Billionaire Empire System – Chapter 795
अस्पताल के गेट पर लुट्टन गाड़ी रोक ही रहा था कि पीछे से एक तेज़ हॉर्न बजा। एक काली गाड़ी उनके बराबर रुकी और उसकी खिड़की से जग्गू का चेहरा निकला। वो कुछ नहीं बोला — बस रवि की तरफ़ देखा, फिर इरा की तरफ़, और फिर अपनी उँगली से अस्पताल के दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया, जैसे कह रहा हो — इस बूढ़े को जल्दी अंदर ले जाओ।
लुट्टन ने खिड़की से सिर निकालकर कहा, "अरे जग्गू, तू अब भी हमारे पीछे-पीछे?"
जग्गू ने गाड़ी आगे बढ़ा दी, पर रवि ने देखा कि उसकी गाड़ी का दरवाज़ा रवि की तरफ़ से खुला था — हल्का-सा, एक बाल जितना — जैसे वो कुछ कहना चाहता था और नहीं कह पाया।
मुन्ना भाई को स्ट्रेचर पर लिटाते वक़्त उन्होंने रवि का कुर्ता पकड़ लिया। "सुन…" उनकी आवाज़ अब भी काँप रही थी, पर कुछ ठंडी हो गई थी, "करीम ने जो काग़ज़ों की बात कही… वो मेरी टाँग के नीचे दबे थे। मैंने उन्हें छिपा दिया है। जगह मैं तुझे अकेले में बताऊँगा। इरा मैडम के सामने नहीं…" और उन्होंने धीरे से आँख मूँद ली, जैसे ये बात कहकर ही थक गए हों।
रवि ने स्ट्रेचर के साथ-साथ चलते हुए सिर हिला दिया और उनका हाथ नहीं छोड़ा। वार्ड के दरवाज़े पर नर्स ने उसे रोका। इरा ने उसका कंधा थामा और कहा, "तुम यहाँ रुको। मैं अंदर जाकर देखती हूँ कि पर्चा कटवाना है या पहले डॉक्टर।"
रवि दीवार से टेक लगाकर खड़ा हो गया। पूरे अस्पताल में दवा की गंध थी, और दूर किसी वार्ड से मशीन की धीमी बीप आ रही थी। उसने जेब से वो लाल किताब निकाली और उसका पन्ना खोला — उस पन्ने पर जो नाम मिट गया था, अब उँगली फेरने पर भी कुछ उभरता नहीं था। उसने आवाज़ धीमी करके कहा, "तू चुप क्यों है आज?"
कोई जवाब नहीं आया। बस दीवार के पीछे से एक ट्रॉली की चरचराहट आई।
तभी उसकी जेब में मोबाइल काँपा — रोहित का नाम। उसने उठाया।
"रवि, तू सुन रहा है? जग्गू ने अभी मुझे मैसेज किया है।" रोहित की आवाज़ में पहली बार डर था, वो डर जो अब तक सिर्फ़ रवि के हिस्से में था। "उसने लिखा है — 'तुम्हारे पापा ने मुझे मारने को भेजा था, पर मैंने लाठी रोक दी। अब तुम्हारे पापा को ये बात पता चलेगी, तो वो तुम्हें भी नहीं बख्शेंगे। तू सुन ले — जो काग़ज़ रवि के पास हैं, वो घर से निकल गए, तो सब खत्म।'"
रवि ने आँखें बंद कर लीं। "उसने ऐसा क्यों लिखा?"
"मुझे नहीं पता, रवि। वो जग्गू है — किसी से कुछ नहीं बोलता। आज पहली बार इतना लिखा है।" रोहित एक पल रुका और फिर उसकी आवाज़ टूटी, "मैं अपने पापा के घर में हूँ, और मुझे लग रहा है मैं जेल में हूँ। तू बता… मुझे क्या करना चाहिए?"
॥
कारख़ाने के पीछे गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ — धप! इतनी तेज़ कि लुट्टन का हाथ अपने आप रवि की बाँह पर चला गया। करीम ने लाठी नीचे कर दी और उसका सिर झुक गया, जैसे किसी ने उसके अंदर का तेज़ बुझा दिया हो।
"अपने बूढ़े को ले जा," करीम ने कहा। आवाज़ में अब वो भारीपन नहीं था, बस थकान थी। "पर सुन ले, चाय वाले… जो काग़ज़ तेरे पास हैं, वो जज तक नहीं पहुँचने देंगे। अदालत से पहले तेरी माँ, तेरी बहन… ध्यान से।"
वो पलटा और अंधेरे में घुल गया। रवि ने उसकी गाड़ी की लाल बत्ती दूर तक जाते देखी, फिर मुन्ना भाई की तरफ़ दौड़ा। बूढ़े आदमी की कलाई रस्सी में इतनी कसी थी कि खून की लकीर बन गई थी। रवि ने चाकू निकाला और रस्सियाँ काटनी शुरू कीं।
"बेटा, जल्दी कर…" मुन्ना भाई की आवाज़ फटी थी, "कहीं वो लौटकर न आ जाए।" और फिर उनकी नज़र अपने पैर पर पड़ी, और वो चुप हो गए।
टाँग सूजी हुई थी, घुटने से नीचे तक नीली पड़ गई थी। करीम की लाठी ने पिंडली पर निशान छोड़ा था। रवि ने हाथ लगाया तो मुन्ना भाई ने दाँत भींच लिए।
"चल पाओगे?"
