Billionaire Empire System790 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 790

7 min read November 7, 2026

लुट्टन ने गला साफ़ किया। "भगवान भी मुझे भूल गया है…" उसके हाथ काँप रहे थे, पर वो मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था। "पर तेरा यार नहीं भूलेगा। जा, और जल्दी लौटना।"

रवि अनवर के पास लौटा। बूढ़ा आदमी अभी भी लिख रहा था, पर उसकी कलम अब धीमी चल रही थी। एक जगह आकर वो पूरी तरह रुक गए। उन्होंने काग़ज़ से नज़र उठाई और रवि को देखा।

"बेटा… मैं अकेला हूँ।" उनकी आवाज़ टूट गई। "मेरी बेटी पुणे में है, दूर। मेरी पत्नी नहीं है। ये घर, ये कमरे, ये किताबें — बस यही मेरा संसार है।" उन्होंने काँपते हाथों से काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया। "अगर आज रात मेरे साथ कुछ हो जाए, तो ये काग़ज़ तुम्हारे पास ही रहें। किसी और को मत देना, चाहे कुछ भी हो जाए। क्योंकि जो इन्हें छीनना चाहेगा, उसके पास सिर्फ़ मौत होगी।"

रवि ने एक पल रुककर उनका हाथ पकड़ लिया। बूढ़े आदमी के हाथ की उँगलियाँ ठंडी थीं, नसें उभरी हुई, पंजों पर ज़मीन पर काम करने के सालों के निशान थे।

"आप अकेले नहीं हैं, डॉक्टर साहब।" रवि ने उनका हाथ अपने दोनों हाथों में लिया। "अब से आप मेरे पापा की तरह हैं। मेरे पापा का एक दोस्त था — आप। और अब आपका भी एक है — मैं। जब तक मैं साँस ले रहा हूँ, आपके दरवाज़े तक कोई नहीं आएगा।"

अनवर का हाथ और काँपने लगा, पर इस बार डर से नहीं। उनकी आँखें भर आईं और एक बूँद काग़ज़ पर गिर गई। उन्होंने उसे पल्लू से पोंछने की कोशिश की, फिर रुक गए, जैसे उस बूँद को वहीं रहने देना चाहते हैं।

"तुम्हारे पापा ने भी ऐसा ही कहा था," उन्होंने फुसफुसाकर कहा। "'डॉक्टर साहब, अब से आप मेरे भाई हैं।' मैं उन दिनों को भूला नहीं था, बेटा। बस याद करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।"

इरा बीच में बोली, "सर, कल सुबह दस बजे सेवा सदन के मैदान में सारा शहर होगा। वहाँ आपकी गवाही से सब कुछ बदल जाएगा। आप वहाँ खुद खड़े होकर बोलेंगे।"

अनवर ने कलम एक पल के लिए नीचे रखी। "मैं वहाँ खड़ा होकर बोलूँगा — ये मेरा हिसाब है। पर एक बात कहूँ…" उन्होंने रवि की तरफ़ देखा। "बलवंत और ज़ुबैर मेरी बातें सुनकर कुछ नहीं करेंगे। वो काग़ज़ चाहेंगे, गवाह चाहेंगे। उन्हें मैदान में आने से पहले मुझे रोकना है। यही उनका असली डर है।"

"तो आज रात हम आपको यहाँ नहीं रहने देंगे," रवि ने कहा। "आप श्मशान की झोपड़ी में क़ासिम भाई के पास चलिए। वहाँ कोई नहीं ढूँढेगा। सुबह सब साथ चलेंगे।"

अनवर ने सिर हिलाया और फिर काग़ज़ की तरफ़ लौट गए। अब वो तेज़ी से लिख रहे थे, जैसे बरसों का रुका हुआ सब कुछ एक बार में निकल रहा हो। एक पन्ना पूरा हुआ, दूसरा शुरू हुआ, और हर पन्ने के नीचे उन्होंने अपना नाम लिखकर तारीख़ डाल दी।

लुट्टन की आवाज़ फिर आई — इस बार ऊपर से, चीख जैसी। "रवि! वो फिर आया! मोड़ पर वही सफ़ेद कुर्ता! और अब वो अकेला नहीं है… दो और आदमी हैं!"

रवि ने बाहर देखा। अब तक थोड़ी शाम ढल चुकी थी। गली में पीली रोशनी जल गई थी। रेखा के पास तीन परछाइयाँ खड़ी थीं — सफ़ेद कुर्ते वाली सबसे ऊँची, और उसके पीछे दो मोटे शरीर।

फिर वो चल दिए।

अनवर काग़ज़ से सिर उठाकर रुक गए। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

रवि ने इरा को देखा। "काग़ज़ समेटो। बैग में डालो। और सारी बत्तियाँ बंद कर दो।" उसने अपनी आवाज़ धीमी कर दी। "पीछे का कमरा खुलता है कहाँ?"

