Billionaire Empire System – Chapter 800
पिंकी दूर से उन्हें देख रही थी। उसने धीरे से अपना बैग उठाया और पास आई। "भैया, मैं मीरा दीदी के साथ जा रही हूँ। तुम माँ के पास रुको।" वो रुकी, फिर बोली, "और भैया — जब तुम कल उठो, तो तुम्हारी आँखों में वो डर न हो। मुझे नहीं चाहिए। मुझे वो भैया चाहिए जो पापा की घड़ी कान से लगाता है।"
रवि ने उसे गले लगा लिया। इस बार उसने खुद को रोका नहीं। उसकी आँखों से आँसू पिंकी के कंधे पर गिरे।
मीरा ने बैसाखी टेकी और दोनों बाहर निकल गए। टक… टक… टक — आवाज़ दूर होती गई।
रवि अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठ गया। उसने घड़ी निकाली और कान से लगाई। "सुन रहे हो, पापा?" उसने धीरे से कहा, "कल मैं सच बोलूँगा। और अगर सच बोलने की सज़ा मौत है…" उसने रुककर साँस ली, "…तो उस मौत में भी तेरा नाम होगा।"
तभी जेब में फ़ोन काँपा। मीरा का मैसेज था, बस दो शब्द: "खिड़की से देख।"
रवि ने पलटकर ऊपर देखा। अस्पताल के तीसरे माले की एक खिड़की पर — एक काला पर्दा हिला और स्थिर हो गया। एक पल के लिए किसी का चेहरा दिखा — चश्मा, चौड़ा चेहरा। फिर अंधेरा।
रवि उठा। उसने घड़ी जेब में रखी। लॉबी के बाहर, सड़क पर, सुबह की पहली किरण आ रही थी। और उसके सामने, गली के मोड़ पर, एक चाय की दुकान का शटर उठ रहा था — धीरे-धीरे, चरचराता हुआ।
रवि ने अपनी मुट्ठी भींची और आगे बढ़ा।
॥
शटर की आवाज़ अभी भी रवि के कानों में चरचरा रही थी, जब उसने गली के मोड़ पर पाँव रखा। दुकान का शटर उठा हुआ था, अंदर अंधेरा, और बाहर नीचे ज़मीन पर एक काग़ज़ पड़ा था — सफ़ेद, मुड़ा हुआ, चार पत्थरों से दबाया हुआ। रवि ने चारों तरफ़ देखा। कोई नहीं।
उसने काग़ज़ उठाया और सुबह की पहली रोशनी में पढ़ा। सिर्फ़ एक लाइन थी — "कल मैदान में तेरी माँ की साँस का फ़ैसला होगा। बलवंत का अस्पताल, बलवंत के हाथ, बलवंत के डॉक्टर। सोच ले, चाय वाले।"
रवि की उँगलियाँ काग़ज़ पर जम गईं। उसने काग़ज़ मोड़कर जेब में डाला और वहीं से भागा। गली, चौक, सड़क — सब कुछ पीछे छूटता गया। उसकी साँस फूल रही थी, पर पाँव रुके नहीं।
रास्ते में ही फ़ोन बजा। स्क्रीन पर डॉक्टर जोशी का नाम। रवि ने कान पर लगाया।
"बेटा!" डॉक्टर जोशी की आवाज़ काँप रही थी, "तुम अस्पताल आ रहे हो? सुनो, रात में प्रबंधन का आदेश आया है — सीता जी को आज रात आम वार्ड में शिफ़्ट किया जाएगा। और मेरा नाम केस से हटा दिया गया है। मैंने बहुत कोशिश की, पर —"
"डॉक्टर साहब," रवि ने बीच में कहा, "माँ अभी कहाँ है?"
"आठवीं मंज़िल पर। पर बेटा, जल्दी करो, मुझे डर है कि वो लोग—"
फ़ोन कट गया। रवि ने और ज़ोर से दौड़ना शुरू किया। सुबह की हवा ठंडी थी, पर उसके कान लाल थे। माँ। माँ। बस यही एक शब्द उसके सिर में घूम रहा था।
अस्पताल की लॉबी में घुसते ही उसकी नज़र नर्स प्रेमा पर पड़ी। वो रजिस्टर लिए खड़ी थी, चेहरा उतरा हुआ।
"सीता देवी?" रवि ने हाँफते हुए पूछा, "आठवीं मंज़िल—"
प्रेमा ने रजिस्टर बंद कर दिया। उसकी आँखें चुरा रही थीं। "रवि बेटा… उन्हें रात में ही स्पेशल केयर में शिफ़्ट कर दिया गया है।"
"स्पेशल केयर?" रवि का दिल धक् से रह गया, "कहाँ है?"
"पीछे वाले हिस्से में। नई इमारत के पीछे… जहाँ पहले कोई मरीज़ नहीं रखा जाता था।" प्रेमा ने धीरे से कहा, "बेटा, वहाँ ज़ुबैर साहब के आदमी खड़े हैं। मैंने अंदर जाने की कोशिश की, तो मुझे धमका दिया गया।"
रवि की मुट्ठी भिंच गई। उसने एक गहरी साँस ली — वही आदत — और आँखें बंद कर लीं।
"सिस्टम," उसने मन में कहा, "बता, क्या हो रहा है?"
