Billionaire Empire System – Chapter 787
रवि ने उसकी तरफ़ देखा। लुट्टन की आँखों में वही डर था जो उसके अपने सीने में बैठा था, पर उसके होंठ मुस्कुरा रहे थे। रवि ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, "तेरी माँ मुझे गाली देगी कि मैंने उसके बेटे को रात भर जगाया। पर आ जा। चारपाई तेरे लिए भी है।"
लुट्टन ने उसकी पीठ थपथपाई और कुछ कहने ही वाला था कि इरा बोल पड़ी, "रवि, सुनो।" उसने नोटबुक से एक फटा पन्ना निकाला और उसकी तरफ़ बढ़ाया। "ये मैंने कल रात लिखा था। अनवर सर ने जो कहा, उसका सार। पर मैं चाहती हूँ कि तुम इसे पढ़ो, और अगर कहीं भी लगे कि ये तुम्हारे पापा की बात से टकरा रहा है, तो अभी बता दो।"
रवि ने पन्ना पढ़ा। कुछ शब्द थे — छोटी स्याही में, तिरछे, जैसे जल्दी में लिखे गए हों: "दवा नहीं थी। नाम बदला गया था। रिपोर्ट नंबर हटा दिया गया था।" उसके नीचे बस एक लाइन थी — "ये तीन चीज़ें एक ही आदमी कर सकता है।"
रवि ने पन्ना इरा को वापस दिया और बोला, "कल मैदान में यही लाइन मैं सबसे पहले बोलूँगा।" फिर वो चलने लगा, और उसके कदम पहले से तेज़ थे।
दोपहर ढलने से पहले रवि घर पहुँचा। माँ चूल्हे पर कुछ पका रही थी, और पीछे के कमरे से बहन की खाँसी की आवाज़ आ रही थी। रवि ने सीधे उसके पास जाकर देखा — बहन की आँखें बंद थीं, माथे पर पसीना था, होंठ सूखे। उसने उसका हाथ थामा तो उँगलियाँ ठंडी थीं।
"माँ," उसने धीरे से कहा, "आज रात मैं घर पर नहीं रहूँगा।"
माँ ने चूल्हे की आँच धीमी कर दी और पलटकर देखा। उनके चेहरे पर सवाल था, पर ज़ुबान से कोई शब्द नहीं निकला। रवि ने उनके पास जाकर कहा, "कल सुबह सेवा सदन में सबके सामने सच बोलूँगा। माँ, अगर मैं कल लौटा, तो बहन के इलाज के पैसे भी लाऊँगा। और अगर नहीं लौटा…" वो रुका, "तो पापा की बात याद रखना। उन्होंने कहा था — सच बोलने वाले को अकेले मत छोड़ना।"
माँ ने उसका चेहरा दोनों हाथों में भर लिया। उनकी आँखों में पानी तो था, पर होंठ काँपते हुए भी मुस्कुरा रहे थे। "तू जा," उन्होंने कहा, "मैं तेरे पापा को बता दूँगी कि उनका बेटा उनसे भी ज़्यादा ज़िद्दी निकला।"
शाम को रवि दुकान के पीछे वाली कोठरी में बैठा था। सामने मेज़ पर शीशी रखी थी, और उसके बगल में अनवर का दिया वो पुराना पेन। बाहर लुट्टन चारपाई पर बैठा पान खा रहा था और बीच-बीच में झाँककर पूछ रहा था, "यार, कुछ बोल क्यों नहीं रहा?"
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। रवि ने दरवाज़ा खोला। सामने इरा खड़ी थी, सिर पर दुपट्टा, हाथ में एक छोटा बैग। "सोचा, तुम अकेले होगे," उसने कहा, "और अनवर सर ने कहा था कि काग़ज़ के साथ आवाज़ भी चाहिए। तो मैं अपनी रिकॉर्डर मशीन ले आई।" उसने बैग खोला — अंदर एक पुरानी, भारी मशीन थी, जिसके किनारे घिसे हुए थे। "ये मेरे पापा की है। कहते थे, सच रिकॉर्ड हो जाए तो कोई मिटा नहीं सकता।"
रवि ने उसे अंदर आने दिया। तीनों उस छोटी कोठरी में बैठे, और रवि ने शीशी उठाई। उसने उसे इरा की मशीन के सामने रखा और धीरे से कहा, "ये शीशी मेरे पापा ने छोड़ी थी। इसमें जो काग़ज़ है, वो आज रात तक सिर्फ़ तीन लोगों ने देखा है। कल सुबह से पूरा शहर देखेगा।"
लुट्टन ने अपना पान थूक दिया और बोला, "यार, ये सुनकर मेरे हाथ काँप रहे हैं। और मैं तो सिर्फ़ सुन रहा हूँ।"
रवि मुस्कुराया। पर तभी उसकी घड़ी फिर रुकी — एक पल के लिए, फिर चलने लगी। रवि ने उसे देखा और उसका चेहरा गंभीर हो गया।
उसने घड़ी को कान से लगाया — टिक… टिक… और फिर वो छोटी सी आवाज़, जो पहले नहीं थी, जैसे घड़ी के अंदर कोई धीरे से गिन रहा हो — दस… नौ… आठ…
