Billionaire Empire System – Chapter 786
अनवर ने उसकी तरफ़ देखा, और फिर धीमी आवाज़ में बोले, "मैंने शिकायत लिखी। पर भेजी नहीं।" उन्होंने कुर्सी की पीठ को हाथ से सहारा दिया। "अगले महीने मेरा तबादला हो गया। दूर के एक कस्बे में। तीन साल बाद मैंने नौकरी छोड़ दी और यहाँ लौट आया। मुझे पता था — अगर शिकायत भेजी होती, तो मैं आज ज़िंदा न होता।"
कमरे में एक पल सन्नाटा छा गया। बाहर किसी ने साइकिल की घंटी बजाई, और वो आवाज़ इतनी दूर लगी जैसे किसी और शहर से आ रही हो।
रवि ने धीरे से कहा, "सर, मेरे पापा को भी उसी दवा से मारा गया।"
अनवर ने शीशी को मेज़ पर रख दिया और अपने चश्मे के पीछे हाथ से आँखें ढँक लीं। उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी। फिर उन्होंने हाथ नीचे किए और रवि की तरफ़ देखकर कहा, "इस शीशी की ख़ुशबू… ये दालचीनी है, है ना?"
रवि ने सिर हिलाया। "हाँ। मुझे भी वही महक आई थी।"
"ये दवा में डाली जाती थी," अनवर बोले, "ताकि मरीज़ को पता न चले। और ये जानने वाले… " वो रुके, "…पूरी दुनिया में तीन ही थे। एक मर चुका है। दूसरा मैं हूँ। और तीसरा…" उन्होंने शीशी की तरफ़ देखा, "…तीसरा वो आदमी है, जिसने ये शीशी भरी। तुम्हारे पापा।"
इरा ने आगे झुककर कहा, "सर, आपने ये सब अपनी शिकायत में लिखा था?"
"लिखा तो था," अनवर ने कहा, "पर भेजा नहीं।"
"तो लिखा कहाँ है?" रवि ने पूछा।
अनवर ने कुछ देर उसकी तरफ़ देखा। फिर वो धीरे से उठे, मेज़ की दराज़ खोली, और उसमें से एक पुराना लिफ़ाफ़ा निकाला। लिफ़ाफ़े का रंग पीला पड़ गया था, किनारे चिपके हुए, और उस पर कुछ भी नहीं लिखा था। उन्होंने उसे रवि के सामने मेज़ पर रख दिया।
"ये वो शिकायत की कॉपी है।" उन्होंने कहा। "दस साल से इस दराज़ में बंद है। मैंने सोचा था कि मेरे साथ ही दब जाएगी।"
रवि ने लिफ़ाफ़े को छुआ। काग़ज़ सूखा था, पर जैसे हाथ लगाते ही ज़िंदा हो गया हो। उसने लिफ़ाफ़ा उठाया और अनवर की तरफ़ बढ़ा दिया।
"सर, ये आपकी है।" उसने कहा। "मैं इसे आपकी मर्ज़ी के बिना नहीं लूँगा।"
अनवर एक पल को रुके। फिर उनका हाथ धीरे से उठा और उन्होंने लिफ़ाफ़ा रवि के हाथ में ही रखा। उनका हाथ अब भी काँप रहा था, पर शीशी जितना नहीं।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैं तुमसे एक बात कहूँ। तुम्हारे पापा ने ये शीशी भरी, जानते हुए कि उन्हें क्या कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने इसे उसी तरीके से भरा जैसे कोई खत लिखता है — जिसे पहुँचना ही होता है। और अब ये तुम तक पहुँची है। इसका मतलब है कि उनका वो काम अभी पूरा नहीं हुआ।"
रवि ने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा। गला भर आया था, पर उसने खुद को संभाला। "सर, कल सुबह दस बजे सेवा सदन के सामने सब कुछ सामने आएगा। मुझे एक गवाह चाहिए — जो दवा पहचाने और सच बोले।"
अनवर कुछ देर चुप रहे। उनकी आँखें दीवार पर टँगी तस्वीर की तरफ़ गईं। फिर उन्होंने उस तस्वीर को देखा, जैसे उसमें से कोई पुराना साथी जवाब दे रहा हो।
"मैं तुम्हारे साथ चलूँगा," वो बोले। "पर एक शर्त पर।"
"क्या?" रवि ने पूछा।
"मैं वहाँ तुम्हारे नाम से नहीं, अपने नाम से खड़ा होऊँगा। मैंने दस साल ये सच अपने अंदर दबाया है। मरने से पहले, एक बार सच बोलकर हल्का होना है।"
लुट्टन पीछे से बोला, "सर, आपकी उम्र में… मतलब, आप ठीक रहेंगे ना?"
अनवर ने पहली बार हल्की मुस्कान दी। "बेटा, मैं दस साल से ज़िंदा नहीं हूँ। जिस दिन नौकरी छोड़ी, उस दिन मर गया था। अब अगर कल मैदान में कुछ हो जाए, तो कम से कम कुछ होते हुए तो होगा।"
इरा ने नोटबुक निकाली और रवि की तरफ़ देखकर धीरे से कहा, "इस बात को मैं कैमरे में रखूँ?"
