Billionaire Empire System – Chapter 807
बलवंत का चेहरा पत्थर हो गया। झूमर की रोशनी में उसकी आँखें एक पल के लिए असली लगीं — डरी हुई, बूढ़ी।
"अच्छा," उसने कहा। "तो ज़ुबैर साहब को ये भी बोल देना कि बलवंत राय अकेले भी दस साल का हिसाब चुका सकता है।" मुश्ताक़ जाने लगा तो उसने पुकारा। "और सुन। सुबह जो गली में जाए, वो बच्चों को ये बोले — रविवार को स्कूल बंद रहेगा। कोई बच्चा बाहर न निकले।"
मुश्ताक़ रुका। "स्कूल, सर?"
"हाँ। बच्चों की गली में डर बस जाए, तो माँ-बाप मैदान तक आएँगे ही नहीं।" बलवंत ने अपने हाथ की सफ़ेद क़मीज़ के कफ़ बटन पर उँगली फेरी। "ज़ुबैर को बताना कि मैं सिर्फ़ उसी की गोली से नहीं मरता। मैं चाल भी चल सकता हूँ।"
सुबह दस बजे की धूप में गली से एक आवाज़ गूँजी — तेज़, चौड़ी, दूर तक जाने वाली। रवि दुकान के अंदर बंडल बाँध रहा था कि आवाज़ सुनकर रुक गया। लुट्टन के हाथ में चाय की केतली थी; उसने केतली मेज़ पर रखी और सुराख़ से बाहर झाँका।
एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी गली के बीच खड़ा था, हाथ में मेगाफ़ोन, और ज़ोर से बोल रहा था, "सुन लो सब! रविवार को स्कूल बंद रहेगा। बच्चों को घर में रखो। बाहर निकला, तो माँ-बाप ज़िम्मेदार होंगे।"
गली के कोने पर खड़ी दो माँएँ सिर झुका कर सुन रही थीं। एक बच्चा दरवाज़े से झाँक रहा था। आवाज़ में इतनी धमक थी कि मानो पत्थर की दीवार पर पीतल मार रहे हों।
लुट्टन ने मुँह का पान एक तरफ़ किया, और उसका गोल चेहरा उस पल गंभीर हो गया, जैसा रवि ने उसमें शायद ही कभी देखा हो। वो बाहर गया, दुकान के पीले साइनबोर्ड के नीचे खड़ा हुआ, दोनों हाथ कमर पर रखे, और इतनी ज़ोर से बोला कि गली के आख़िरी घर तक पहुँच गई —
"जाओ, सबको बोल दो — प्रसाद चाय भंडार आज भी खुला है!"
गली में एक पल का सन्नाटा छाया। फिर कोने से किसी बूढ़े की आवाज़ आई — "और कल भी खुलेगा!" फिर शकुंतला ने सिर पर लाल दुपट्टा कसा और दुकान की तरफ़ आते हुए कहा, "साथ में मेरी भी दुकान खुलेगी, मैं यहीं बर्तन माँजूँगी!"
दादी कम्मो छड़ी टेकती हुई आईं, "अरे रे रे, मेरे ज़माने में भी कोई चाय वाले को डराता था, तो गली उलट जाती थी।" मौलवी साहब ने मस्जिद की सीढ़ी से सिर हिलाया। दर्ज़ी ने कैंची उठा ली, जैसे कह रहा हो — मेरी भी गिनती है।
सफ़ेद कुर्ते वाला मेगाफ़ोन लेकर खड़ा रह गया। एक आदमी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कहा, "चलो यहाँ से।" वो दोनों पीछे मुड़कर चले गए, पर जाते-जाते मेगाफ़ोन से एक आख़िरी बात फेंक गए — "रविवार का मैदान रद्द नहीं हुआ। वहाँ जो आएगा, उसका हिसाब वहीं होगा।"
रवि बाहर निकला। दुकान के बाहर लोग जुड़ चुके थे — बीस-पच्चीस चेहरे, सब उसकी तरफ़ देख रहे थे, जैसे पूछ रहे हों — अब क्या?