अनवर ने काँपती उँगली से रसोई की तरफ़ इशारा किया। "उस खिड़की से… नीचे बगीची की दीवार है… उस पर से छत पर…"

रवि ने उनका बयान उठाया, तीन हिस्सों में तह किया और अपनी क़मीज़ के अंदर पेट पर रख लिया। इरा ने बैग उठाया। अनवर ने अपना कोट पहना और छड़ी उठाई।

"डॉक्टर साहब," रवि ने कहा, "जो कुछ भी हो, आप इरा के साथ रहिएगा। और चुप।"

अनवर ने सिर हिलाया।

तीनों पीछे की तरफ़ बढ़े। पर बत्तियाँ बंद होने से पहले, गली से आती हुई आवाज़ ने उन्हें रोक लिया — धीमी, नपी-तुली, ठंडी आवाज़।

"डॉक्टर अनवर…" आवाज़ ने एक पल रुककर अपनी बात पूरी की, "…साहब का सलाम है।"

फिर दरवाज़े पर गूँजा — धड़! धड़! धड़! — तीन बार, इतने ज़ोर से कि दरवाज़े के किनारे से धूल टपकने लगी।

॥

दरवाज़े पर दूसरी बार दस्तक पड़ी — धड़! धड़! धड़!

भीतर हवा जैसे रुक गई। अनवर की छड़ी हाथ से छूटकर फर्श पर टिक-टिक करती रह गई, और उनका चेहरा एक पल में सफ़ेद पड़ गया। रवि ने उनका हाथ पकड़ा और बिना कुछ कहे उन्हें पीछे के कमरे की तरफ़ धकेल दिया।

"अंदर जाइए। दरवाज़ा बंद कर दीजिए। चुप।" रवि की आवाज़ इतनी धीमी थी कि खुद उसे भी सुनने में दूर लगी।

इरा ने मशीन का बैग पहले ही सीने से चिपका लिया था। रवि ने उसे रसोई की उस अलमारी के पीछे इशारा किया और खुद आगे बढ़कर दरवाज़े के पास रुक गया। बाहर से अब आवाज़ आई — ठंडी, नपी-तुली, जैसे कोई पत्थर के ऊपर पत्थर रख रहा हो।

"डॉक्टर अनवर… मैं जानता हूँ आप अंदर हैं। साहब का सलाम है। दरवाज़ा खोलिए, वरना बात बढ़ जाएगी।"

रवि ने एक गहरी साँस ली। हथेली पर चाय के पुराने धब्बे जैसे आज और गहरे हो गए थे। उसने दरवाज़े की कुंडी घुमाई और दरवाज़ा खोल दिया।

बाहर मुश्ताक़ भाई खड़ा था। काला चश्मा, काले दस्ताने, दुबला-लंबा शरीर, और पीछे दो आदमी — मोटे, चुप, जैसे गाड़ी के दो पहिए। मुश्ताक़ ने दरवाज़ा खुलते ही अपनी बात दोहरानी चाही, पर उसके शब्द रवि को देखते ही हल्के पड़ गए।

"तुम?" उसकी आवाज़ में पहली बार कोई दरार आई।

"हाँ, मैं," रवि ने कहा। "डॉक्टर साहब से नहीं, मुझसे बात करो।"

मुश्ताक़ ने एक पल रवि को तौला, फिर अपने पीछे के एक आदमी की तरफ़ सिर हिलाया, जो गली के मोड़ पर खड़ा हो गया। फिर वो आगे बढ़ा, जैसे घर में आना उसका हक़ हो। रवि एक कदम पीछे हटा, पर रास्ता नहीं दिया। दोनों आमने-सामने थे, और पीछे की तरफ़ से अनवर के कमरे से छड़ी की एक हल्की खड़खड़ाहट आई। मुश्ताक़ की नज़र उस तरफ़ गई।

"डॉक्टर साहब आज सुबह से किसी-किसी से मिल रहे हैं," मुश्ताक़ ने ठंडे स्वर में कहा। "साहब को पता है। साहब ने कहा है — डॉक्टर साहब अपना मुँह बंद रखें। ज़ुबान खुली, तो…"

वो वाक्य पूरा नहीं किया। बस अपने दस्ताने वाले हाथ से हवा में एक लकीर खींची, जैसे किसी की ज़िंदगी मिटा रहा हो।

रवि कुछ देर चुप रहा। बाहर गली की पीली रोशनी में धूल तैर रही थी। एक कुत्ता दूर कहीं भौंका और चुप हो गया। फिर रवि ने अपनी कलाई की तरफ़ देखा, चाँदी की घड़ी की तरफ़, जो उसने माँ के सामने पहनी थी और आज तक उतारी नहीं थी।

उसने घड़ी खोली, कलाई से उतारी और मुश्ताक़ के सामने मेज़ पर धीरे से रख दी। धातु फर्श पर एक हल्की टन-टन की आवाज़ करके चुप हो गई।

"अच्छा। तो सुनो," रवि ने कहा। आवाज़ धीमी थी, यही उसकी सबसे ख़तरनाक आवाज़ थी। "अगर आज डॉक्टर अनवर को कुछ हुआ — एक बाल भी बाँका — तो ये घड़ी और इसके पीछे का सारा सच सुबह होते-होते पूरे शहर में होगा। अख़बार में, टीवी पर, हर चाय की दुकान पर। मैं चाय वाला हूँ, मेरे पास शहर की सबसे तेज़ ज़ुबान है। तुम जानते हो।"

मुश्ताक़ ने घड़ी की तरफ़ देखा। उसके चश्मे के पीछे की आँखें कुछ कहती दिखीं, पर चेहरा नहीं बदला। फिर उसने अपने दस्ताने वाले हाथ को उठाया और देखने लगा, जैसे वो हाथ उसका न हो। उसकी उँगलियाँ एक पल के लिए काँपीं।

फिर वो एक कदम पीछे हटा।

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