Billionaire Empire System – Chapter 803
वो गाड़ी में बैठा। गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ — धप! — और धूल उड़कर रवि के चेहरे पर आ गई।
रवि ने लिफ़ाफ़ा उठाया। उँगलियों में भारी लगा, जैसे उसके अंदर कुछ और हो, काग़ज़ से बढ़कर। इरा की आवाज़ उसके मन में उठी — "खोलकर देखना, पर अकेले मत देखना।"
उसने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा और स्कूल के गेट की तरफ़ देखा।
पिंकी खिड़की से झाँक रही थी। उसने हाथ हिलाया — जैसे कह रही हो, "भैया, मैं ठीक हूँ।" रवि ने हाथ उठाया, पर उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
रज़िया पीछे खड़ी थीं, पर्चा अब भी हाथ में। उनकी आवाज़ बदल गई — अब वो प्रिंसिपल की नहीं, किसी डरी हुई औरत की थी। "रवि जी… स्कूल का चंदा सेवा सदन के ट्रस्ट से आता है। आप जानते हैं। मेरे हाथ बँधे हैं।" उन्होंने पर्चा धीरे से मोड़ा। "अगर आप कल मैदान में कुछ करने जा रहे हैं, तो सोच लीजिए — ये बच्चे भी तो वहीं पढ़ते हैं।"
रवि ने उन्हें देखा। "मैडम, मैं इसीलिए जा रहा हूँ — ताकि ये बच्चे सिर्फ़ उसी पैसे से पढ़ें जो साफ़ हो।"
रज़िया कुछ नहीं बोलीं। उनकी आँखें झुक गईं, और उन हाथों ने पर्चा अपनी फ़ाइल में दबा दिया — इस बार धीरे से, जैसे किसी पुरानी आदत से मजबूर होकर नहीं।
रवि साइकिल पर बैठा, पर चलाने से पहले उसने जेब से लिफ़ाफ़ा निकाला और उँगली से किनारा चीरा। अंदर एक छोटा काग़ज़ था, और उस पर सिर्फ़ दो लाइनें, साफ़-सुथरी लिखाई में —
"तेरे पापा ने भी ऐसे ही सपने देखे थे, बेटा। उनका अंजाम तेरे सामने है। रुक जा, तो बच्ची दस बजे की धूप में स्कूल से घर लौटेगी।"
रवि ने काग़ज़ मुठ्ठी में भींच लिया। उसकी साँस रुक गई, फिर तेज़ चली।
उसने पलटकर स्कूल की खिड़की की तरफ़ देखा। पिंकी अब भी वहीं थी। उसने फिर हाथ हिलाया।
रवि ने मुश्किल से मुस्कुराकर हाथ उठाया और साइकिल घुमा दी। पर मन में एक बात ठंडी होकर बैठ गई — अब सवाल सिर्फ़ ये नहीं है कि दस बजे मैदान में क्या होगा। सवाल ये है कि उस आदमी को पता था कि पिंकी किस स्कूल में पढ़ती है, किस क्लास में है, और कब लौटेगी।
उसने घड़ी नहीं देखी। उसने सिर्फ़ कसम खाई, दाँत भींचकर — "अब ये बात यहीं खत्म होगी।"
॥
लिफ़ाफ़े का किनारा रवि की उँगली में कट ही रहा था कि उसने स्कूल के सामने वाले कूड़े के डिब्बे का ढक्कन खोला और लिफ़ाफ़ा उसके अंदर फेंक दिया। ढक्कन गिरा — धड़ाम! — और स्कूल की दीवार पर बैठी गौरैयाँ उड़ गईं।
रवि सीधा गेट की तरफ़ बढ़ा। पिंकी खिड़की से देख रही थी, हाथ अभी भी हवा में। रवि ने इशारा किया — बाहर आ।
पिंकी ने सिर हिलाया, पर उसके चेहरे पर सवाल था। दो मिनट बाद वो स्कूल बैग लटकाए बाहर आई। "भैया, पूरी क्लास बैठी है, अभी मिस ने रोल नंबर…"
रवि ने उसका हाथ पकड़ा और खींच लिया।
"भैया!" पिंकी ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, पर रवि की पकड़ मज़बूत थी। "मेरी क्लास है! मिस मेरा नाम काट देंगी, भैया, छोड़ो ना!"
रवि चुप था। उसने साइकिल स्टार्ट की, पिंकी को पीछे बैठाया, और सीधा सड़क पर उतर गया। पीछे से रज़िया का हाथ हवा में उठा रह गया, पर्चा अब भी हाथ में।
पचास मीटर चलने के बाद पिंकी ने कसकर रवि की क़मीज़ पकड़ ली। उसकी आवाज़ बदल गई थी — "भैया… कहाँ जा रहे हो?"
रवि ने कुछ नहीं कहा। बस साइकिल तेज़ की।
खेल अखाड़े का लोहे का गेट खुला था। अंदर मिट्टी के मैदान में दस-बारह लड़कियाँ बैठक लगा रही थीं। मीरा बैसाखी टेककर बीच में खड़ी थी — पसीने से भीगी, सिर पर पुराना कपड़ा बाँधा, और हाथ में डंडा। एक लड़की को गिराकर उठा रही थी।
मीरा ने रवि को साइकिल से उतरते देखा। पिंकी को पीछे खड़ा देखा। उसने डंडा ज़मीन पर रख दिया।
"क्या हुआ?"
