Billionaire Empire System794 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 794

7 min read November 7, 2026

करीम की लाठी हवा में ही अटक गई। उसने धीरे से हाथ नीचे किया और जग्गू की तरफ़ फिरकर देखा।

"साहब ने कहा है?" करीम ने तमंचे की तरफ़ इशारा किया, जैसे वो कोई खिलौना हो। "जग्गू, तू साहब का आदमी है, और साहब का आदमी मेरे सामने बंदूक तानेगा? ये तेरे पापा का क़र्ज़ है या बदला?"

जग्गू का तमंचा नहीं हिला। उसकी आँखें करीम की आँखों पर जमी थीं, पर उसके गाल पर एक माँसपेशी काँप रही थी — इतनी ज़रूर जो बताती हो कि अंदर कुछ चल रहा है।

"करीम भाई," जग्गू ने कहा, और उसकी आवाज़ खुरदरी थी, जैसे बहुत साल पहले इस्तेमाल हुई हो और उसकी जंग अभी टूट रही हो, "साहब ने कहा था कि ये बूढ़ा गवाह मर गया, तो मेरे पापा का क़र्ज़ उतर जाएगा।" उसने तमंचा ज़रा भी नीचे नहीं किया। "पर साहब ने ये नहीं कहा था कि क़र्ज़ चुकाने के लिए मुझे एक और आदमी मारना पड़ेगा।"

करीम ने तिरछी नज़र से देखा। "तू क्या कह रहा है, जग्गू?"

जग्गू ने गला साफ़ किया, और उसका तमंचा हल्का काँपा, पर गिरा नहीं। "मैंने एक आदमी को मारते देखा है, करीम भाई। एक बार। बारह साल पहले। उस रात मुझे उल्टी आई थी, और मैंने साहब से कहा था — 'साहब, अब नहीं।' साहब ने कहा था — 'ठीक है जग्गू, अब तू सिर्फ़ साया बनकर चल।'" उसकी आवाज़ अब थोड़ी ऊँची थी, थोड़ी साफ़। "मैं बारह साल साया बना फिरा। साये को कोई गवाही नहीं देते, साये को कोई पूछता नहीं। पर अब मैं ये नहीं करूँगा।"

कारख़ाने में एक पल के लिए सिर्फ़ टपकती बूँदों की आवाज़ रह गई। छन्… छन्… छन्…

करीम ने जग्गू को देखा, फिर रवि को, फिर लुट्टन को, जो एक टूटी मशीन की आड़ में खड़ा था और जिसकी टाँगें ज़ोर-ज़ोर से काँप रही थीं। करीम ने धीरे से लाठी नीचे की और उसका सिरा ज़मीन पर टिका दिया। उसकी साँस भारी थी।

"साहब को पता चलेगा," करीम ने कहा, पर उसकी आवाज़ में अब वो ठंडक नहीं थी। "और साहब सिर्फ़ एक बार माफ़ करते हैं, जग्गू। तू जानता है।"

"जानता हूँ।" जग्गू ने तमंचा नीचे किया, पर अपनी बगल में ही रखा। "पर अब माफ़ी माँगने का वक़्त नहीं है, करीम भाई। अब मुझे नींद में भी वो रात दिखती है।"

करीम उसे देखता रहा। फिर उसने अपनी लाठी कंधे पर रखी और मुन्ना भाई की रस्सी खोल दी — पूरी नहीं, सिर्फ़ ढीली। "अपने बूढ़े को ले जा।" वो पलटा और रवि की तरफ़ आया, इतने पास कि उसके सफ़ेद कुर्ते से नफ़्तेलिन की गंध आने लगी। "पर सुन ले, चाय वाले…" उसकी आवाज़ अब बिलकुल धीमी थी, जैसे वो कोई राज़ बता रहा हो। "जो काग़ज़ तेरे पास हैं, वो जज तक नहीं पहुँचने देंगे। अदालत से पहले तेरी माँ, तेरी बहन… ध्यान से।"

वो मुड़ा और जाने लगा। उसके जूतों की आवाज़ कच्चे फ़र्श पर दूर तक गूँजती रही। और तभी रवि ने सुना — कारख़ाने के पीछे, दूर किसी गली में, एक गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ — ठक! — और इंजन की आवाज़ उठी और धीमी पड़ गई।

रवि एक पल खड़ा रहा, फिर लपककर मुन्ना भाई के पास पहुँचा और रस्सियाँ खोलने लगा। उनकी कलाइयाँ रस्सी से कटी हुई थीं, और टाँग का घुटना सूजकर दुगना हो गया था। मुन्ना भाई ने रवि का चेहरा देखा और उनके होंठ काँपे।

"बेटा… मैंने तुझे बता दिया ना? मैंने बता दिया?"

