Billionaire Empire System – Chapter 806
और इस तरह गली-गली, दुकान-दुकान, दरवाज़े से दरवाज़े तक — पर्चे उतरते गए। किसी ने पूछा, "क्या बोलना है?" रवि ने हर बार वही कहा — "कुछ नहीं। बस खड़े रहिए। खड़े होना ही काफ़ी है।" एक बूढ़ी अम्मा ने पर्चा हाथ में लेकर कहा, "मैं अक्षर नहीं जानती, बेटा।" रवि ने कहा, "कोई बात नहीं, अम्मा। आप सुबह दस बजे मेरी आवाज़ की तरफ़ आ जाइए।"
पिंकी एक गली में रुक गई। "भैया," उसने धीरे से कहा, "ये सब करते हुए तुम्हें डर नहीं लगता?"
रवि ने कुछ देर सोचा। सच बोला। "लगता है। बहुत लगता है।"
"तो फिर?"
"डर से डरना नहीं होता, पिंकी। डर से रुकना होता है।" उसने उसके सिर पर हाथ रखा। "और मुझे अब भी तुझसे ज़्यादा डर… उस दिन लगा था, जब स्कूल के गेट पर वो सफ़ेद कुर्ते वाला खड़ा था। आज वो डर थोड़ा हल्का है।"
पिंकी ने अपनी मुट्ठी बाँधी और आगे बढ़ गई। "चलो। अगली गली मेरी है।"
शाम को सूरज बाज़ार की छतों पर झुका तो हवा ठंडी हो गई। दुकान के बाहर अब भी कुछ लोग खड़े थे — कोई पर्चा पढ़ रहा था, कोई बस बातें कर रहा था। लुट्टन ने दुकान के अंदर पुरानी बेंच पर पर्चों के तीन बंडल बाँधे, रस्सी को दो बार खींचकर गाँठ मारी, और पहला बंडल रवि की तरफ़ सरका दिया।
"सुबह के लिए," उसने कहा। "बस्ती वाले लिए। वहाँ अभी कोई नहीं गया।"
रवि ने सिर हिलाया। उसने घड़ी देखी — पापा की चाँदी की घड़ी, कलाई पर, चल रही थी।
तभी बाहर से चप्पलों की तेज़ आवाज़ आई — कोई दौड़कर आ रहा था — और दुकान के दरवाज़े पर एक किशोर लड़का रुका। बारह-तेरह साल का होगा, घुटनों तक फटी निक्कर, चेहरे पर धूल की परत, साँस इतनी फूली कि बोल नहीं पा रहा था।
लुट्टन उठा। "अरे, ये क़य्यूम का छोटा है… ठहर, ठहर। साँस ले।"
लड़का ने एक हाथ से दरवाज़े का चौखट पकड़ लिया। उसके हाथ में आधा जला हुआ पर्चा था — रवि का पर्चा, जिसका ऊपर का हिस्सा जल चुका था और नीचे की लाइन "सच सुनो, सच बोलो" अब भी साफ़ पढ़ी जा सकती थी।
"भैया," उसने हाँफते हुए कहा, "बलवंत का आदमी हमारी बस्ती में पर्चे जला रहा है। सबको डरा रहा है — बच्चों को भी।" उसने एक गहरी साँस भरी, जैसे अगली बात बोलने से पहले खुद को तैयार कर रहा हो। "और वो कह रहा है कि रविवार को जो मैदान में गया… उसकी लाश वहीं से उठेगी।"
दुकान के अंदर सन्नाटा छा गया। लुट्टन के हाथ से रस्सी छूट गई और बंडल खुल गया — पर्चे ज़मीन पर बिखर गए। पर किसी ने उन्हें उठाया नहीं।
रवि ने जला हुआ पर्चा लड़के के हाथ से लिया, उसे उँगलियों से सीधा किया, और दीवार पर लगे पर्चे के बगल में टाँग दिया।
"तेरा नाम क्या है?" रवि ने पूछा।
"अकरम, भैया।"
"अकरम, तूने डरकर भागकर आने का काम किया। समझता है, ये छोटा काम है?" रवि ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "बैठ। चाय पी। फिर तू मुझे बस्ती का रास्ता दिखाएगा — अभी, इसी वक़्त।"
लुट्टन ने एक पल रवि की तरफ़ देखा। फिर वो अपनी जगह से उठा, रस्सी वापस उठाई, और पर्चों का नया बंडल बाँधने लगा — इस बार ज़्यादा तेज़ी से, और उसके होंठ हिल रहे थे, किसी पुरानी कहावत की तरह।
अकरम ने चाय का पहला घूँट लिया और काँपना बंद कर दिया।
रवि ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी — सुइयाँ चल रही थीं, बिना रुके।
॥
अकरम के हाथ में चाय का कुल्हड़ अब भी काँप रहा था, और उसकी प्लेट में रखी बिस्किट टूटी पड़ी थी। लुट्टन ने रस्सी से पर्चों का दूसरा बंडल कसा और मुँह बनाकर रवि की तरफ़ देखा।
"यार, मेरी दुकान पर आज एक भी पान नहीं बिका। एक भी नहीं। लोग आते हैं, तेरे पर्चे की तरफ़ देखते हैं, सिर हिलाते हैं, और चले जाते हैं।" उसने पान का पत्ता मुँह में दबाया। "भगवान भी मुझे भूल गया है।"
रवि हँसा। हल्की हँसी, पहली बार कई दिनों में। "तेरी दुकान पर पान बिकेगा भी कैसे? तू खुद पर्चे बाँटने में लगा है।"
"अरे, पान नहीं बिके तो क्या हुआ।" लुट्टन ने बंडल रवि की तरफ़ सरकाया। "मेरी दुकान अब इस गली की सबसे बड़ी खबर बन गई है। कल से लोग पान की जगह खबर पीने आएंगे।"
अकरम ने बिस्किट का टुकड़ा मुँह में रखा और धीरे से बोला, "भैया, वो आदमी… बस्ती में बड़ा लालची है। वो कह रहा था कि सुबह मैदान में हाथ जोड़कर खड़े रहो, तो अपनी-अपनी चाय की दुकान चलती रहेगी।"
लुट्टन का हाथ रुक गया।
रवि ने बंडल उठाया और अपने सीने से लगाया। "अकरम, तू बता — बस्ती में कितने घर हैं?"
