Billionaire Empire System – Chapter 8
इरा ने घड़ी उठाई। हल्की थी। छोटी थी। उसने पलटकर देखी। "इसमें तो कुछ नहीं।"
"ठीक यही तो बात है।"
उसी पल घड़ी के काँच के पीछे एक पीली लकीर चमकी। और कमरे में एक आवाज़ गूँजी — साफ़, परदे के पीछे से आती हुई।
"सिस्टम ऑनलाइन। यूज़र की पहचान: रवि। साथी: इरा ख़ान। पहुँच की पुष्टि हो गई।"
इरा की उँगलियाँ सख़्त हो गईं। उसने घड़ी को कसकर पकड़ लिया और रवि की तरफ़ देखा। उसकी आँखें बड़ी थीं, पर डर से नहीं — हैरानी से।
"ये… ये क्या था?"
"यही," रवि ने कहा। "ये है मेरा राज़।"
इरा ने घड़ी टेबल पर वापस रखी। उसके हाथ थोड़े काँप रहे थे। "मैंने बहुत चीज़ें देखी हैं। झूठे बाबा, नक़ली करिश्मे, टीवी पर दिखाए जाने वाले चमत्कार। पर ये…" उसने घड़ी की तरफ़ इशारा किया। "ये अलग है।"
"मैडम, आपने मुझसे सच पूछा। सो मैंने सच बता दिया। अब आप बताइए — आप इस सच का क्या करेंगी?"
इरा ने अपना लैपटॉप बैग खोला और उसमें से एक छोटा कैमरा निकाला। "मैं इसे दुनिया को दिखाना चाहती हूँ।"
रवि ने कैमरे की तरफ़ देखा। उसके पेट में कुछ ठंडा सा उतरा। "और फिर? जो लोग इसे लेने आएँगे, उनसे कौन लड़ेगा?"
इरा रुक गई। उसने कैमरा नीचे रख दिया। "तो क्या करें? छिपाकर रखें? बस आप और मैं जानें?"
"नहीं," रवि ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "पर पहले मुझे ये समझना है कि ये चीज़ क्या है। कहाँ से आई। क्यों आई। और मेरे पास क्यों आई।" उसने घड़ी उठाई और उसे इरा के सामने रख दिया। "अगर आप मेरे साथ हैं, तो साथ चलिए। पर मैं अंधेरे में कूदने वाला आदमी नहीं हूँ।"
इरा ने उसे देखा। कुछ देर। फिर उसने अपना कैमरा बैग में वापस रखा, पर बंद नहीं किया।
"ठीक है," उसने कहा। "मैं कल सुबह आऊँगी। और तब तक आप खिड़की बंद रखिएगा। टीवी नरेंद्र अपने आदमी भेजेगा।"
"आपको कैसे पता?"
इरा मुस्कुराई। पहली बार। हल्की सी, एक तरफ़ से। "क्योंकि मैंने उसके फ़ोन की रिकॉर्डिंग सुनी है। वो आज रात किसी को भेज रहा है।" वो उठी और बैग कंधे पर डाला। "आपके पास जो भी है, उसे संभालकर रखिए।"
वो दरवाज़े तक गई, फिर रुकी। "और रवि जी, एक बात।" उसने पलटकर देखा। "जब आपने कहा कि माँ बीमार है — मैंने आपकी आँखें देखी थीं। आप झूठ नहीं बोल रहे थे। इसीलिए मैं आप पर भरोसा कर रही हूँ। बस इतना याद रखिएगा।"
वो बाहर निकल गई। स्कूटी की आवाज़ आई और फिर दूर हो गई।
रवि देर तक बैठा रहा। घड़ी टेबल पर पड़ी थी। उसने उसे उठाया।
"सुन," उसने धीरे से कहा। "अब बताओ, कल रात कोई आने वाला है। मैं क्या करूँ?"
काँच के पीछे लिखाई चमकी। "नया मिशन: रात में आने वालों से दुकान बचाओ। इनाम: आठ सौ पॉइंट। माँ की दवा एक कदम दूर।"
रवि ने घड़ी मुट्ठी में भींची। उसके हाथ नहीं काँप रहे थे। पहली बार, काँप नहीं रहे थे।
बाहर गली में हवा बह रही थी। दूर कहीं एक कुत्ता भौंका। रवि ने दुकान का शटर आधा गिराया और अंधेरे में बैठ गया, घड़ी उसकी हथेली में गरम हो रही थी, जैसे कोई दिल धड़क रहा हो।
॥
शटर के नीचे से एक साया झुककर अंदर आया। रवि के हाथ से चाय का गिलास छूटते-छूटते बचा। गरम चाय उसकी उँगलियों पर छलकी और उसने हड़बड़ाकर गिलास टेबल पर रख दिया।
लड़की ने हेलमेट उतारा और बालों को पीछे किया। उम्र तेईस के आसपास। कंधे पर पुराना लैपटॉप बैग, आँखों में वो ज़िद जो झुकने का नाम नहीं लेती।
"मैं इरा ख़ान हूँ। न्यूज़ चैनल की रिपोर्टर।" उसने बिना रुके कहा। "कल आपने टीवी नरेंद्र के साथ जो किया, वो मैंने रिकॉर्ड कर लिया है। अब बताइए — आपने उससे सच कैसे बुलवाया?"
