Billionaire Empire System – Chapter 798
रोहित ने कहा, "मैं अपने पापा से मिलूँगा। जो काग़ज़ जग्गू ने रखे हैं, मैं उन्हें ले आऊँगा।"
क़ासिम भाई उठे। वो सीधे रवि के सामने आए और उन्होंने उसका हाथ पकड़ा। "बेटा, अब देर मत करना। चार दिन में वो लोग कुछ न कुछ करेंगे। तुम्हारे पापा ने भी आख़िरी तीन दिन कुछ ऐसे ही गुज़ारे थे। न सोए, न खाए। बस काग़ज़ समेटे।" उन्होंने रवि का हाथ दबाया। "अब जाओ। रात बहुत है।"
सब निकल गए। लुट्टन बाहर गाड़ी स्टार्ट करने लगा, इरा ने मशीन का बैग गले में लटकाया, रोहित पीछे चला। पर रवि झोपड़ी में रुक गया।
क़ासिम भाई ने बही समेटी। "कुछ और पूछना है?"
रवि ने बही को देखा। सालों पुरानी, जिल्द उखड़ी हुई, किनारे जले हुए। "क़ासिम भाई, आपने ये बही कहाँ छिपाई थी? इतने साल?"
क़ासिम भाई मुस्कुराए। "बेटा, कभी-कभी सबसे अच्छी जगह वही होती है जहाँ कोई ढूँढने की ज़हमत नहीं करता।" उन्होंने दीये की तरफ़ इशारा किया। "इसी झोपड़ी में, तुम्हारे सामने, रोज़। बस ज़रूरत थी, उस आँख की।"
रवि ने बही की तरफ़ हाथ बढ़ाया। उँगलियाँ जिल्द पर टिकीं। काग़ज़ ठंडा था, पर जैसे अंदर से कुछ गरमी आ रही हो।
क़ासिम भाई ने उसका चेहरा देखा। "डर लग रहा है?"
रवि ने कोई झूठ नहीं बोला। "हाँ।"
क़ासिम भाई ने धीरे से हाथ पकड़कर उसे बैठने का इशारा किया। वो उसके सामने बैठ गए। "अच्छा है। डर के बिना लड़ने वाला या तो बेवकूफ़ है या झूठा। तुम्हारे पापा भी डरते थे।" उन्होंने दीये की लौ पर नज़र डाली। "उस रात उन्होंने मेरे पास बैठकर कहा था — 'क़ासिम भाई, मैं डरता हूँ, पर डर मुझे रोक नहीं सकता। सीता है, बच्चे हैं। उनके लिए सच ज़रूरी है।' और इसीलिए, बेटा, वो सबसे बहादुर थे।"
रवि ने बही को छुआ। उसकी उँगली जले किनारे पर रुक गई। "क़ासिम भाई, अगर उस… उस तीन में से एक में मैं आया, तो?"
क़ासिम भाई ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने बस उसका सिर सहलाया और दीया और ऊँचा कर दिया। "जाओ, बेटा। सुबह जल्दी उठना है।"
रवि बाहर निकला। ठंडी हवा चेहरे पर लगी। आसमान में चाँद आधा छिपा था। गाड़ी में लुट्टन हॉर्न बजाने ही वाला था कि रात की चुप्पी में दौड़ते पैरों की आवाज़ आई।
लुट्टन। वो घबराया हुआ भागता आ रहा था, हाथ में कुछ फटा-सा काग़ज़ लिए। "रवि! रवि, रुक!"
रवि गाड़ी के पास पहुँचा। "क्या हुआ? तू तो गाड़ी में था।"
"दुकान के शटर पर…" लुट्टन हाँफ रहा था, "…मैं गाड़ी लेने शटर के पास गया था, तो ये काग़ज़ चिपका मिला। किसी ने अभी चिपकाया है। स्याही भी गीली है।"
रवि ने काग़ज़ लिया। इरा ने मशीन की लाइट जलाई। रोहित भी पीछे आ गया।
काग़ज़ पर मोटे हाथ से लिखा था। रवि ने पहली लाइन पढ़ी और उसके हाथ ठंडे पड़ गए। दूसरी लाइन पढ़ी, तो उसने इरा का हाथ पकड़ लिया। तीसरी लाइन पढ़ी — और लुट्टन मुँह पर हाथ रखकर पीछे हट गया।
काग़ज़ पर सिर्फ़ तीन लाइनें थीं, और तीनों में एक-एक नाम लिखा था।
"अगर तुमने रविवार को कुछ किया — तो सबसे पहले ये तीन जानें जाएँगी। सीता देवी। पिंकी प्रसाद। और मुन्ना। जिसे तुम भाई कहते हो।"
रवि के हाथ से काग़ज़ फिसल गया। हवा ने उसे उड़ाया, और वो गली की धूल में जाकर गिरा।
इरा ने रवि का हाथ पकड़ा। "रवि, ये डराने की चाल है।"
पर रवि ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने सिर्फ़ घड़ी देखी, जो कलाई पर बंद थी और बिना रुके चल रही थी। और उसकी आवाज़ इतनी धीमी निकली कि सिर्फ़ इरा ने सुनी। "नहीं, इरा। ये डराने की चाल नहीं है। ये हमारे रास्ते की सबसे बड़ी कीमत की पहली किस्त है।"
