Billionaire Empire System – Chapter 788
अनवर ने अपना हाथ ऊपर उठाया, जैसे कह रहे हों — रुको। "पहले एक बात।" उन्होंने कुर्सी से उठकर दीवार की तरफ़ बढ़ते हुए कहा, "मैं तुम्हें कुछ दिखाता हूँ।" वो दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर के सामने रुके। तस्वीर धूल में डूबी थी, फ़्रेम का काँच एक कोने से टूटा था। अनवर ने अपनी कमीज़ की बाँह से उसे धीरे-धीरे पोंछा। काँच पर उँगली के निशान बन गए।
तस्वीर में एक लंबा सा कमरा था, जिसमें कई सफ़ेद कोट वाले लोग खड़े थे। कुछ हँस रहे थे, कुछ कैमरे से आँख चुरा रहे थे। बिलकुल किनारे पर एक जवान आदमी था, खुद से कुछ साल छोटा, जिसकी आँखों में वो ही गहराई थी जो रवि ने अपनी माँ की आँखों में देखी थी।
रवि ने तस्वीर के करीब झुककर देखा, और उसका गला सूख गया। "ये कौन?" उसकी आवाज़ धीमी थी।
अनवर ने तस्वीर पर उँगली रखी, उस जवान आदमी के सीने पर। "तुम्हारे पापा। अशोक।" उन्होंने एक पल रुककर कहा, "वो उस लैब में आते थे। कभी काग़ज़ लेकर, कभी सिर्फ़ बैठकर। और मैं…" उनकी आवाज़ टूटी, "मैं उनसे उस रात के बाद मिला जब शीशियाँ ग़ायब हुई थीं। वो मेरे घर आए थे, आधी रात को। मेरे हाथ में वो लिफ़ाफ़ा था। उन्होंने उसे पढ़ा और कहा — 'अनवर भाई, ये लिफ़ाफ़ा मत भेजो। ये तुम्हें मार देगा।' मैंने कहा, फिर क्या करूँ? वो मुस्कुराए और बोले — 'अभी कुछ नहीं। मैं तुम्हें ज़िंदा रखूँगा।'"
रवि ने तस्वीर पर हाथ रखा। काँच ठंडा था। "फिर क्या हुआ?" उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो बच्चे की होती है, जब वो दादी से कोई अधूरी कहानी पूरी करवाना चाहता है।
"उन्होंने मुझे अपने गाँव भेज दिया। एक हफ़्ते के लिए। कहा — 'बस सात दिन रुक जाओ, जब मैं कहूँ लौट आना।'" अनवर ने तस्वीर से पलटकर रवि के चेहरे की तरफ़ देखा। "मैं लौटा। पर तब तक वो…" वो बोलते-बोलते रुक गए। मुँह में शब्द आकर अटक गए। "तब तक वो दुनिया में नहीं थे। और मैंने उनकी सलाह मानी। चुप रहा। दस साल तक।"
रवि ने अपनी आँखें बंद कर लीं। वो पापा की आवाज़ याद कर रहा था — वो आवाज़ जो शीशी से निकली थी — "उस आदमी का सच सबके सामने लाना है।" पापा जानते थे। पापा ने सब जानकर भी खुद को इस आदमी के आगे रख दिया, इसी अनवर के आगे, ताकि एक गवाह बच जाए। पापा एक आदमी को बचाने के लिए सात दिन के लिए मर गए थे।
"मैं तुम्हारे पापा से मिला था," अनवर ने तस्वीर से पलटकर कहा। उनकी आँखों में पानी था जो बहने को आते भी शर्मा रहा था। "और मैंने उन्हें वही लिखकर दिया था जो अब तुम्हारे हाथ में है। तुम्हारे पापा ने मुझे बचाया था — और तब से मैं इस शहर में छिपा हुआ हूँ। आज से पहले किसी को नहीं बताया।"
इरा ने अपनी रिकॉर्डर मशीन की तरफ़ एक पल को देखा। फिर उसने सीधे अनवर की तरफ़ देखकर कहा, "सर, ये सब मशीन पर रिकॉर्ड हो रहा है। आप जो कह रहे हैं, वो काग़ज़ पर भी चाहिए। आपका हस्ताक्षर, आपकी तारीख़।"
अनवर ने उसकी तरफ़ देखा और धीरे से मुस्कुराए। "तुम सलाम ख़ान की बेटी हो ना?" इरा चौंक गई। "तुम्हारे पापा भी मेरे पास आए थे, ऐन उसी हफ़्ते में जब मैंने शिकायत लिखी थी। उन्होंने भी कहा था — 'डॉक्टर साहब, मेरे पास भी कुछ है। पर अभी नहीं।' मुझे याद है उनकी आँखों में वो ज़िद थी।" उन्होंने इरा को देखकर गहरी साँस ली। "तुम दोनों के पापा एक ही अँधेरे से लड़े थे। और दोनों इसी हालत में ख़त्म हुए।"
इरा ने नोटबुक बंद कर दी, पर अपनी आँखें नहीं झुकाईं। उसका हाथ थोड़ा सा काँप रहा था, पर उसने मशीन का बटन दबाकर उसे अपनी तरफ़ सरका दिया। "सर, मेरे पापा की फ़ाइल में आपका नाम कहीं नहीं आता। आपने कभी सामने क्यों नहीं आकर बताया?"
