Billionaire Empire System – Chapter 7
"ले, पी ले।"
लड़के ने पहले उसके चेहरे को देखा, फिर कुल्हड़ को। "पैसे नहीं हैं।"
"पैसे नहीं माँग रहा। पी ले।"
लड़का पीने लगा। तभी दूसरा लड़का पास आया, फिर तीसरा। रवि हँस पड़ा। "रुको, रुको। सबको मिलेगा।"
कान में आवाज़ आई, "दो सौ पॉइंट।"
वो और हँसा। "ये तो मज़ेदार है।"
तभी उसे दादी कम्मो दिखीं। वो अपनी लकड़ी की छड़ी ना पाते हुए दीवार के सहारे चल रही थीं। रवि दौड़कर गया।
"दादी, आप अकेली कहाँ?"
"अरे रे रे, मैं कहीं भी अकेली नहीं होती।" उन्होंने छड़ी घुमाई। "बस ये लाठी मेरी सहेली है।"
रवि उन्हें घर तक छोड़ने चला। रास्ते में दादी ने उसका चेहरा देखा और रुक गईं। "तेरे आँखों में कुछ बदला है, बेटा।"
"क्या?"
"पहले तेरी आँखें थकी हुई थीं, पूछती थीं। अब कुछ देख रही हैं।" उन्होंने छड़ी आगे की तरफ़ रखी। "शुभ है।"
कान में फिर आवाज़ आई, "पचास पॉइंट। कुल नौ सौ।"
रवि ने आश्चर्य से घड़ी की तरफ़ देखा। नौ सौ? उसने दोपहर तक बच्चों को चाय पिलाई, दादी को घर छोड़ा, और एक बूढ़े को पानी दिया। हर छोटी चीज़ पर आवाज़ आती रही।
दोपहर में दुकान खाली थी। रवि टेबल पर बैठ गया और घड़ी जेब से निकाली। "सुन, जब तू मेरी है, तो बता — तेरे पास क्या-क्या है?"
काँच के पीछे लिखाई चमकी। "सच्चाई की आवाज़: पाँच सौ पॉइंट। दस मिनट के लिए किसी एक इंसान का सच बोलवा देती है।"
रवि की साँस रुक गई। सच बोलवाना। किसी से भी। किसी भी सच को।
उसने धीरे से पूछा, "और क्या?"
"बीमारी ठीक करना: एक हज़ार पॉइंट। दिखाई न देना: अठारह सौ पॉइंट।"
रवि ने पॉइंट गिने। नौ सौ। बीमारी ठीक करने के लिए एक हज़ार चाहिए। माँ। माँ के लिए।
उसने घड़ी को सीने से लगा लिया। दुकान की छत की दरार से धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसे लगा जैसे बहुत दिनों बाद कुछ अच्छा हुआ है।
शाम को लुट्टन दुकान पर आया। वो अपनी पान की दुकान से चला आया, बिना बुलाए। रवि एक कुल्हड़ में चाय डाल रहा था।
लुट्टन ने उसके चेहरे को देखा और भौंहे चढ़ा दीं। "यार, आज तेरे चेहरे पर कुछ अजीब सी हँसी है।" उसने पान चबाया। "तूने कुछ खाया है क्या?"
रवि हँस पड़ा। "हाँ, चाय पी है।"
लुट्टन ने आँखें सिकोड़ीं। "चाय तो तू रोज़ पीता है। पर आज…" उसने उँगली हिलाई। "आज तू डरा हुआ नहीं लग रहा। टीवी नरेंद्र ने फिर आकर… कुछ कहा?"
रवि ने घड़ी अपनी जेब में ठंडी महसूस की। उसे लगा, जैसे कोई उसके साथ खड़ा है। पहली बार, वो अकेला नहीं था।
"कुछ नहीं," उसने कहा। "बस, सुबह से कुछ अच्छा हो रहा है।"
लुट्टन ने आगे झुककर उसके कान के पास कहा, "यार रवि, भगवान भी मुझे भूल गया है, पर तुझे याद करने लगा है। ये भी ठीक है।" और वो ज़ोर से हँसा।
रवि भी हँसा। पर उसकी हँसी में कुछ और था। कोई गहरी राहत, जो बरसों बाद आई थी।
लुट्टन जाने लगा, तभी रुका। "सुन, कल तक पैसा… टीवी वाला…"
"मैं देखता हूँ," रवि ने कहा। और उसकी आवाज़ में वो यक़ीन था जो कल भी नहीं था।
लुट्टन ने सिर हिलाया और गली के मोड़ पर मुड़ गया। रवि दुकान के बाहर बेंच पर बैठ गया। शाम की हवा में केतली की महक घुल रही थी। दूर कहीं मस्जिद से आवाज़ आई।
उसने जेब से घड़ी निकाली। सूरज की आख़िरी रोशनी उस पर पड़ी। "सुन," उसने धीरे से कहा। "तेरे पास 'सच्चाई की आवाज़' है, सही?"
"हाँ। पाँच सौ पॉइंट।"
"तो क्या… मैं इसे किसी पर भी लगा सकता हूँ?"
