Billionaire Empire System – Chapter 791
"ये घड़ी…" उसने इतने धीमे स्वर में कहा कि रवि को आगे झुकना पड़ा। "ये तो अशोक भाई की थी।"
रवि का दिल ज़ोर से धड़का। उसने कुछ नहीं कहा। मुश्ताक़ ने अपना बायाँ दस्ताना उतारा। उजली उँगलियों पर एक पुराना जला हुआ निशान था, सफ़ेद, झुर्रीदार, जैसे कोई अंगारा चमड़ी में घुसकर बैठ गया हो।
"चाय वाले," मुश्ताक़ ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में कड़वाहट कम, कोई पुरानी थकान ज़्यादा थी। "तेरे पापा ने एक बार मेरी जान बचाई थी। बलवंत साहब के गुस्से में। मैं उस दिन उनका हिसाब रखने वाला था, पर मैंने एक रकम इधर-उधर कर दी। साहब को पता चला, उन्होंने मेरा हाथ जलाया — अपने ही सिगार से। 'सबक़' कहकर।"
वो रुका। उसने उतारा हुआ दस्ताना फिर पहना, धीरे-धीरे, एक-एक उँगली पर।
"तेरे पापा ने कहा था — 'मुश्ताक़, ये हाथ काटने के लिए नहीं हैं। इनसे एक दिन सच लिखा जाएगा।' और फिर वो खुद अपनी गर्दन आगे करके साहब के सामने खड़े हो गए। अपनी नौकरी दाँव पर लगाकर मुझे बचाया।"
अब रवि की साँस रुकी हुई थी। इरा ने अलमारी के पीछे से सुना। अनवर के कमरे की तरफ़ से छड़ी की आवाज़ भी बंद थी, जैसे बूढ़े आदमी सब कुछ सुन रहे हों और साँस तक न ले रहे हों।
"आज मैं तेरी बार बचा रहा हूँ," मुश्ताक़ ने कहा। "समझ ले… सब हिसाब बराबर।"
रवि ने मुश्ताक़ के जले हाथ को देखा और कुछ ऐसा महसूस हुआ जो उसने सालों से शायद किसी दुश्मन के लिए नहीं महसूस किया था। उसने धीरे से कहा, "पापा ने ये नहीं कहा होगा कि हिसाब बराबर करना है। उन्होंने ये कहा होगा कि हाथ बचाकर रखना, क्योंकि एक दिन सच लिखना बाकी है।"
मुश्ताक़ ने रवि की तरफ़ देखा, और उसके चेहरे पर पहली बार कुछ ऐसा आया जो तिरस्कार नहीं था। फिर उसने घड़ी उठाई, उसे धीरे से मेज़ पर वापस रखा — पर रवि की तरफ़ नहीं सरकाया, बीच में ही छोड़ दी — जैसे ये उसका आख़िरी शब्द हो।
वो पलटा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। उसके दोनों आदमी भी पलटे।
रवि ने कुछ नहीं कहा। उसने सोचा कि बात यहीं ख़त्म है।
पर मुश्ताक़ दरवाज़े के ठीक बीच में रुका। उसने एक हाथ दरवाज़े की चौखट पर रखा और गर्दन घुमाकर पीछे देखा। उसकी आवाज़ अब और धीमी थी, और उसमें कुछ ऐसा था जो ख़तरे से ज़्यादा थकान लग रहा था।
"पर एक बात याद रखना, चाय वाले।"
रवि की नज़र उससे टकराई।
"ज़ुबैर सिर्फ़ मुझे भेजता, तो तुम आज बच जाते।" मुश्ताक़ ने धीरे से कहा। "ये हुक्म ऊपर से आया है। उस जगह से जहाँ बलवंत साहब भी नहीं बोलते। तुम्हारे पापा की मौत का असली सूत्र मेरे पास भी नहीं है… वो उसी के हाथ में है।"
रवि ने एक कदम आगे रखा। "किसके हाथ में?"
"उस आदमी के हाथ में," मुश्ताक़ ने कहा, "जो हर रात कोई नया चेहरा पहनकर आता है। बलवंत साहब उससे फ़ोन पर बात करते हैं, तो कमरे का दरवाज़ा बंद कर देते हैं। मैंने एक बार सुना था — सिर्फ़ इतना — 'हाँ साहब, आपकी बात मानी जाएगी।' और फिर साहब ने फ़ोन रखकर अपना माथा पकड़ लिया था।" वो रुका। "आज मुझे भी वही हुक्म आया, रवि। और मैं पहली बार डरा हूँ। समझ रहे हो ना? मुझे नहीं, उनको भी तुमसे डर लग रहा है।"
इतना कहकर मुश्ताक़ बाहर निकल गया और गली की पीली रोशनी में दोनों आदमियों के साथ पैरों की आवाज़ दूर जाने लगी। दरवाज़े में एक ठंडी हवा बहकर आई, जिसमें धूल और कहीं से आती फ़्राइंग के तेल की गंध थी।
रवि ने दरवाज़ा बंद किया। पीछे से अनवर के कमरे का दरवाज़ा खुला, और बूढ़े आदमी की सफ़ेद दाढ़ी पहले बाहर आई, फिर छड़ी। उनके हाथ में वो काग़ज़ अभी भी था। उनकी आँखों में पानी था, पर होंठ मज़बूती से बंद थे।
"मैंने सुन लिया," अनवर ने कहा। "बेटा, ये आदमी… मुश्ताक़… ये तुम्हारे पापा को पहचानता था।"
"हाँ," रवि ने कहा। उसकी आवाज़ थोड़ी भर्राई थी, जो उसने जल्दी से संभाल ली। "पर ये बात उसने सिर्फ़ इसलिए बताई कि हम उसके रास्ते में से हट जाएँ। उसने ये नहीं कहा कि वो हमारे साथ है।"
इरा अलमारी के पीछे से निकली। उसके घुँघराले बाल माथे से चिपके हुए थे और उसने मशीन का बैग सीने से उतारा। "रवि, उसने कहा कि हुक्म ऊपर से आता है… उस आदमी से जिसके हाथ में सच है। ये वही सफ़ेद कुर्ते वाला है ना? रघुराज?"