अनवर ने उस लिफ़ाफ़े की तरफ़ देखा। "क्योंकि मैं डर था। मैं पैंतीस साल का डॉक्टर था, एक बेटी का पिता। जब तुम्हारे पापा मरे, मैंने खुद से कहा — अब बोलूँगा, मुझे क्या फ़र्क़ पड़ेगा। पर अगले महीने मेरी नियुक्ति एक सरकारी अस्पताल में हो गई थी। बिना दरख़्वास्त के। बिना इंटरव्यू। और उस पत्र पर उसी आदमी की मुहर थी। मैं समझ गया — वो मुझे देख रहा है। मुझे ज़िंदा रख रहा है, क्योंकि मरा हुआ आदमी बोलता नहीं, ज़िंदा आदमी डरता है।"
लुट्टन ने चुप्पी तोड़ी। उसका मुँह लाल था पर हँसी नहीं थी। "यार रवि, ये दुनिया एक अजीब सी जगह है। जो मर गया, वो हीरो। जो ज़िंदा है, वो डरपोक।" उसने अपना हाथ माथे पर रखा। "कोई जज इन डॉक्टर साहब को पूछे कि दस साल तक चुप क्यों रहे। पर कोई ये नहीं पूछता कि चुप रहने के लिए मजबूर किसने किया।"
अनवर की आँखें लुट्टन पर ठहरीं। फिर वो कुर्सी पर बैठ गए और अपनी जेब से एक चश्मा निकालकर पोंछने लगे, जो उन्होंने पहन रखा था। "बात सही है।" वो पोंछते-पोंछते रुके और रवि की तरफ़ देखा। "बेटा, तुम्हारे पापा ने मुझे बचाया था। मैं दस साल से उस बचाव का बोझ ढो रहा हूँ। अब मैं उसे वापस चुकाना चाहता हूँ। कल मैदान में मैं पूरी बात बोलूँगा — ये शीशी कहाँ बनी, किसने बनाई, और किसके हाथ में आई।"
तभी बाहर गली में पत्थर पर पैर की आवाज़ आई। फिर कुछ सरकने जैसी रगड़। लुट्टन चौंककर उठा और खिड़की की तरफ़ झुककर बाहर देखने लगा। उसका चेहरा अचानक पीला पड़ गया।
"यार," उसने काँपती आवाज़ में कहा, "गली के मोड़ पर एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी खड़ा है। चार-पाँच फ़ुट लंबी डंडी हाथ में है। और ये… वो बार-बार इस मकान की तरफ़ देख रहा है। ऐसे देख रहा है जैसे गिन रहा हो — कितने अंदर हैं।"
रवि उठा और खिड़की के पास गया। पर जब उसने झाँका, गली ख़ाली थी। सिर्फ़ पत्थरों पर एक लंबी, नई सफ़ेद रेखा खिंची थी, जैसे किसी ने चूने से खींच दी हो। वो रेखा बिल्कुल उसी जगह थी जहाँ उस आदमी के खड़े होने के निशान थे।
अनवर ने अपनी हथेली से मेज़ मारी। "बेटा, वो सफ़ेद रेखा उस आदमी का निशान है — हमारे इलाक़े में ज़ुबैर के आदमी ऐसे ही निशान छोड़ते हैं। जिस घर पर सफ़ेद रेखा बन जाए, वो… वो उनका निशाना है।" उन्होंने रवि का हाथ पकड़ लिया। "तुम्हें अब ज़्यादा देर नहीं रुकना चाहिए। मेरी शिकायत की कॉपी तुम ले जाओ। और मैं इन पन्नों पर आज रात हस्ताक्षर करके लाता हूँ।" फिर उन्होंने एक लंबी साँस ली। "पर एक बात पहले — आज रात तक, तुम्हें किसी भी हालत में उस शीशी को उस मोहल्ले से बाहर रखना होगा।"
रवि ने शीशी जेब में रखी। "क्यों?"
अनवर की आँखें सिकुड़ीं। "क्योंकि उस शीशी में सिर्फ़ दवा नहीं है, बेटा। उस शीशी में ये भी लिखा है कि उस दवा का असर कैसे काम करता है। और जिस पर ये लिखा है — वो एक हत्या का, हज़ार लोगों की मौत का सबूत है।" उन्होंने आवाज़ धीमी कर दी। "अगर वो शीशी उनके हाथ लगी, तो वो उसे तोड़ देंगे। पर अगर तुम्हारे पास रही, तो अदालत इसे खोलकर देखेगी — और सारा शहर जान जाएगा कि उन्होंने कैसे ग़रीबों को मारा।"
इरा ने मशीन बंद कर दी और अपना बैग उठाया। "फिर हम अभी निकलते हैं।" उसने एक पल के लिए रुककर रवि की तरफ़ देखा। "रास्ता कौन सा लेंगे?"
रवि ने खिड़की से बाहर देखा। सफ़ेद रेखा पर एक पत्ता गिरा। वो पलटा और अनवर की तरफ़ देखा। "सर, आपकी बैठक का पिछला दरवाज़ा खुलता है?"
अनवर ने सिर हिलाया। "पीछे की गली में जाता है। वहाँ कूड़े का डिब्बा है, बदबू है… पर वहाँ से निकलना आसान है।"
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