रवि ने आँखें खोलीं। पाँच हज़ार पॉइंट। यानी सिस्टम भी जानता है कि ये आसान नहीं है।
उसने तुरंत मीरा का नंबर मिलाया।
"मीरा दीदी," उसकी आवाज़ सपाट थी, "पिंकी को लेकर क़ासिम भाई की झोपड़ी जाओ। अभी। बिलकुल अभी।"
"क्या हुआ?" मीरा की आवाज़ में नींद थी, पर चेतावनी साफ़ थी।
"माँ को स्पेशल केयर में शिफ़्ट किया है। ज़ुबैर के आदमी वहाँ हैं। मैं जा रहा हूँ।" वो रुका, फिर बोला, "पिंकी को कुछ न हो।"
"मेरे यहाँ कोई पिंकी को छू भी नहीं सकता," मीरा ने कहा, और फ़ोन कट गया।
रवि ने लुट्टन को फ़ोन किया। लुट्टन दो रिंग में उठा — जैसे जाग रहा ही न हो।
"यार रवि, सुबह-सुबह—"
"लुट्टन, अस्पताल के पीछे वाले हिस्से के बाहर आ जा। अभी। और रोहित को भी बुला।"
लुट्टन ने एक सेकंड भी नहीं लिया। "आ रहा हूँ।" और फ़ोन कटा।
रवि अस्पताल के पीछे की तरफ़ भागा। नई इमारत के पीछे एक पुराना हिस्सा था — दीवारों पर हरी काई, टूटी खिड़कियाँ, और एक लोहे का दरवाज़ा जिस पर "स्पेशल केयर" लिखा था, हरफ़ पुराने पीले रंग में। दरवाज़े के बाहर दो सफ़ेद कुर्ते वाले खड़े थे। रवि दीवार के सहारे रुका। उसने जेब में हाथ डाला। घड़ी वहाँ थी, ठंडी।
पीछे से पैरों की आवाज़ आई। लुट्टन आ रहा था, हाँफता हुआ, बनियान अधूरी पहनी हुई। और उसके पीछे — रोहित, काली गाड़ी से उतरकर दौड़ता हुआ।
"क्या प्लान है?" लुट्टन ने साँस रोककर पूछा।
रवि ने सामने देखा। "पीछे से घुसेंगे। खिड़कियाँ टूटी हैं। मैं अंदर जाऊँगा। तुम दोनों बाहर रुको। अगर दो मिनट में न निकलूँ—"
"तो हम अंदर आएँगे," रोहित ने काट दिया। उसकी आवाज़ में कोई मज़ाक नहीं था। "मैं उस आदमी का बेटा हूँ, रवि। मुझे पता है वो कैसे सोचता है। पीछे के दरवाज़े पर दो आदमी हैं, अंदर गलियारे में एक। तीन। बस।"
रवि ने उसे देखा। एक पल के लिए दोनों के बीच कुछ ऐसा बदला जो शब्दों में नहीं था। रवि ने सिर हिलाया।
वो दीवार के सहारे सरका। एक टूटी खिड़की मिली — काँच गिरा हुआ, चौखट में सिर्फ़ दाँतेदार किनारे। रवि ने अपनी क़मीज़ की आस्तीन से काँच हटाया और अंदर झाँका। अंधेरा। सिर्फ़ दूर एक कमरे से पीली रोशनी आ रही थी। और उस रोशनी में एक बिस्तर दिख रहा था।
रवि ने खुद को खींचकर अंदर डाला। धड़ाम! उसका पाँव फर्श से टकराया। उसने साँस रोकी। कोई आवाज़ नहीं। वो दबे पाँव गलियारे की तरफ़ बढ़ा।
कमरे के दरवाज़े पर एक सफ़ेद कुर्ते वाला खड़ा था, पीठ रवि की तरफ़। रवि ने अपनी जेब से पापा की घड़ी निकाली — चाँदी की, ठंडी — और उसके सिर के पीछे ले जाकर धीरे से कहा, "एक आवाज़ निकाली, तो ये घड़ी तेरे सिर में घुसेगी।"
आदमी का शरीर अकड़ गया। रवि ने उसका हाथ पकड़कर दीवार से चिपका दिया। "अंदर कितने हैं?"
"दो… दो और," आदमी ने हकलाया।
"माँ कहाँ है?"
"अंदर… बिस्तर पर।"
रवि ने उसे धकेलकर किनारे किया और कमरे में घुसा।
कमरा बड़ा था, पर बंद। खिड़कियों पर मोटे पर्दे। कोने में एक बड़ी स्क्रीन, बंद। और बीच में बिस्तर — सफ़ेद चादर, और उस पर माँ।
सीता देवी की आँखें बंद थीं। साँस की मशीन बगल में धीरे-धीरे बीप कर रही थी। उनका चेहरा और पीला लग रहा था, होंठ सूखे। रवि के पाँव अपने आप रुक गए। एक पल के लिए वो कुछ नहीं सोच पाया। बस देखता रहा।
फिर वो बिस्तर के पास गया और घुटनों के बल बैठ गया। उसने माँ का हाथ अपने हाथों में लिया। ठंडा था।
"माँ," उसने फुसफुसाया।
सीता देवी की पलकें हिलीं। धीरे-धीरे आँखें खुलीं। पहले धुँधला, फिर पहचाना। उनके होंठ हिले।
"रवि…"
"मैं हूँ, माँ। मैं यहाँ हूँ।" रवि की आवाज़ टूट रही थी, पर उसने खुद को संभाला। "मैं तुम्हें यहाँ से ले जा रहा हूँ। अभी।"
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