॥
रवि ने गली की धूल से वो फटा काग़ज़ उठाया। उँगलियों में धूल चुभी, काग़ज़ का किनारा गीला था। उसने उसे दोनों हाथों से सीधा किया और फिर से पढ़ा — सीता देवी। पिंकी प्रसाद। और मुन्ना।
इरा ने उसके कंधे के ऊपर से झाँका। "रवि, इसे अपने पास मत रखो। ये सिर्फ़ डराने के लिए है।"
रवि ने काग़ज़ मोड़ा और जेब में रखा। "डराने के लिए ही तो रखूँगा, इरा। जब तक ये मेरी जेब में है, तब तक मुझे याद रहेगा कि मुझे किससे लड़ना है।"
लुट्टन ने उसकी तरफ़ देखा, कुछ कहने को हुआ, फिर चुप हो गया। उसने गाड़ी की चाबी रवि के हाथ में रख दी और खुद पीछे बैठ गया।
रोहित ने खिड़की से बाहर देखा। "मैं अपने पापा को जानता हूँ। अगर उसने तीन नाम लिखे हैं, तो उसने तीनों के घर की हवा भी नाप ली है। रात भर में कुछ हो सकता है।"
रवि ने गाड़ी स्टार्ट की। इंजन की आवाज़ रात में फैल गई। "इसीलिए मुझे दुकान जाना है। और तुम सब घर।"
इरा ने कहा, "मैं अपने घर जाऊँगी, पर सुबह चार बजे मैं तेरी दुकान पर होऊँगी, कैमरा लेकर। उससे पहले नहीं।"
रवि ने सिर हिलाया। गाड़ी चली।
दुकान पहुँचकर उसने शटर उठाया — छन्न! अंदर अंधेरा था, चाय की बासी गंध और लकड़ी की नमी। उसने लाइट जलाई, बेंच पर बैठा, और जेब से पापा की घड़ी निकाली।
घड़ी कलाई पर बंद थी, पर उसने खोली और दोनों हाथों में ले ली। चाँदी ठंडी थी। सुइयाँ चल रही थीं — टिक… टिक… टिक।
"पापा," उसने धीरे से कहा, "अगर तुम सुन रहे हो… कल सब सच होगा।" उसकी आवाज़ लड़खड़ाई। "मुझे नहीं पता कि मैं कर पाऊँगा या नहीं। पर आज रात मैं डरा हुआ हूँ। बहुत।" उसने घड़ी को माथे से लगाया। "माँ, पिंकी, मुन्ना भाई… तीनों। एक साथ। मैं कैसे सबको बचाऊँगा?"
घड़ी से कोई आवाज़ नहीं आई। बस टिक-टिक।
तभी बाहर साइकिल की घंटी बजी — टन… टन… टन। दरवाज़े पर पिंकी खड़ी थी, स्कूल का बैग कंधे पर, बाल बिखरे, सफ़ेद फ़ीता ढीला। वो अंदर आई और रवि को देखकर रुक गई।
"भैया, तुम अभी तक यहाँ हो? इरा दीदी ने बताया तुम आ गए।" वो पास आई, बैग रखा, और उसके सामने बैठ गई। "तुम डरे हुए हो।"
रवि ने मुस्कुराने की कोशिश की। "क्यों डरूँगा? मैं ठीक हूँ।"
"भैया।" पिंकी ने उसकी आँखों में देखा। "मैं तेरी बहन हूँ। तू जब झूठ बोलता है, तो पहले घड़ी देखता है।" उसने घड़ी पर उँगली रखी। "अभी तूने दो बार देखी।"
रवि चुप हो गया।
पिंकी ने उसका हाथ पकड़ा। "मुझे पता है तुम मुझे छिपाने के लिए कुछ कर रहे हो। कुछ बड़ा। मैं तुमसे छोटी हूँ, भैया, बेवकूफ़ नहीं।" उसकी आँखें भारी हो आईं, पर आवाज़ मज़बूत रही। "पर मैं डरने वालों में से नहीं हूँ। मैं प्रसाद हूँ।"
रवि ने उसे खींचकर गले लगा लिया। उसने पिंकी का सिर अपने कंधे पर रखा। उसकी आँखें जल रही थीं, पर वो कुछ नहीं बोला।
पीछे से बैसाखी की आवाज़ आई — टक… टक… टक। दरवाज़े पर मीरा खड़ी थी। एक टाँग पट्टी में, बैसाखी के सहारे, चेहरे पर पसीना, पर आँखों में वही पुरानी चिंगारी।
"भैया!" उसने कहा। "मैंने सुना है तू मैदान में सच बोलने जा रहा है।"
रवि उठा। "मीरा दीदी, आपको आना नहीं था। आपकी टाँग—"
"मेरी टाँग को भूल जा।" वो अंदर आई, बेंच पर बैठी, बैसाखी साथ रखी। "मैंने तेरी माँ से बात की। वो ठीक है, पर डॉक्टर ने कहा है कि एक हफ़्ता अस्पताल में रहना पड़ेगा।" उसने पिंकी की तरफ़ देखा। "और इसलिए मैं आई हूँ। मेरे यहाँ कोई किसी को छू भी नहीं सकता। पिंकी कल रात मेरे पास रहेगी।"
रवि ने सिर हिलाया। "नहीं, मीरा दीदी। पिंकी घर रहेगी। दादी कम्मो हैं ना—"
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