अनवर ने उसकी तरफ़ देखा, और फिर हाँ में सिर हिलाया।
तभी रवि ने अपनी घड़ी की तरफ़ देखा। साढ़े छह बज चुके थे। उसने अपनी कलाई पर देखा — चाँदी की घड़ी अब भी चल रही थी। उसने उसे कान से लगाया। टिक-टिक साफ़ थी, बस एक बार रुककर फिर चलने लगी थी, जैसे किसी ने जल्दी से साँस ली हो।
अनवर ने घड़ी की तरफ़ देखा और उनका चेहरा फिर से बदल गया। "ये घड़ी…" उन्होंने कहा, "…ये तुम्हें कहाँ मिली?"
"पापा ने मेरे लिए छिपाकर रखी थी।" रवि ने कहा।
अनवर उठे और घड़ी को बहुत गौर से देखने लगे। फिर उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, "इस घड़ी का डिज़ाइन तो…" वो रुके, फिर सिर हिलाया, "नहीं, छोड़ो। पहले कल का दिन निकल जाने दो।"
लुट्टन ने चाय का खाली कप उठाया और बोला, "सर, आपकी चाय ठंडी हो गई थी। मैं फिर से ले आऊँ?"
अनवर ने हल्की हँसी में कहा, "बेटा, मुझे बीस साल में चाय की तलब किसी ने नहीं पूछी।" फिर उन्होंने दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया। "जाओ, धूप कम हो रही है।"
तीनों बाहर निकले। रवि दरवाज़े पर रुका और पलटकर बोला, "सर, धन्यवाद।"
अनवर ने दरवाज़ा पकड़े-पकड़े कहा, "बेटा, एक बात याद रखना। सच बोलने वाले को हमेशा दो चीज़ें चाहिए — काग़ज़ और आवाज़। काग़ज़ तुम्हारे पास है। आवाज़ कल पूरा शहर बनेगा। और हाँ," उन्होंने जेब से एक पुराना पेन निकालकर रवि को दिया, "ये लो। ये उसी रात का पेन है, जिस रात शिकायत लिखी थी। अब इसे तुम्हारे हाथ में होना चाहिए।"
रवि ने पेन लिया। स्याही सूख चुकी थी, पर पकड़ मज़बूत थी।
दरवाज़ा बंद होने से पहले अनवर ने एक और बात कही। "अंदर आओ, बैठो… नहीं, अब नहीं। अब तो कल की तैयारी करो।" वो मुस्कुराए, और फिर उन्होंने एक गहरी साँस ली। "पर एक बात और। जब मैं कल मैदान में जाऊँगा, मैं जो बताऊँगा, उसके बाद मैं भी तुम्हारी तरह ख़तरे में हूँ — शायद तुमसे ज़्यादा।"
रवि ने कहा, "सर, कल के बाद मैं आपको हर हाल में सुरक्षित रखूँगा। ये वादा है।"
अनवर ने दरवाज़ा बंद करते हुए कहा, "बेटा, वादा सुरक्षित रखने का नहीं, सच पूरा करने का करना। सुरक्षा एक दिन की बात है, सच सालों की।"
दरवाज़ा बंद हुआ। रवि एक पल उस बंद दरवाज़े को देखता रहा, फिर वो मुड़ा। लुट्टन चुप था, और इरा ने नोटबुक बंद कर दी थी।
गली से बाहर निकलते हुए रवि ने लुट्टन की तरफ़ देखा। "यार, तुझे क्या लगता है? कल क्या होगा?"
लुट्टन ने धीरे से कहा, "यार रवि, भगवान भी मुझे भूल गया है। पर आज इतनी सुबह — " उसने सामने आसमान की तरफ़ इशारा किया, जहाँ सूरज लाल होकर उठ रहा था, " — और ये सूरज अभी से लाल है। इसका मतलब तो यही है कि आज कुछ न कुछ तो होगा।"
इरा ने बीच में कहा, "रवि, एक बात पर मैं साफ़ रहना चाहती हूँ। कल जब सबके सामने सच आएगा, तो कुछ लोग ये भी कहेंगे कि ये सब तुम्हारी साज़िश है। तुम तैयार हो?"
रवि ने कदम रोके। उसने अपनी घड़ी की तरफ़ देखा, फिर सामने दूर, सेवा सदन की उस जर्जर छत की तरफ़, जो इस पूरी गली के ऊपर दिख रही थी, ऐसे किसी पुराने ज़माने की तरह सिर उठाए खड़ी थी।
"इरा," उसने कहा, "मैं आज तक सिर्फ़ यही कहता आया हूँ — मैं चाय वाला हूँ। कल भी यही कहूँगा। और सच? सच को मैं सिर्फ़ अपने हाथ में रखूँगा, बाकी सब तो उसका असली मालिक है।"
इरा ने कुछ नहीं कहा। बस अपनी नोटबुक सीने से लगाकर चलने लगी, जैसे कहीं उसका कोई राज़ भी उनके साथ-साथ चल रहा हो।
गली के नुक्कड़ पर पहुँचकर लुट्टन अचानक रुका। उसने रवि की बाँह पकड़ी और धीरे से बोला, "यार, एक बात बोलूँ? कल जो भी हो, मैं तेरे साथ रहूँगा। मुझे नौकरी की पड़ी है, दुकान की पड़ी है। बस…" उसकी आवाज़ अटक गई, "बस तू कहे तो आज रात मैं तेरे घर पर ही रुक जाऊँ। माँ से कह दूँगा कि दुकान पर काम है।"
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