"तीन सौ से ज़्यादा, भैया। पर सब डरे हुए हैं। बच्चे रो रहे थे।"
"तो सुन।" रवि उसके पास बैठ गया। "कल सुबह मैं खुद तेरे साथ बस्ती चलूँगा। कोई किसी को डराने आए, तो मुझसे पहले बात करेगा। और तूने डरकर भागकर मुझे खबर दी — ये छोटी बात नहीं है। तू मेरी नज़र में आज सबसे बड़ा आदमी है।"
अकरम की आँखें भर आईं। वो मुँह फेरकर बैठ गया, जैसे किसी ने उसके कंधों से पहाड़ उतार दिया हो।
उधर, शहर के बाहर टेकरी पर बलवंत राय का बंगला रात में और भी बड़ा लगता था। बड़े हॉल में झूमर की पीली रोशनी पड़ रही थी, और बलवंत अपने सफ़ेद कुर्ते में, हाथ पीछे बाँधे, फ़र्श से फ़र्श तक टहल रहा था। सामने पाँच आदमी खड़े थे, सिर झुकाए। बलवंत के हाथ में पर्चों का बंडल था।
"एक चाय वाला पर्चा बाँट रहा है," बलवंत ने धीरे से कहा, "और तुम लोग खड़े देख रहे हो?"
कोई नहीं बोला। झूमर की रोशनी में पसीना चमक रहा था। बलवंत की उँगली उठी — सिर्फ़ उँगली, आवाज़ नहीं — और सबसे आगे खड़ा आदमी एक कदम पीछे हट गया।
"सर," वो आदमी हकलाया, "गली में लोग जुड़ रहे हैं। शकुंतला, दादी कम्मो, दर्ज़ी, मौलवी… सब सामने आ रहे हैं। पर्चा कोई फाड़ नहीं रहा।"
"तो फाड़ने वाले क्यों नहीं भेजे? तुम्हारे हाथ-पाँव किसलिए हैं?" बलवंत ने पर्चा उठाया और उस पर लिखी लाइन पढ़ी — "सच सुनो, सच बोलो।" उसने हल्की सी हँसी दी। "चाय वाले को लगता है ये शहर उसकी गली है।" वो रुका, फिर गले से नीचे सोने की चेन उँगली में लपेटी। "ज़ुबैर साहब को बोलो — मुझे आज रात मिलना है। यहीं।"
आदमी निकल गए। हॉल खाली हुआ तो बलवंत ने खिड़की से बाहर देखा। दूर शहर की रोशनी जल रही थी। उसने जेब से चाँदी की एक पुरानी घड़ी निकाली — रवि के पापा की घड़ी का जोड़ीदार, सिर्फ़ नाम का फ़र्क़ — और उसे हथेली में दबाया।
"अशोक," उसने धीरे से कहा, जैसे बरसों बाद किसी का नाम लिया हो, "तू मर गया, पर तेरी घड़ी ने आज तक मेरा पीछा नहीं छोड़ा।"
तभी पीछे पैरों की आहट आई। मुश्ताक़ भाई दरवाज़े पर खड़ा था, काला चश्मा, हाथ पर दस्ताने। "सर, करीम ने फ़ोन किया था। घड़ी असली है। और रवि ने उसे खुली आँखों से दिखाया — किसी से नहीं, करीम से।"
बलवंत ने घड़ी जेब में डाल दी। "तो बात सिर्फ़ घड़ी की नहीं है, मुश्ताक़। बात उस काग़ज़ की है जो उसके पापा ने क़ासिम को दिया था।" उसने आवाज़ नीची की। "वो बही अगर उस चाय वाले के हाथ लग गई…"
"सर, एक और बात।" मुश्ताक़ ने एक कदम आगे बढ़ा। "ज़ुबैर साहब ने कहा है कि वो आज रात नहीं आएंगे। उनका कहना है कि ये लड़ाई अब उनकी नहीं रही। आप खुद सुलझाइए।"
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