"बता दिया, मुन्ना भाई।" रवि की आवाज़ भर्रा गई, पर उसने उसे सँभाला। "अब चुप रहिए। बस चुप रहिए।" उसने मुन्ना भाई की दूसरी टाँग पर हाथ रखा — ठंडी थी।

लुट्टन ने तुरंत अपनी बनियान उतारी और उसे मुन्ना भाई के घुटने पर रख दिया। "ये… ये ठंडी न हो," वो हकलाया, "मेरी बनियान में लानत है, पर ये ठंडी न हो।"

जग्गू अभी भी दरवाज़े पर खड़ा था, तमंचा अब नीचे। रवि ने उसकी तरफ़ देखा। और जग्गू ने, जो पूरी कहानी में किसी की आँखों में आँखें डालकर नहीं देखता था, पहली बार रवि की नज़र मिलाई — और फिर झुका कर अपने जूतों को देखने लगा।

"तू क्यों आया?" रवि ने पूछा।

जग्गू ने कंधे उचकाए। "साहब ने भेजा था कि बूढ़े को कारख़ाने से हटा दो।" वो एक पल रुका। "पर साहब ने ये नहीं कहा था कि मुझे करीम की लाठी रोकनी है। वो मैंने खुद सोचा।"

लुट्टन ने अपनी छाती पर हाथ रखा। "भगवान भी मुझे भूल गया है, पर आज तूने याद रखा, जग्गू। तेरे लिए मेरी दुकान पर पान हमेशा मुफ़्त।"

जग्गू के चेहरे पर कुछ हिला — हो सकता है हँसी की कोशिश हो, या कुछ और। वो कुछ नहीं बोला, बस तमंचा अपनी कमर में खोंसकर पलट गया और अंधेरे में चला गया। रवि ने देखा कि उसकी चाल में अब वो साये जैसी खामोशी नहीं थी — अब उसमें ज़मीन पर पैर पड़ने की आवाज़ थी।

रवि ने मुन्ना भाई को उठाने की कोशिश की, पर वो एक टाँग से खड़े नहीं हो पा रहे थे। तो उसने झुककर उन्हें अपने कंधे पर उठा लिया। मुन्ना भाई का शरीर हल्का था — इतना हल्का कि रवि के कंधे पर एक बच्चे जैसा लगा, और ये सोचकर उसका गला भर आया कि ये आदमी दस साल से उनकी दुकान के बाहर सिर्फ़ एक चटाई पर सोया है।

"भैया…" मुन्ना भाई ने उसके कान में धीरे से कहा, "तू मुझे छोड़ दे… मैं भारी हूँ।"

"आप चुप रहिए।" रवि ने कसकर पकड़ा। "आज पूरी गली आपको उठाकर ले जाएगी, अगर ज़रूरत पड़ी तो।"

बाहर आकर इरा ने उन्हें देखा और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने तुरंत अपना बैग खोला और उसमें से पानी की बोतल निकाली। कोमल अभी आई नहीं थी, पर दूर मोड़ पर एक स्कूटी की आवाज़ आ रही थी। इरा ने मुन्ना भाई के मुँह पर पानी की कुछ बूँदें डालीं और फिर रवि की तरफ़ देखा।

"कारख़ाने के पीछे से एक गाड़ी गई है।" रवि ने मुन्ना भाई को ज़मीन पर बैठाया।

"करीम?"

"हाँ।" रवि ने अपनी कलाई देखी। "उसने धमकी दी — अदालत से पहले माँ, बहन।"

इरा ने पानी की बोतल का ढक्कन बंद किया, और उसकी आवाज़ में वो शांत गुस्सा था जो रवि ने पहली बार उसके चेहरे पर देखा था। "तो अब हमें अदालत जल्दी लानी पड़ेगी। बहुत जल्दी।"

लुट्टन ने अपनी बनियान वापस पहनी — अब उस पर मुन्ना भाई के घुटने की धूल और कुछ सूखा खून था — और गाड़ी की तरफ़ देखा। "पहले इस बूढ़े को अस्पताल। फिर सोचेंगे।"

रवि ने मुन्ना भाई को गाड़ी में बिठाया और उनके सिर को अपनी जैकेट पर टिका दिया। कारख़ाने से निकलते वक़्त उसने एक बार पलटकर पीछे देखा — उस टूटी छत, उन जंग लगी मशीनों, उस लोहे की कुर्सी को, जिस पर कुछ मिनट पहले एक बूढ़ा आदमी अपनी टाँग की कीमत पर सच बचा रहा था।

और उसके मुँह से बिना सोचे निकल गया, "अगर ये शहर सच नहीं सुनता… तो मैं इस शहर की चाय में सच घोलकर पिलाऊँगा।"

लुट्टन ने गाड़ी की चाबी घुमाई और मुस्कुराया। "बस एक बात का ध्यान रख, यार — उस दिन मुझे भी एक कप मिले, थोड़ी ज़्यादा चीनी के साथ।"

गाड़ी अस्पताल की तरफ़ भाग रही थी, पर मुन्ना भाई की साँस रवि के कान के पास धीमी-धीमी चल रही थी। उन्होंने रवि का हाथ पकड़ा और उँगलियों में जान डालकर कहा, "बेटा… तेरे पापा… उस दिन कारख़ाने में… मेरी टाँग के नीचे आ गए थे। मैंने उन्हें खींचा, पर…"

"आप चुप रहिए, बाबा।" रवि ने उनकी उँगलियाँ अपनी हथेली में भींच दीं। "अब मुझे सब पता है। और अब मैं इन्हें जज़ तक पहुँचाकर ही और कुछ नहीं करूँगा।"

इरा ने आगे से पीछे मुड़कर देखा और कुछ नहीं बोली। उसकी उँगली अपने मोबाइल पर थी, और स्क्रीन की रोशनी में रवि को दिखा कि वो किसी को लंबा मैसेज टाइप कर रही थी — बस एक बार, बिना रुके, जैसे कोई लड़की हिसाब कर रही हो कि अब किसका नंबर लगाना है।

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