रवि ने सिर हिलाया, पर उसके मन में कुछ और ही चल रहा था। बाहर रेखा के पास खड़े तीन आदमी — सफ़ेद कुर्ते वाला, मुश्ताक़, और अब ये "ऊपर वाला"। कितनी मंज़िलें हैं इनकी सीढ़ी में, जहाँ बलवंत खुद डरता है? उसने अनवर के काग़ज़ की तरफ़ देखा, जो अब पूरा भर चुका था — कई पन्ने, झुकी हुई लिखाई, नीचे हर पन्ने पर दिनांक और हस्ताक्षर।
"डॉक्टर साहब," रवि ने कहा, "अब आप यहाँ नहीं रह सकते। मेरे साथ चलिए। झोपड़ी में रात बिताइए। कल सुबह आपको मैदान में खुद खड़े होना है, उससे पहले मैं ये नहीं चाहता कि ये सफ़ेद कुर्ते वाले आपका रास्ता रोक लें।"
अनवर ने काग़ज़ को सीने से लगाकर एक बार देखा, फिर धीरे से बोले, "मैं डरता हूँ, बेटा। पर मेरे पास इन चीज़ों से बचने की कोई जगह नहीं है अब।" उन्होंने छड़ी उठाई और रवि की तरफ़ देखकर जोड़ दिया, "तुम्हारे पापा ने एक बार कहा था — 'डॉक्टर साहब, सच बोलने से पहले आदमी को एक बार सच का कपड़ा पहनना पड़ता है, चाहे वो कितना ही फटा हो।' मैं आज पहन रहा हूँ।"
फिर सब तैयार हुए। इरा ने मशीन का बैग कंधे पर लिया, अनवर ने अपना कोट और छड़ी उठाई, और रवि ने पिछले दरवाज़े की तरफ़ देखा। रसोई की उस छोटी खिड़की से नीचे का बगीचा दिखता था, और उसके पीछे छत।
अनवर खिड़की तक पहुँचे ही थे कि रवि के फ़ोन की स्क्रीन जली। एक मैसेज था — अनजाना नंबर।
"चाय वाले, तेरे पास रात दो बजे तक का वक़्त है। दरवाज़े पर जो आदमी आया, वो मेरा आदमी नहीं था। मेरा आदमी तेरे सामने कभी नहीं आएगा — वो तेरी पीठ के पीछे से बात करता है। — भीतर का चीफ़ साहब"
रवि ने स्क्रीन इरा की तरफ़ घुमाई। इरा ने एक नज़र देखा और उसका चेहरा कठोर हो गया। "ये वही है जिसने पहले मैसेज भेजा था? जिसने डॉक्टर जोशी के बारे में बताया था?"
"हाँ," रवि ने कहा। उसने स्क्रीन बंद कर दी और फ़ोन जेब में रख लिया। "पहली बार उसने हमें बचाया था। पर आज वो हमें डरा रहा है। कोई हमें एक बार बचाता है, तो वो हमारी ज़रूरत बन जाता है। और फिर हम उसके बिना चल ही नहीं पाते।"
इरा ने बैग कसकर पकड़ा। "तो आज से हम उसके हिसाब से नहीं चलेंगे।"
रवि ने कुछ नहीं कहा। वो खिड़की के पास गया, उसे खोला, और बाहर देखा। बगीचे की दीवार पर उगी घास में हवा लहरा रही थी। नीचे अंधेरा था, पर छत की तरफ़ जाती एक पतली सीढ़ी दिख रही थी, जिसे किसी ने पीले रंग से पुता था — कहीं-कहीं पेंट उखड़ी हुई, और उखड़ी जगह से लोहा चमक रहा था।
"पहले आप," रवि ने अनवर की तरफ़ हाथ बढ़ाया, "और ध्यान रखिए, सीढ़ी पुरानी है। मेरा हाथ पकड़कर रखिएगा।"
अनवर ने एक पल रवि का हाथ देखा, फिर उसे थाम लिया। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ कसी हुई। जब वो खिड़की से बाहर पैर रख रहे थे, तो उन्होंने बिना पीछे देखे कहा, "बेटा, अगर कल मैं मैदान में न पहुँच पाऊँ… तो ये काग़ज़ तुम रखना। और याद रखना — सच को किसी गवाह की ज़रूरत नहीं होती, सच खुद गवाह होता है।"
रवि ने उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया। "आप पहुँचेंगे, सर। मैं आपको छोड़ूँगा नहीं।"
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