रवि का गला सूख गया। उसने गीली उँगलियाँ कुर्ते से पोंछीं।
"मैडम," वो बोला, "कुछ नहीं किया। बस चाय पिलाई थी। और वो अपने आप बोल गया।"
इरा मुस्कुराई। एक तरफ़ से, बिना हँसी के।
"अपने आप।" उसने बैग खोला और मोबाइल निकाला। "बारह साल की रिपोर्टर हूँ, रवि जी। हर दिन कम से कम तीन आदमी मुझसे कहते हैं — मैडम, वो अपने आप हो गया। कोई अपने आप नहीं होता। चलिए, सुनते हैं।"
उसने मोबाइल की स्क्रीन खोली और आवाज़ ऊँची कर दी।
पहले हवा की फुफकार। फिर भीड़ का शोर। और फिर एक आवाज़ — चमकीली, घमंड से भरी, जिसे रवि ने दिन भर सुना था।
"…मैं हर दुकान से हिस्सा खाता हूँ और बलवंत सर को ऊपर देता हूँ। ये गली, ये दुकानें, ये ईंट-पत्थर — सब साहब का है। मैं तो बस वसूलने वाला हूँ। पूरे इलाक़े का हिसाब है मेरे पास, एक-एक दुकान का, एक-एक किराए का। और जो नहीं देता…"
फिर खड़खड़ाहट। मोटरसाइकिल का शोर। और टेप खत्म।
रवि सन्न रह गया। उसके पैर नीचे जैसे ज़मीन खिसक गई। टीवी नरेंद्र की वो आवाज़ — वही आवाज़ जो अभी शाम को उसके कान में फुसफुसाई थी — बोल रही थी। खुलकर। बिना डरे। बिना रुके।
"ये…" रवि ने धीरे से कहा, "ये मैंने नहीं कहलवाया।"
"तो किसने कहलवाया?" इरा ने मोबाइल जेब में रखा। "आपके सामने तो कुछ नहीं था। कोई हथकड़ी नहीं, कोई धमकी नहीं। बस आप खड़े थे और वो बोलता चला गया। मुझे कैमरे में सब दिख रहा था — वो अपना मुँह नहीं रोक पा रहा था। जैसे कोई उसके अंदर से बोल रहा हो।"
रवि ने अपनी जेब की तरफ़ देखा। घड़ी वहीं थी। ठंडी। चुप।
"मैं इसे अपने चैनल पर लगाना चाहती हूँ।" इरा ने कहा। उसकी आवाज़ अब ज़रा धीमी थी। "पर मेरा बॉस डर रहा है। कल रात से फ़ोन नहीं उठा रहा। दो दिन पहले उसे भी एक धमकी मिली थी। इस चैनल के पीछे किसका पैसा है, ये मुझे भी पता है।" वो एक कदम आगे आई। "सो मुझे एक गवाह चाहिए। जो कहे कि ये आवाज़ उसने अपने कानों से सुनी। तुम गवाही दोगे?"
रवि पीछे हटा। एक कदम। फिर दूसरा।
"नहीं।"
"क्यों नहीं?"
"मैडम, मैं ग़रीब आदमी हूँ।" उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "मेरी माँ बीमार है। उसे इंसुलिन चाहिए, महीने में दो बार। मेरी बहन सोलह साल की है, उसकी फ़ीस तीन महीने से बाक़ी है। मेरी दुकान मेरी ज़मीन नहीं है — ये उसी बलवंत की ज़मीन पर है।" उसने हाथ फैलाए। "मैं बलवंत के ख़िलाफ़ नहीं जा सकता। आप मुझे माफ़ कर दीजिए।"
इरा की आँखें कड़ी हो गईं। उनमें ठंडा गुस्सा आ गया, वो गुस्सा जो चिल्लाता नहीं, जम जाता है।
"तो फिर तुमने उससे सच बुलवाया क्यों?"
रवि चुप हो गया।
"शौक के लिए?" इरा का सवाल कमरे में गूँजा। "दिन भर भीड़ के सामने तमाशा देखकर अच्छा लगा? आपने उसके मुँह से वो बात निकलवाई जो मेरे दफ़्तर की हर फ़ाइल में बंद है। और अब जब बात आगे बढ़ाने की है, तो 'ग़रीब आदमी हूँ'?"
रवि के होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने गहरी साँस ली। यही उसकी आदत थी — पहले साँस, फिर बात। पर इस बार साँस भी रुकी हुई थी।
पीछे, अंधेरे कमरे से चप्पलों की आवाज़ आई।
"बेटा, ये लड़की सही कह रही है।"
रवि और इरा दोनों एक साथ मुड़े।
सीता देवी दरवाज़े पर खड़ी थीं। सफ़ेद साड़ी, बाल हड़बड़ी में संभाले हुए, चेहरे पर वो पीलापन जो इंजेक्शन के बाद भी नहीं गया था। वो दीवार का सहारा लेकर धीरे-धीरे चलीं। रवि दौड़कर पहुँचा।
"माँ, आप उठ क्यों गईं? डॉक्टर ने कहा था आराम—"
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