उसने घड़ी नीचे रख दी और इरा की तरफ़ देखा। "इरा," उसने कहा, "कल सुबह जो भी हो, तुम मशीन बंद मत करना। चाहे मैं गिरूँ, चाहे कोई चीख़े — बंद मत करना।"
इरा ने उसकी आँखों में देखा और हाँ में सिर हिलाया। उसकी उँगलियाँ मशीन के बटन पर थीं, और वो काँप नहीं रही थीं।
बाहर अंधेरा पूरा उतर आया था। गली में कहीं दूर एक कुत्ता भौंका, फिर चुप हो गया। रवि ने शीशी उठाई, उसे अपनी जेब में रखा, और फिर पेन उठाकर उसकी नोक को देखा। स्याही सूखी थी, पर उसने उसे जीभ पर लगाकर देखा — अब भी कड़वी थी, जैसे दस साल पुरानी सच्चाई हो।
॥
रवि ने शीशी अपनी जेब से निकाली और अपनी हथेली पर रख ली। ठंडी काँच उसकी हथेली से चिपक गई। डॉक्टर अनवर ने दरवाज़े की तरफ़ एक पल को देखा, फिर झुककर उसकी कुंडी अंदर से बंद कर दी। बड़ी किताबों वाली दीवार के पास, मोटी लकड़ी की मेज़ पर एक पुराना हरा बल्ब जल रहा था, जिसकी रोशनी में धूल साफ़ कणों की तरह तैर रही थी।
"बैठो, बेटा," अनवर ने कहा और अपनी कुर्सी से सटकर बैठ गए। "ये शीशी मैंने पहले भी देखी है। एक बार असली में, और एक बार… ख़्वाब में। दस साल से हर रात।" उन्होंने शीशी रोशनी के सामने उठाई। उसके अंदर बचा पीला तरल बल्ब की रोशनी में थोड़ा सुनहरा लग रहा था। "ये दवा दस साल पहले इस शहर में सिर्फ़ दो जगह बनी थी। एक सरकारी लैब में — जहाँ मैं जूनियर डॉक्टर था। और दूसरी जगह… एक प्राइवेट लैब में। ज़ुबैर की लैब में।"
रवि ने उनकी तरफ़ देखा। "आपको इतना कैसे पता?"
अनवर ने शीशी नीचे रख दी। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं और वो उन्हें छिपाने की कोशिश नहीं कर रहे थे। "क्योंकि एक रात मैंने अपनी आँखों से वो शीशियाँ लैब से ग़ायब होती देखीं। दो अलमारियाँ थीं, ताले खुले पड़े थे, और अंदर सिर्फ़ ख़ाली खाँचे थे। मैंने उस रात चौकीदार को जगाया, हमने हर कोना छान मारा। कुछ नहीं मिला।" उन्होंने घुटने पर हाथ रखकर गहरी साँस ली। "कुछ दिन बाद, सुबह-सुबह मेरे हाथ में एक तबादले का काग़ज़ थमा दिया गया। दूर के एक कस्बे का। बिना वजह, बिना वक्त। जैसे किसी ने कह दिया हो — अब चुप हो जा, और दूर जाकर बैठ।"
इरा ने अपना पुराना नोटबुक निकाला, पन्ना उलटा, और पेन तैयार किया। "सर, उस वक़्त आपने किसी को बताया? कोई शिकायत लिखी?"
अनवर कुछ देर चुप रहे। हरे बल्ब की रोशनी में उनका चेहरा हड्डियों का ढाँचा भर लग रहा था। फिर उन्होंने अपनी मेज़ की दूसरी दराज़ खोली, जो खुलने में चरमराई, और उसमें से एक पुराना, पीला पड़ा लिफ़ाफ़ा निकाला। उस पर धूल की पतली परत जमी थी। उन्होंने उसे मेज़ पर रखकर धीरे से सीधा किया।
"मैंने शिकायत लिखी थी," उन्होंने कहा। "तीन पन्नों की। हर पन्ने पर मेरा हस्ताक्षर था, हर तारीख़ थी। मैंने उसे तीन बार बंद लिफ़ाफ़े में डालकर डाक में डालने के लिए मुहर भी लगाई।" उन्होंने लिफ़ाफ़ा खोला और अंदर से पन्ने निकाले। "और तीनों बार, किसी ने मुझे रास्ते में रोक दिया। एक बार रिश्वत की बात आई, एक बार नौकरी की धमकी, और तीसरी बार…" उनका गला रुक गया। "तीसरी बार मेरी चार साल की बेटी स्कूल के गेट पर डेढ़ घंटे अकेली खड़ी रही। कोई लेने नहीं आया। उस दिन मैंने लिफ़ाफ़ा दराज़ में बंद कर दिया। हमेशा के लिए।"
लुट्टन पीछे की कुर्सी पर बैठा था। उसने चुप नहीं रह पाया। "यार, ये तो वही कहानी है। बस यहाँ डॉक्टर बदल गया, बाक़ी सब वही। धमकी, डर, और एक आदमी जो अंदर ही अंदर मरता रहा।" उसने मुँह में पान डाला, पर थूका नहीं। जैसे उसे अच्छा नहीं लगा।
इरा ने पन्ने उठाए और रोशनी की तरफ़ किए। "सर, ये तो आपकी हैंडराइटिंग है। पुरानी स्याही, पर साफ़। ये अदालत में चलेगा।"
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