Billionaire Empire System792 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 792

7 min read November 7, 2026

पीछे इरा ने खिड़की बंद की और अंदर की बत्ती उतार दी। कमरा अंधेरे में डूब गया, बस बाहर गली की पीली रोशनी खिड़की के किनारे से अंदर एक पतली लकीर बनाकर आ रही थी।

रवि सबसे आख़िर में चढ़ा। चढ़ते वक़्त उसने एक बार पीछे देखा — घर की खिड़की, खुला बगीचा, और गली के मोड़ पर वो पीली रेखा जो अब भी वहीं पड़ी थी, किसी ने मिटाई नहीं थी।

उसने जेब में पापा की घड़ी को महसूस किया। वो अब भी वहीं थी। टिक-टिक कर रही थी।

और उसी समय, शहर के दूसरे छोर पर, एक पुरानी चाय की दुकान के सामने की खाली चटाई पर ठंडी हवा चल रही थी, जहाँ से मुन्ना भाई का बिस्तर अचानक ग़ायब था — बस एक टूटी तस्वीर रह गई थी, जिसे हवा उड़ाकर दूर ले जा रही थी, और उस तस्वीर में पापा की मुस्कान थी।

॥

पापा की घड़ी रवि की कलाई पर अचानक चुप हो गई। जैसे किसी ने साँस रोक ली हो। मुश्ताक़ की आख़िरी बात हवा में लटकी रह गई — "अब तुम्हारे पापा की मौत का असली सूत्र मेरे पास भी नहीं है।"

रवि ने घड़ी को कान से लगाया। कुछ नहीं। सिर्फ़ अपनी धड़कन सुनाई दी।

इरा ने उसका हाथ देखा और बिना पूछे बोली, "कहाँ जाना है?"

"थाना। रघुवीर सिंह के पास।" रवि ने अनवर का लिफ़ाफ़ा जेब से निकालकर सीना से लगाया। "जब तक ये काग़ज़ ठंडे नहीं हो जाते, कुछ और सोचना बेकार है।"

अनवर ने छड़ी टेकते हुए कहा, "मैं भी चलूँगा।"

"नहीं सर।" रवि ने उनका कंधा थामा। "आप यहाँ नहीं रुक सकते, और थाने में आपकी जान को ख़तरा है। आप लुट्टन के साथ क़ासिम भाई के पास चलिए। झोपड़ी में सबसे ज़्यादा छुपा हुआ कोना है।"

लुट्टन ने पान का पत्ता चबाया और सीना ठोंका, "और मैं क्या, अनवर साहब का बॉडीगार्ड हूँ। पर यार रवि, एक बात पहले बता — तेरे पापा की घड़ी ने फिर ऐसा क्यों किया जैसे किसी ने बंद कर दिया हो?"

रवि ने घड़ी को जेब में खिसका दिया। "पता नहीं। पर जब से मुश्ताक़ ने 'ऊपर' का नाम लिया है, ये चुप है। जैसे वो खुद भी डर गई हो।"

रात के नौ बजे थाने की बत्ती पीली पड़ रही थी। रघुवीर सिंह की मेज़ पर फ़ाइलों का ढेर था और उनके चेहरे पर पसीना। रवि ने अनवर का बयान, शीशी की फोटो और पापा का काग़ज़ एक-एक करके सामने रख दिए।

रघुवीर ने पहले काग़ज़ उठाया। फिर दूसरा पन्ना। फिर तीसरा। उनके हाथ हल्के काँप रहे थे, और वो काँप रहे थे इसका सबूत इतना साफ़ था कि रघुवीर ने आँखें मसल लीं।

"ये…" उन्होंने धीरे से कहा, "ये लिखाई अशोक भाई की है। मैं इसे पहचानता हूँ।" फिर वो उठकर खिड़की तक गए, पीछे से ही बोले, "बेटा, अब केस बनेगा। पक्का बनेगा।" वो पलटे। "पर एक गवाह और चाहिए — जो उस रात अस्पताल में था। कोई मरीज़ नहीं, कोई नर्स नहीं। सिर्फ़ काग़ज़ से जज नहीं मानेगा। जज को उस रात का आदमी चाहिए, जो सामने खड़ा होकर कहे — मैंने अपनी आँखों से देखा।"

रवि एक पल को चुप रहा। फिर उसका मुँह खुला, और आवाज़ फिसली, "मुन्ना भाई।"

"कौन?"

"दुकान के सामने का आदमी। वो उस रात वहीं सोया था।" रवि ने मेज़ पर हाथ रखा। "वो बार-बार कुछ कहता रहा, पर पूरी बात कभी नहीं बोला। मुझे लगा पागल है।"

रघुवीर ने कुर्सी पकड़कर कहा, "तो उसे अभी ले आओ। और हाँ, अगर वो कुछ देखता है, तो उसे किसी भी हाल में अकेले मत छोड़ना।"

"सर," रवि ने दरवाज़े से पलटकर कहा, "आप तीन पन्ने संभालकर रखिएगा। और बाहर किसी को कुछ नहीं।"

"अपनी तरफ़ देख।" रघुवीर ने पहली बार सीधी नज़र से देखा। "पुराने शहर में अब सिर्फ़ एक ही रास्ता बचा है — जो सीधा है। उस पर चल।"

