Billionaire Empire System797 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 797

7 min read November 7, 2026

रवि गलियारे में खड़ा रह गया। दीवार पर लगी घड़ी देखी। शाम के सात बजकर दस मिनट। उसने जेब से पापा की चाँदी की घड़ी निकाली। वो चल रही थी। उसने धीरे से कहा, "पापा, एक मोहर, एक नाम, एक काली कार। बस।"

तभी उसके कान में वो आवाज़ गूँजी, जो अब तक कई बार सुन चुका था। पर इस बार लहजा अलग था — जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो।

"मिशन पूरा। श्रीधर जोशी को ऑपरेशन थिएटर तक पहुँचाया। रिवॉर्ड: चार हज़ार पॉइंट।"

रवि की साँस रुक गई। गलियारे में मरीज़ों की भीड़ थी, कोई उसे देख नहीं रहा था। वो दीवार के सहारे खड़ा हो गया।

"नया मिशन: सारे गवाहों को एक जगह लाओ और सच का पहला सार्वजनिक खुलासा करो। पॉइंट: आठ हज़ार।"

रवि ने मन ही मन गहरी साँस ली। आठ हज़ार पॉइंट। इतने पॉइंट पहले कभी एक मिशन में नहीं मिले थे। पर अगली बात सुनकर उसकी गर्दन के बाल खड़े हो गए।

"चेतावनी: ये मिशन बिना नुकसान के पूरा नहीं होगा।"

रवि ने आँखें मूँद लीं। पहली बार उसने सिस्टम से सवाल किया। "कितना नुकसान?"

सन्नाटा।

"सुनाई दे रहा है? कितना नुकसान?"

फिर वो आवाज़ आई, इतनी धीमी कि जैसे कोई फुसफुसा रहा हो।

"तीन में से एक।"

रवि की मुट्ठी अपने आप भींच गई। "तीन में से एक क्या? कौन तीन? गवाह? या…" उसकी आवाज़ अटक गई। "या मेरे अपने?"

सिस्टम चुप रहा। ऐसे चुप रहा जैसे किसी ने मुँह फेर लिया हो।

रवि ने आँखें खोलीं। सामने माँ का ऑपरेशन थिएटर था, जिस पर लाल बत्ती जल रही थी। पिंकी वहीं बेंच पर बैठी थी, लुट्टन उसके पास चाय का कप लिए झपकी ले रहा था।

रवि को लगा, जैसे फ़र्श उसके पैरों के नीचे से थोड़ा धँस गया हो। उसने घड़ी फिर देखी। सेकंड की सुई चल रही थी, बिना रुके, बिना डरे। उसने धीरे से कहा, "पापा, आपने भी ये कीमत चुकाई थी, है ना?"

पिंकी ने आँख खोलकर देखा। "भैया? आप किससे बात कर रहे हैं?"

रवि ने घड़ी जेब में रखी और मुस्कुराने की कोशिश की। "किसी से नहीं। बस… सोच रहा था।" वो उसके पास बैठ गया। "तू सो जा। डॉक्टर आए, तो मैं जगा दूँगा।"

पिंकी ने उसके चेहरे को ग़ौर से देखा। बोली कुछ नहीं, बस उसका सिर अपने कंधे पर खींच लिया। रवि कुछ देर वैसे ही बैठा रहा। पर उसके दिमाग़ में सिर्फ़ एक लाइन घूम रही थी — तीन में से एक।

उसने लुट्टन को जगाया। "लुट्टन, उठ। माँ की बत्ती बुझने के बाद सीधे क़ासिम भाई के पास चलना है।"

लुट्टन ने आँख मलते हुए कहा, "यार रवि, रात के ग्यारह बजे श्मशान के पास? भगवान भी मुझे भूल गया है।" फिर उसने रवि का चेहरा देखा और चुप हो गया। "क्या हुआ? कुछ हुआ है। बता।"

"रास्ते में बताता हूँ।"

घंटे भर बाद लाल बत्ती बुझी। डॉक्टर जोशी बाहर आए, माथे पर पसीना, आँखों में थकान, पर होंठों पर मुस्कान। "बेटा, सब ठीक। माँ ज़िंदा है, और अब ख़तरे से बाहर है।"

रवि की टाँगें काँपीं, वो दीवार का सहारा लेकर खड़ा रहा। डॉक्टर जोशी ने उसका कंधा थामा। "देखो बेटा, अब सबसे ज़रूरी बात — अगले चौबीस घंटे में किसी को उनके पास बात करने मत देना। आराम। बस आराम।"

रवि ने डॉक्टर जोशी के पैर छूने चाहे, पर डॉक्टर ने हाथ पकड़कर रोक दिया। "ये क्या कर रहे हो? मैं तुम्हारा डॉक्टर हूँ, तुम्हारे पापा का दोस्त नहीं…" वो रुके और फिर धीरे से बोले, "ख़ैर, दोस्त भी हूँ। जाओ, अब आराम करो। कल सुबह मिलते हैं।"

पर रवि को पता था कि आज रात आराम नहीं मिलेगा।

श्मशान की झोपड़ी में दीये की रोशनी धीमी थी। क़ासिम भाई बही के पन्नों पर झुके बैठे थे। सामने लकड़ी के तख़्त पर रवि, लुट्टन और इरा बैठे थे। इरा देर से आई थी, उसके बाल बारिश में भीगे थे और हाथ में मशीन का बैग था।