रवि ने लुट्टन की तरफ़ देखा। लुट्टन ने बस सिर हिलाया। रवि ने गली के बीच खड़े लोगों से कहा, "सुनो। ये डरने वाली बात नहीं, ये सुनने वाली बात है।" उसकी आवाज़ धीमी थी, पर हर शब्द साफ़। "जो स्कूल बंद करवा रहे हैं, वो जानते हैं कि बच्चे जब साथ खड़े होंगे, तो उनकी धमकी नहीं चलेगी। इसे हार नहीं, मानो उनकी तरफ़ से इकरार — कि वो डर गए हैं।"
लोगों की भीड़ में एक फुसफुसाहट चली। किसी ने कहा, "सही बोल रहा है।" किसी ने कहा, "पर बच्चों का क्या?" रवि ने जवाब दिया, "बच्चे सुबह नौ बजे मेरी दुकान पर इकट्ठे होंगे — कोई उन्हें छू नहीं सकता, इतनी गारंटी है। उसके बाद सब अपने-अपने घर के बड़ों के साथ मैदान चलेंगे। बच्चे आगे नहीं, बड़े आगे — पर कोई घर में नहीं छिपेगा।"
फिर कुछ ऐसा हुआ जो रवि ने नहीं सोचा था। शकुंतला ने अपने गले से एक पुरानी काली माला उतारी और रवि के हाथ में रख दी। "ये मेरे पति की थी," उसने कहा, "उन्होंने भी एक दिन सच बोला था, और उन्हें यही माला पहनाकर ले गए थे। अब तू पहन ले।"
रवि ने माला देखी, फिर शकुंतला के चेहरे पर। उसकी आँखों में पानी था, पर होंठ मज़बूती से बंद थे। रवि ने माला गले में पहन ली, और कुछ नहीं बोला। उसने सिर्फ़ शकुंतला के पैर छुए, जैसे किसी बड़े फ़ैसले की इजाज़त माँग रहा हो।
शकुंतला ने उसके सिर पर हाथ रखा, और गली की आवाज़ों के बीच सबसे साफ़ उसकी आवाज़ सुनाई दी — "अब तेरे पीछे तीन सौ घर खड़े हैं। किसी ने तुझे अकेला छोड़ा, तो मुझे मेरे पति की कसम।"
पूरे दिन गली में एक नई हलचल रही — दुकान से कुछ दूर, बेंचों पर बैठकर लोग पर्चे पढ़ रहे थे। कोई अक्षर जोड़ रहा था, कोई किसी को पढ़कर सुना रहा था। दादी कम्मो ने कहा, "अरे रे रे, मैं पढ़ना नहीं जानती, पर ये पर्चा मुझे मुँहज़बानी याद है।" और सच में, उसने पूरा पर्चा सुना दिया।
शाम होते-होते लुट्टन ने पर्चों के तीन और बंडल बाँधे और रवि की तरफ़ सरकाए। "बस्ती के लिए। अकरम ने कहा था, वहाँ तीन सौ घर हैं। तीन सौ घर मतलब कम से कम छह सौ हाथ।" उसने पान का पत्ता चबाया। "और यार, एक बात सोच — कल मैदान में अगर सब आ गए, तो उस मेगाफ़ोन वाले का क्या होगा?"
रवि मुस्कुराया। "वो भीड़ देखकर खुद ही मेगाफ़ोन नीचे रख देगा।"
"हाँ, और उसके बाद मेरी दुकान पर आकर पान माँगेगा।" लुट्टन हँसा, पर हँसी कुछ देर में सूख गई। उसने रस्सी धीरे से रखी और रवि के चेहरे की तरफ़ देखा। "सच बता, यार। कल कितना डर है?"
रवि ने माँ की तरह एक गहरी साँस ली, अपनी आदत से। "उतना ही, जितना उस दिन था जब पापा की दुकान पर पहली बार टीवी नरेंद्र आया था।" उसने कलाई पर बंधी चाँदी की घड़ी देखी। "फ़र्क़ ये है कि उस दिन मेरे पास सिर्फ़ चाय की केतली थी। आज गली है।"
लुट्टन ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कुछ ऐसा कहा जो उसने शायद ही कभी कहा हो, बिना किसी कहावत के। "तेरे साथ मैं हूँ ना। मैं पान नहीं बेच पा रहा, तो क्या हुआ। मैं तेरा पान वाला हूँ — कहीं भी चलूँगा।"
रवि ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने बस लुट्टन का हाथ पकड़ा और दोनों चुपचाप बैठे रहे। बाहर शाम की आख़िरी रोशनी दुकान के पीले साइनबोर्ड पर पड़ रही थी, और चाय की केतली अपनी धीमी सीटी बजा रही थी, जैसे कोई बूढ़ा सामने बैठकर कहानी सुना रहा हो।
फिर रवि की जेब में मोबाइल हिला।
उसने निकाला। अनजाना नंबर। मैसेज पढ़ते ही उसकी पीठ की हड्डियाँ जम गईं।
"कल शाम सात बजे, गंगा के पुल के नीचे, अकेले आना। तेरे पापा की बही का आख़िरी पन्ना मेरे पास है। — क़ासिम"
और उसके नीचे एक लाइन, जो और भी छोटी और और भी चुभने वाली थी —
"और अगर तू किसी को लाया, तो पन्ना नहीं, मेरी लाश मिलेगी।"
रवि ने स्क्रीन को दोबारा पढ़ा। उँगली से अक्षरों को छुआ, जैसे उन्हें मिटा देना चाहता हो। लुट्टन ने उसका चेहरा देखा और बिना पूछे समझ गया कि कुछ बड़ा हुआ है।
"क्या हुआ, यार?"
रवि ने मोबाइल जेब में रखा। उसने घड़ी की तरफ़ देखा — सुइयाँ चल रही थीं, बिना रुके, बिलकुल वैसे ही जैसे पापा होते तो चलती रहतीं।
"कुछ नहीं," उसने कहा, और मुँह फेरकर पर्चों का बंडल उठा लिया। "अभी नहीं। पहले बस्ती।"
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