Billionaire Empire System796 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 796

7 min read November 7, 2026

लुट्टन बाहर बेंच पर बैठा था, हाथ में तीन चाय के गिलास। "यार, तेरा चेहरा देखकर लग रहा है मैंने चार नहीं, चालीस चाय लानी थीं।"

रवि बेंच पर बैठ गया। उसने गिलास पकड़ा, और हाथ काँप रहे थे। "लुट्टन, वो करीम… जाते-जाते धमकी दे गया। माँ, पिंकी, सबका नाम लिया।"

लुट्टन ने पान का पत्ता चबाया और कहा, "तो क्या हम डर के मारे काग़ज़ फाड़ दें? सुन, मेरे पापा कहते थे — 'भगवान भी मुझे भूल गया है' वाली बात मैं हर हफ़्ते बोलता हूँ, पर सच ये है कि भूलता कोई नहीं है। बस हिसाब लेने में देर लगती है।" उसने रवि के कंधे पर हाथ रखा। "आगे जो होगा, साथ में होगा।"

कुछ देर बाद डॉक्टर जोशी आए। उनकी कलाई पर पट्टी बँधी थी, चश्मा नया था, पर चाल में वो सीधापन लौट आया था जो रवि ने गेस्ट हाउस के अंधेरे कमरे में नहीं देखा था।

"माँ ठीक हैं," उन्होंने कहा। "और वो बूढ़े… उनकी टाँग में हड्डी पर चोट नहीं, बस गहरा नील है। दो हफ़्ते में चलने लगेंगे।"

"थैंक्यू, सर।"

डॉक्टर जोशी कुछ देर रवि को देखते रहे, फिर बोले, "बेटा, मैंने तुमसे वादा लिया था — सोनू की फ़ीस का।" वो रुके। "अब मैं तुमसे एक और बात कहना चाहता हूँ। जब वो सफ़ेद कोट वाला मुझे गेस्ट हाउस में बंद कर रहा था, तो उसने एक बात कही थी जो मुझे समझ नहीं आई। उसने कहा — 'डॉक्टर साहब, आपको चाय वाले के पास जाना ही नहीं था। आपने अपने हाथ जला लिए।'"

रवि ठिठका। "उसे कैसे पता था कि मैं आपके पास आऊँगा?"

डॉक्टर जोशी ने सिर हिलाया। "यही मैं भी सोच रहा हूँ। जैसे उन्हें सब पहले से पता था।"

शाम को जब माँ को नींद आई, रवि ने मुन्ना भाई का व्हीलचेयर अस्पताल के बाहर आँगन में लाकर रोका। नीचे बबूल का पेड़ था, और उसकी छाया में एक पुरानी बेंच।

रवि उनके सामने बैठ गया और पैर छू लिए। मुन्ना भाई हड़बड़ा गए और हाथ जोड़कर पीछे हटे।

"अरे नहीं बेटा! तू मेरे पैर क्यों छू रहा है? मैं तो भिखारी हूँ।"

रवि ने सिर नहीं उठाया। "आप भिखारी नहीं हैं। आप मेरे पापा के बाद सबसे बहादुर आदमी हैं।"

मुन्ना भाई की आँखें फैल गईं। फिर कुछ ऐसा हुआ जो रवि ने उम्मीद नहीं की थी — वो रोने लगे, पर हँसते हुए। कंधे हिल रहे थे, आँसू दाढ़ी में गिर रहे थे, और हँसी किसी बच्चे जैसी थी।

"दस साल, बेटा," वो हँसते-रोते बोले, "दस साल इस गली में हर आदमी मुझे पागल कहता आया है। एक तू है जो बहादुर कह रहा है।"

रवि भी मुस्कुरा दिया। "मुन्ना भाई, अब आपको डरने की ज़रूरत नहीं है। अब मैं हूँ।"

मुन्ना भाई ने आँसू पोंछे, फिर अचानक गंभीर हो गए। उन्होंने चारों तरफ़ देखा, और आवाज़ इतनी धीमी कर दी कि पेड़ की पत्तियों की सरसराहट भी उससे तेज़ लगी।

"बेटा, एक बात और…" उन्होंने रवि का कुर्ता पकड़कर अपने पास खींचा। "उस सफ़ेद कोट वाले के हाथ में एक काग़ज़ भी था। तेरे पापा ने उस पर कुछ लिखा था। उसने उसे पढ़ा और जल्दी से अपनी जेब में रख लिया।"

रवि की साँस रुक गई।

"और उस काग़ज़ पर —" मुन्ना भाई ने एक पल आँखें बंद कीं, जैसे दस साल पुरानी स्याही पढ़ रहे हों, "मुझे ऐसा लगा… तेरे और मेरे सिवाय सिर्फ़ एक और नाम लिखा था।"

रवि ने मुन्ना भाई का हाथ पकड़ लिया। "कौन सा नाम? याद करो, भाई। ज़रा सोचो।"

मुन्ना भाई ने आँखें मूँद लीं। माथे पर पसीना आ गया था। "दस साल हो गए, बेटा। स्याही धुँधली थी, और मैं डर के मारे भाग गया था। पर वो नाम… वो नाम मैंने कहीं सुना था। मालूम है, जैसे कोई जाना-पहचाना नाम हो, पर ज़ुबान पर न आए।"

"सोचो ना, भाई। कोई अक्षर, कोई आवाज़?"