रवि ने सब कुछ कह दिया। सिस्टम की आवाज़, चार हज़ार पॉइंट, नया मिशन, और वो चेतावनी — तीन में से एक।

क़ासिम भाई ने सुना। बिना टोके। बिना हिले। फिर उन्होंने बही बंद की और तीसरी बार अपना काला चश्मा उतारा। रवि ने पहली बार उनकी आँखें देखीं — धुँधली, थकी, पर एक अजीब सी शांति से भरी।

"बेटा, सच की कीमत होती है।" क़ासिम भाई ने कहा। "तुम्हारे पापा ने भी चुकाई थी। मुझे याद है, उस रात उन्होंने मुझे फ़ोन किया था। कहा था — 'क़ासिम भाई, काग़ज़ तुम्हारे पास हैं, और अब मैं जानता हूँ कि मुझे क्या कीमत चुकानी है।' मैंने पूछा था, 'क्या कीमत?' तो वो हँसे थे और बोले थे — 'जो भी हो, मेरे बेटे को उसका पता नहीं चलेगा।'"

रवि ने नज़र नीची कर ली। दीये की लौ काँप रही थी।

लुट्टन ने कुर्सी पर पीछे टेक लगाई। "यार, ये सिस्टम भी ना… कभी-कभी ऐसी बात बोल जाता है कि सीधे दिल पर लगती है। तीन में से एक! मतलब क्या? हम तीन लोग हैं — मैं, तू और इरा?"

"या तीन गवाह," इरा ने कहा। "अनवर, मुन्ना भाई और रघुवीर।"

"या तीन काग़ज़," रवि ने धीरे से कहा। "बयान, शीशी की रिपोर्ट, और पापा की बही।"

क़ासिम भाई ने चश्मा वापस लगाया। "जो भी हो, बेटा, ये बात तुम्हें डराने के लिए नहीं कही गई है। ये बताने के लिए कही गई है कि तुम तैयार रहो। जो कीमत होगी, वो किसी न किसी से जाएगी। पर अगर तुमने सोच-समझकर कदम रखा, तो वो कीमत छोटी हो सकती है।"

तभी दरवाज़े पर खटखट हुई। लुट्टन उछल पड़ा। "अरे बाप रे! इस वक़्त कौन?"

दरवाज़ा खुला, तो बाहर रोहित खड़ा था — सफ़ेद कमीज़ पर धूल, बाल बिखरे, और पीछे काली गाड़ी की हेडलाइट गली में पड़ रही थी। "मैंने सुना है आज रात कोई मीटिंग है। मुझे बिना बुलाए मत छोड़ना।"

रवि ने उसे अंदर आने का इशारा किया। "तुम्हें कैसे पता?"

"जग्गू ने मैसेज किया।" रोहित ने जेब से फ़ोन निकाला। "और एक बात — उसने लिखा है कि आज शाम को तुम्हारे पापा का कोई पुराना साथी बंगले पर आया था। बलवंत से मिलने। वो अब तक भीतर है।"

क़ासिम भाई की उँगलियाँ बही पर रुक गईं। "कैसा दिखता था?"

"जग्गू ने लिखा है — बूढ़ा, सफ़ेद बाल, हाथ में लाठी, और कमर पर एक पुरानी घड़ी लटकी थी।"

क़ासिम भाई ने एक लंबी साँस ली। "पंडित रामदीन।" उनकी आवाज़ में एक अजीब सी कंपन थी। "ट्रस्ट का पुराना मुंशी। मैंने सोचा था वो मर गया।"

"कौन?" रवि ने पूछा।

"वो आदमी, बेटा, जिसने ट्रस्ट की असली बही छिपाई थी। और जिसे सिर्फ़ तुम्हारे पापा जानते थे।" क़ासिम भाई ने बही पर हाथ रखा। "अगर वो बलवंत से मिलने गया है, तो सीधा-सीधा मतलब — वो कुछ लेकर गया है। और शायद… शायद वो बही लेकर गया है।"

रवि खड़ा हो गया। कमरे में सन्नाटा छा गया। इरा ने अपनी मशीन का बैग उठाया। "तो अब क्या?"

रवि ने सबकी तरफ़ देखा। लुट्टन, इरा, रोहित, क़ासिम भाई। और फिर वो बोला, "अब और इंतज़ार नहीं। कल नहीं, परसों नहीं — इस रविवार। सुबह दस बजे। सेवा सदन के सामने वाला खुला मैदान।"

लुट्टन ने कुर्सी पकड़ ली। "रविवार? यानी चार दिन बाद?"

"हाँ। चार दिन में हम सारे गवाह जुटा लेंगे। अनवर, मुन्ना भाई, जग्गू, और अगर हो सके तो रघुवीर भी।" रवि ने इरा की तरफ़ देखा। "तेरा चैनल?"

इरा ने मशीन का बैग मज़बूत किया। "इरादा बना लिया है। उस दिन चैनल पर लाइव चलेगा। चाहे बॉस कुछ भी कहे।" उसने रवि को सीधा देखा। "मेरे पास दो कैमरे हैं। एक सामने, एक पीछे। कोई चाहे भी, तो भी बंद नहीं कर सकेगा।"

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