"चलूँगा क्यों नहीं…" वो उठने की कोशिश कर ही रहे थे कि पैर जवाब दे गया। लुट्टन ने आगे बढ़कर कहा, "मैं उठाता हूँ।" पर रवि पहले झुक गया।
"आ जाओ।" उसने पीठ दी।
"अरे नहीं बेटा, मैं… मैं तो—"
"आ जाओ, मुन्ना भाई। वक़्त नहीं है।"
मुन्ना भाई एक पल रुके, फिर हाथ रवि के कंधे पर रख दिए। उनका शरीर हल्का था — इतना हल्का कि रवि का दिल बैठ गया। एक पूरा आदमी, और वज़न किसी बच्चे जितना।
कारख़ाने के टूटे गेट से बाहर निकलते वक़्त मुन्ना भाई ने रवि के कान के पास धीरे से कहा, "बेटा, मैंने उस रात एक सफ़ेद कोट वाले को तेरे पापा के कमरे से निकलते देखा था।"
रवि के कदम रुके।
"वो जल्दी-जल्दी जा रहा था, हाथ में सुई थी। मैंने उसकी तरफ़ देखा तो वो मुड़ा।" मुन्ना भाई ने साँस ली, जैसे दस साल की रुकी हुई साँस अब निकल रही हो। "उसने कहा — 'अगर बोला, तो तेरी टाँग भी नहीं बचेगी।' और मैं चुप रहा। दस साल, बेटा। तेरे पापा मेरी टाँग के नीचे आकर मरे, और मैं… मैं अपनी टाँग बचाने के लिए चुप रहा।"
लुट्टन ने पीछे से कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने मुँह फेर लिया।
रवि ने कुछ नहीं कहा। वो बस चलता रहा, और उसके कंधे पर पड़ा हाथ धीरे-धीरे काँप रहा था।
अस्पताल पहुँचते-पहुँचते पौ फटने को आई थी। इमरजेंसी के बाहर नर्स ने देखा तो दौड़कर आई। "क्या हुआ इन्हें?"
"गिर गए थे," रवि ने कहा। मुन्ना भाई ने उसकी तरफ़ देखा, पर कुछ नहीं बोले।
स्ट्रेचर पर लिटाते वक़्त मुन्ना भाई ने रवि का कुर्ता पकड़ लिया। "सुन… करीम ने जो काग़ज़ों की बात कही… वो मेरी टाँग के नीचे दबे थे। मैंने उन्हें छिपा दिया है। जगह मैं तुझे अकेले में बताऊँगा। इरा मैडम के सामने नहीं।" और उन्होंने आँखें मूँद लीं। "मुझे उन मैडम से शर्म आती है।"
रवि ने सिर हिलाया और उनका हाथ नहीं छोड़ा।
वार्ड के दरवाज़े पर इरा खड़ी थी। उसने रवि का चेहरा देखा और बिना सवाल किए कहा, "मैं पर्चा कटवा लाई हूँ। डॉक्टर आ रहे हैं।" फिर उसने मुन्ना भाई की तरफ़ देखा और उसकी आवाज़ नरम पड़ गई। "आप ठीक हैं?"
मुन्ना भाई ने आँखें खोलीं और पहली बार किसी से सीधा बोले, "अब ठीक हूँ, मैडम। बेटा मिल गया।"
इरा कुछ नहीं बोली, बस पलटकर दीवार की तरफ़ देखने लगी।
भीतर वार्ड में सीता देवी की आँखें खुली थीं। बेड के पास रखी कुर्सी पर बैठकर रवि ने धीरे से कहा, "माँ, एक आदमी है… मुझे लगा तुमसे मिलाना चाहिए।"
जब मुन्ना भाई को व्हीलचेयर पर वार्ड में लाया गया, तो माँ एक पल के लिए चुप रहीं। फिर उन्होंने देखा — फटा कुर्ता, गले में तुलसी की माला, टेढ़ी टाँग, और वो चेहरा जो हर रोज़ दुकान के सामने धूप में बैठता था।
"तुम…" सीता देवी की आवाज़ रुँध गई। "तुम वही हो ना? जो हमारी दुकान के सामने…"
मुन्ना भाई ने नज़र चुराई।
माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू उठाया और उनके घुटने पर रख दिया। हाथ काँप रहे थे। "तुमने देखा था ना? उस रात… तुमने देखा था, और तुमने किसी को नहीं बताया।" उनकी आँखों से पानी बहने लगा, पर आवाज़ में गुस्सा नहीं था — बस एक पुराना, दबा हुआ दर्द। "मैं तुम्हें दोष नहीं देती। मेरे पति भी तो डर के मारे ही मरे थे। सब डरते हैं।"
मुन्ना भाई रो पड़े। "माफ़ कर दो, बहन… मैं रोज़ तुम्हारी दुकान के सामने बैठता था, और रोज़ चुप रहता था।"
रवि वहाँ खड़ा नहीं रह सका। वो बाहर निकल आया।
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