी वक़्त ऊपर सड़क पर एक गाड़ी की लाइट चमकी और उसकी खिड़की से एक आवाज़ आई — पहली बार कुछ उखड़ी हुई, कुछ बेकाबू।
"बूढ़े!" वो ज़ुबैर की आवाज़ थी। "तूने मुझे धोखा दिया। तेरा बेटा मेहरा कल सारी कहानी पुलिस को बता देगा।"
रवि ने ऊपर देखा। गाड़ी की खिड़की से एक चेहरा झाँक रहा था — वही चेहरा जो स्क्रीन पर दिखा था। बूढ़ा। चश्मा। और उस आवाज़ में अब वो ठंडक नहीं थी, एक डर था। डर जो छिपाने की कोशिश में और साफ़ दिख रहा था।
क़ासिम भाई कीचड़ में बैठे रहे। उन्होंने अपना फटा होंठ ज़ुबाह से सहलाया और ऊपर देखकर कहा — धीरे, साफ़, हर शब्द अलग करके:
"तो सुन ले — मेहरा कल नहीं, आज रात ही बोलेगा।"
गाड़ी की खिड़की कुछ पल के लिए खुली रही। फिर एक हाथ बाहर आया, और रवि ने देखा कि वो हाथ काँप रहा है। फिर खिड़की बंद हो गई। गाड़ी के टायर चीखे और वो अंधेरे में गायब हो गई।
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