दुकान तक पहुँचते-पहुँचते दस बज चुके थे। गली में पानी का नल टपक रहा था और टप-टप की आवाज़ पूरे मोहल्ले में फैल रही थी। लुट्टन की दुकान बंद थी, शकुंतला की पीली बत्ती जल रही थी।

रवि पहले मुन्ना भाई की जगह गया। चटाई वहीं पड़ी थी, किसी ने उसे समेट दिया था, जैसे किसी ने खाली साफ़ करने के लिए ऐसा किया हो। वहाँ न बस्ता था, न कटोरा, न माला।

रवि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने धीरे से कहा, "लुट्टन… वो नहीं है।"

लुट्टन ने पान चबाना बंद कर दिया। "कहीं घूमने गया होगा। वो ऐसे ही कभी नहीं होता।"

"वो कभी नहीं जाता।" रवि ने चटाई उठाकर देखी। नीचे सिर्फ़ सीमेंट था। "वो इस गली से बाहर पैर नहीं रखता। दस साल से।"

तभी शकुंतला अपने दरवाज़े पर आई। उसके हाथ में गीला कपड़ा था और आँखें लाल। "भैया…"

रवि उसकी आवाज़ सुनकर चल पड़ा। "क्या हुआ दीदी, बोलिए।"

शकुंतला ने कपड़ा बर्तन की तरफ़ फेंका और गला फाड़कर रो दी। "सुबह आठ बजे दो आदमी आए। सफ़ेद कुर्ता। गाड़ी में बैठाकर ले गए।" वो रुकी, साँस लेने की कोशिश की, फिर फूट पड़ी, "वो रो रहा था, भैया। काँप रहा था। मैंने पूछा तो बोले — 'चाची, भैया को बोल देना, मैंने सच देखा था।' और फिर उन्होंने गाड़ी का दरवाज़ा बंद कर दिया।"

रवि ने लुट्टन की तरफ़ देखा। लुट्टन का चेहरा उतर गया था, उसके होंठ खुले रह गए थे और पान की लाली उतर गई थी। "यार रवि, भगवान भी मुझे भूल गया है," उसने फुसफुसाया। "उन्हें उठा लिया, क्योंकि वो बोलने वाले थे।"

"नहीं, लुट्टन।" रवि ने उसका कंधा दबाया, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि ठंड लगी। "उन्हें इसलिए उठाया, क्योंकि वो बोलना ही चाहते थे। अब वो हमारा सबसे बड़ा गवाह है — ज़िंदा ही, बस हमारे पास।"

वो दुकान के पीछे की कोठरी में गया, जहाँ पापा की टूटी अलमारी रखी थी। उसने चाबी घुमाई और दरवाज़ा खुला। अंदर उतनी ही उमस थी, जितनी दस साल पहले छोड़ी थी। उसने नज़र नीचे की। फर्श पर पाँच छह तुलसी के दाने बिखरे थे — और ऊपर, अलमारी की कोने में लगी कील पर, तुलसी की माला टँगी थी।

रवि की साँस रुक गई। उसने माला उतारी। दाने पुराने थे, कुछ चिकने, कुछ पर खरोंच के निशान। उसकी उँगलियाँ एक दाने पर रुकीं, जहाँ कोई नुकीली चीज़ से कुछ खुरचा गया था। दीये की रोशनी में वो झुककर पढ़ने लगा, आँखें इतनी पास कि पलकें दाने छू रही थीं।

"मैंने देखा था।"

रवि का हाथ काँपा।

"सफ़ेद कोट वाला आया था।"

लुट्टन पीछे खड़ा था, उसने भी झुककर देखा। "ये तो…"

"चुप।" रवि ने आवाज़ दबाई। "पूरी बात पढ़ो।"

"मुझे उन्होंने उठा लिया।" और उसके नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, दो शब्द और एक पता — "अब तुम ही बचाओ। शहर के बाहर, पुराना कारख़ाना। मोड़ के पास, जहाँ लोहा पिघलता था।"

रवि एक पल के लिए सीधा खड़ा रहा। उसकी आँखों में पानी आ गया, पर होंठ कस गए। उसने माला अपने गले में डाल ली और दानों को सीने पर दबा लिया, जैसे मुन्ना भाई ने उसे खुद बचाने के बजाय पता लिखकर भेज दिया हो। एक अधूरी टाँग वाला आदमी, जो गली से कभी बाहर नहीं निकला, उसने अपनी मौत से पहले यह सब खरोंच-खरोंचकर लिखा — किसी कील से, किसी की क़मीज़ की बटन से, अपने ही नाखून से।

"तू रो रहा है?" लुट्टन ने धीरे से पूछा।

"नहीं।" रवि ने आँखें पोंछीं और पलट गया। "धूल गई है।"

लुट्टन ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना हाथ रवि की पीठ पर रख दिया, और उसकी हथेली भारी थी, जैसे कोई बड़ा आदमी खुद को रोक रहा हो।

बाहर आकर इरा ने माला देखी और बिना एक लम्हा गँवाए बोली, "मैं कोमल को फ़ोन करती हूँ। मशीन लेकर कारख़ाने के मोड़ पर मिलेंगे।" उसने रवि की तरफ़ देखा। "और अगर वहाँ कुछ भी हो, तो भागना नहीं। भागोगे, तो कैमरा कहेगा — हम डरे हुए थे।"

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