काँच के पीछे पीली लकीर चमकी। "किसी भी इंसान पर। पर नतीजा तुम्हें भुगतना पड़ेगा।"
रवि ने गहरी साँस ली। उसके दिल में एक नाम उभर रहा था — टीवी नरेंद्र। कल शाम को वो आएगा। पैसे माँगेगा। धमकाएगा। और उसके सामने सच निकल आएगा, सबके सामने।
उसने घड़ी को मुट्ठी में कस लिया। "तो देखते हैं।"
तभी सामने गली में एक स्कूटी आई और दुकान के ठीक सामने रुकी। ब्रेक की आवाज़ तेज़ थी, जैसे कोई जल्दी में हो। हैलमेट उतरा। कंधे पर पुराना लैपटॉप बैग, बाल मज़बूती से बँधे, आँखों में ठंडी ज़िद।
वो सीधी रवि के सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी आवाज़ में कोई लाग-लपेट नहीं थी।
"मैं इरा ख़ान हूँ। न्यूज़ चैनल की रिपोर्टर।" उसने जेब से मोबाइल निकाला और स्क्रीन रवि के सामने कर दी। "कल आपने टीवी नरेंद्र के साथ जो किया, वो मैंने रिकॉर्ड कर लिया है।"
रवि का हाथ चाय के गिलास पर था। उसने गिलास पकड़ा रखा, पर उँगलियाँ ढीली हो गईं। उसने वो रिकॉर्डिंग नहीं सुनी थी, पर भीतर ही भीतर जान गया — कल क्या हुआ होगा।
इरा ने मोबाइल लॉक किया और सीधे उसकी आँखों में देखा। "अब बताइए।" उसकी आवाज़ धीमी, पर पत्थर जैसी थी। "आपने उससे सच कैसे बुलवाया?"
रवि ने उसके मोबाइल की स्क्रीन देखी। काँच पर टीवी नरेंद्र का चेहरा था — पसीना, फटी आँखें, और वो लम्हा जब उसका अपना मुँह उसके ख़िलाफ़ बोल उठा था। रवि ने धीरे से मोबाइल को हाथ से दूर किया।
"आपको ये नहीं दिखाना चाहिए था," उसने कहा।
इरा ने बैग कुर्सी पर रखा और सामने बैठ गई। "क्यों? क्योंकि सच किसी को चुभता है, या क्योंकि आप डर गए हैं?"
"क्योंकि आपने जो देखा, वो समझाना मुश्किल है।"
इरा ने अपना मोबाइल रख दिया और आगे झुकी। "मैं दो साल से इस गली के बाहर बैठी हूँ, रोज़ आपकी दुकान के सामने एक बंद गाड़ी में। मुझे पता है टीवी नरेंद्र यहाँ क्या-क्या करता है। मैंने दस लोगों से बात की — शकुंतला आंटी, लुट्टन, वो बूढ़ा जो रोज़ सुबह आपसे पानी लेता है।" उसने एक पल रुका। "पर कल जो हुआ, वो किसी किताब में नहीं लिखा। वो आदमी अपनी मर्ज़ी से नहीं बोला। कोई चीज़ थी।" उसने रवि की जेब की तरफ़ नज़र घुमाई। "क्या वो आपके पास है?"
रवि का हाथ अपने आप जेब पर चला गया। ये औरत कुछ नहीं जानती थी, पर सब कुछ ऐसे पूछ रही थी जैसे जानती हो।
"मैडम," उसने कहा, "आप क्या साबित करना चाहती हैं?"
"मैं ये साबित करना चाहती हूँ कि इस शहर में एक आदमी है जो बिना डर के सच बोल सकता है। और मैं उस आदमी की कहानी अपने चैनल पर दिखाना चाहती हूँ।" उसकी आवाज़ का पत्थर पिघल गया, थोड़ा। "मेरे बॉस ने मुझे हटाने की धमकी दी है। मेरे पास बस यही एक ख़बर बची है।"
रवि ने कुछ देर उसे देखा। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे। कलाई पर एक पुरानी घड़ी थी, जिसका पट्टा फटा हुआ था। वो थकी हुई थी, पर हारी हुई नहीं।
तभी घड़ी की आवाज़ आई — धीमी, सिर्फ़ रवि के लिए। "नया मिशन: रिपोर्टर को सच बताओ। इनाम: दो सौ पॉइंट। नुक़सान: कोई नहीं।"
रवि के मुँह से हल्की साँस निकली। उसने घड़ी की तरफ़ देखा। "तू भी कमाल है।"
इरा ने भौंहें चढ़ाईं। "कौन?"
"कुछ नहीं। बैठिए। चाय पीजिए। फिर बात करते हैं।"
इरा ने चाय का कुल्हड़ उठाया, पर पीने से पहले उसे सूँघा। "ये अच्छी है।"
"माँ की रेसिपी है। अदरक ज़्यादा, चीनी कम।"
इरा ने एक घूँट भरा। फिर उसने कुल्हड़ नीचे रखा। "मैं बातें नहीं सुनना चाहती, रवि जी। मैं सच सुनना चाहती हूँ।"
रवि ने अपनी जेब से घड़ी निकाली और उसे टेबल पर रख दिया। धातु की ठंडक से लकड़ी पर हल्की सी आवाज़ हुई।
इरा ने उसे देखा। "ये क्या है?"
"मुझे नहीं पता," रवि ने सच कहा। "बारह दिन पहले मेरे दरवाज़े के नीचे से मिली। तब से… ये मेरे साथ बोलती है।"
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