मुन्ना भाई ने सिर हिलाया। "बस इतना याद है कि नाम के आगे कोई पद था। जैसे… जैसे किसी डॉक्टर का नाम हो, या किसी साहब का।" वो रुके और फिर धीरे से बोले, "और वो सफ़ेद कोट वाला जब काग़ज़ जेब में रख रहा था, तो उसके हाथ काँप रहे थे। डरा हुआ था, बेटा। जैसे उसने कुछ ऐसा किया हो जो उसे खुद भी नागवार लगा।"

रवि ने आसमान की तरफ़ देखा। बबूल की पत्तियों के बीच से शाम की आख़िरी रोशनी छन रही थी। कुछ देर वो चुप बैठा रहा। फिर बोला, "भाई, आपने मुझे आज वो दिया है जो पापा के जाने के बाद किसी ने नहीं दिया — एक सुराग़। बस एक नाम, और मैं उस आदमी तक पहुँच जाऊँगा।"

मुन्ना भाई ने रवि का चेहरा देखा। "तू डरता नहीं?"

"डरता हूँ," रवि ने सीधा कहा। "रात को आँख नहीं लगती। पर आज अस्पताल में माँ को देखा, तो समझ आया — डर के आगे झुकना, यही तो पापा की मौत थी। अब मैं नहीं झुकूँगा।"

व्हीलचेयर की छाया लंबी हो रही थी। मुन्ना भाई ने रवि का कंधा थामा। "सुन, एक बात और। उस रात के बाद कुछ दिनों तक मैंने उस सफ़ेद कोट वाले को गली में दो-तीन बार देखा। हमेशा शाम को, हमेशा किसी कार में। एक बार उसने मुझे देखा भी, और मैंने नज़र चुरा ली। फिर वो गायब हो गया। जैसे धरती ने निगल लिया।"

"कार का रंग याद है?"

"काली," मुन्ना भाई ने बिना रुके कहा। "बड़ी काली कार। उस पर कोई निशान था — बोनट पर एक छोटा-सा सफ़ेद चिन्ह। मैंने उसे ग़ौर से देखा था, क्योंकि वो ऐसा लगा जैसे कोई चिड़िया हो, या कोई पत्ता।"

रवि ने माथा सहलाया। "काली कार, सफ़ेद निशान, और उस पर एक पद वाला नाम।" उसने मुट्ठी भींची। "भाई, ये तीन चीज़ें बहुत हैं। मैं इन्हें लेकर चलूँगा।"

अंदर से नर्स की आवाज़ आई — "मुन्ना जी, दवाई का वक़्त हो गया।" रवि व्हीलचेयर घुमाने लगा, तो मुन्ना भाई ने उसका हाथ रोक दिया।

"बेटा, एक बात मान ले। जब भी उस आदमी तक पहुँचे, अकेले मत जाना। वो आदमी…" उनकी आवाज़ भर्रा गई, "वो आदमी देखने में कुछ भी नहीं लगता। पर उसकी आँखों में जो था, वो मैंने कहीं और नहीं देखा। बेटा, वो इंसान नहीं है। उसके अंदर कुछ और बैठा है।"

रवि रुका। उसकी जेब में रखी ठंडी धातु एक पल को गरम पड़ गई, जैसे अंदर से कोई जवाब दे रहा हो। उसने कुछ नहीं कहा, बस सिर हिलाया और व्हीलचेयर अंदर धकेल दी।

दरवाज़े पर पहुँचकर मुन्ना भाई ने पीछे मुड़कर देखा। "रवि, वो नाम… जब याद आए, तो सबसे पहले तुझे बताऊँगा। चाहे रात हो या बरसात, मैं तेरे दरवाज़े पर होऊँगा।"

रवि मुस्कुराया। "मुझे पता है, भाई। अब आप ही तो हैं जो मेरे साथ खड़े हैं।"

॥

"भाई, रुकिए।" रवि ने व्हीलचेयर का हैंडल छोड़ दिया और मुन्ना भाई के सामने घुटने के बल बैठ गया। "आपने अभी कहा — उस काग़ज़ पर मेरे और आपके सिवाय किसी और का नाम लिखा था। किसका नाम, भाई? ज़रा ठहरिए, याद कीजिए।"

मुन्ना भाई की आँखें फिर मूँद हो गईं। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। कुछ देर बाद उन्होंने आँखें खोलीं और धीरे से सिर हिलाया। "बेटा, उस रात सब कुछ धुँधला था। बरसात के बाद की भीगी हवा, दुकान के बाहर टिमटिमाती बत्ती, और वो सफ़ेद कोट…" वो रुक गए। "नाम याद है, पर ज़ुबान पकड़ में नहीं आता। जैसे किसी ने मेरे दिमाग़ पर उँगली रखकर लिखा हो और मिटा दिया हो।"

रवि ने उनका हाथ नहीं छोड़ा। "कोई बात नहीं, भाई। आपने जो बताया, वो काफ़ी है। काली कार, बोनट पर सफ़ेद निशान, और काग़ज़ पर एक पद वाला नाम। बस इतना है, तो मैं पूरा शहर छान डालूँगा।"

नर्स फिर आवाज़ देने लगी। इस बार मुन्ना भाई ने खुद व्हीलचेयर आगे बढ़ाई। पर दरवाज़े से पहले उन्होंने रवि की तरफ़ मुड़कर एक आख़िरी बात कही। "बेटा, उस काग़ज़ पर एक और बात थी। नीचे लाल स्याही से कोई मोहर थी। गोल, बड़ी। जैसे किसी दफ़्तर की मोहर होती है।" वो अंदर चले गए।

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