रवि ने जेब से लिफ़ाफ़ा निकाला, जो उसने कूड़ेदान में फेंका भी नहीं था — एक बार हाथ कोठरी में दबाया था, बस। उसने मीरा की तरफ़ बढ़ा दिया।
मीरा ने पढ़ा। धीरे-धीरे, हर लाइन को दो बार। फिर उसने लिफ़ाफ़ा मोड़ा और अपनी जेब में रख लिया।
वो पिंकी के पास गई। पिंकी का कंधा पकड़ा — हल्के से, पर ऐसे जैसे कोई ज़मीन पर पहरा बिठा रहा हो।
"सुन मेरी बात," मीरा ने कहा। "यहाँ से तू एक भी दिन डरकर नहीं निकलेगी।"
पिंकी ने हाथ छुड़ाया। "मेरा स्कूल है! मेरी अटेंडेंस! मिस रज़िया आज ही मम्मी को फ़ोन करेंगी और भैया…"
"पिंकी।"
आवाज़ रवि की थी। पिंकी रुक गई।
रवि उसके सामने आया। उसने पिंकी के सिर पर हाथ रखा और धीरे से कहा, "एक दिन। आज एक दिन यहाँ रुक जा। मेरी बात मान।"
पिंकी की आँखें भर आईं। "क्यों भैया? हर बार मैं… हर बार मुझे छिपना पड़ता है। स्कूल में मिस डरती हैं, तुम डरते हो, मम्मी डरती हैं। मैं आख़िर किससे डरूँ?"
रवि कुछ नहीं बोला। उसने पिंकी को गले लगा लिया। पिंकी ने पहले तो हाथ नहीं बढ़ाया, फिर धीरे से रवि की पीठ पर हाथ रख दिया।
मीरा ने दोनों को देखा। फिर उसने मुड़कर मैदान की तरफ़ आवाज़ दी — "अरे, सब यहाँ आओ!"
लड़कियाँ दौड़कर आईं — पसीने में भीगी, चेहरे लाल, साँस फूलती।
"ये पिंकी है," मीरा ने कहा। "आज से ये हमारे साथ रोज़ आएगी। और सुनो — अगर इस इलाक़े में कोई सफ़ेद कुर्ता दिखे, तो सीधा मुझे बताना। समझीं?"
लड़कियों ने एक साथ सिर हिलाया।
पिंकी ने मैदान की तरफ़ देखा। एक लड़की ने ज़मीन से उठकर अपना घुटना पोंछा और फिर बड़ी तेज़ी से अपने सामने वाली लड़की को पटका — धड़ाम! — और दोनों हँसने लगीं।
पिंकी के पैर अपने आप आगे बढ़े।
मीरा ने देखा और मुस्कुराई। "तू सोच रही है, ये लड़कियाँ मारती हैं?"
पिंकी ने धीरे से सिर हिलाया।
"तो आ," मीरा ने कहा। "मुक्का बना।"
पिंकी ने हाथ उठाया, फिर झिझकी। "मुझे नहीं आता…"
"कोई नहीं जानता था। मैं भी नहीं जानती थी। बना मुक्का।"
पिंकी ने मुक्का बनाया। अंगूठा ग़लत तरफ़ था।
मीरा घुटने के बल बैठ गई — ज़मीन पर, पिंकी के सामने — और उसने पिंकी के हाथ को अपने हाथ में लेकर अंगूठा सही किया। "अब ये मुक्का कभी मत खोलना। जब कोई तुझे डराए, तो याद रखना — ये तेरा मुक्का है। बस।"
पिंकी ने मुक्का बाँधे रखा। उसकी आँखों में पानी था, पर होंठ हँस रहे थे।
रवि पीछे खड़ा देख रहा था। उसने अपने हाथों को जेब में डाल दिया, क्योंकि वो काँप रहे थे — ख़ुशी से।
तभी उसका फ़ोन बजा। लुट्टन।
"भैया!" लुट्टन की आवाज़ फटी हुई थी, जैसे वो भागते हुए बोल रहा हो। "भैया, दुकान पर दो सफ़ेद कुर्ते… दो आदमी! ग्राहकों को जाने नहीं दे रहे, भैया, बोल रहे हैं — 'आज जाने दो, कल से यहाँ कोई नहीं आएगा।'"
रवि का पूरा शरीर ठंडा हो गया।
"तू वहीं रुक," रवि ने कहा। "मैं आ रहा हूँ। कुछ मत करना, लुट्टन। सुन रहा है?"
"हाँ भैया… पर भैया, ये लोग… ये लोग पान का डिब्बा…"
लाइन कट गई।
रवि ने साइकिल उठाई। मीरा ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ा। "जा। दुकान संभाल।"
"पिंकी—"
"पिंकी मेरे पास है। और सुन," मीरा ने उसकी आँखों में देखा, "अगर आज कोई इलाक़े में सफ़ेद कुर्ता दिखे, तो मुझे बताना। हम सब जानते हैं कि हमारा क्या करना है।"
रवि ने सिर हिलाया और साइकिल पर कूदा।
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