Billionaire Empire System – Chapter 785
नीली रोशनी बुझी, और कोना फिर अंधेरा हो गया।
रवि एक पल को रुका, फिर धीरे-धीरे उस कोने की तरफ़ बढ़ा। उसके जूतों के नीचे सूखी पत्तियाँ चटकीं। बिजली के खंभे के पीछे सिर्फ़ ठंडी राख पड़ी थी, जैसे किसी ने अभी-अभी काग़ज़ जलाया हो। राख के बीच एक चीज़ चमकी — पीतल का एक टूटा बटन, जिस पर कोई निशान खुदा था। रवि ने उसे उठाया। हल्का था, पर हाथ में रखते ही कुछ अजीब-सा लगा।
उसने चारों तरफ़ देखा। गली खाली थी। बस दूर कहीं कुत्ता भौंका, और हवा में चाय की जली हुई गंध बची रह गई थी।
रवि ने वो बटन जेब में डाला और घड़ी को सीने से लगाकर सीधा दुकान की तरफ़ चल दिया। उस रात किसी की आँख नहीं लगी।
सुबह चार बजे रवि दुकान के पीछे वाली कोठरी में बैठा था। सामने लकड़ी की मेज़ पर वो काँच की शीशी रखी थी, जिसमें पापा का काग़ज़ था। उसने काग़ज़ खोला — पीला पड़ चुका था, किनारे मुड़े हुए — और उस पर बस एक लाइन लिखी थी।
"उसके काँपते हाथ कभी मत छोड़ना।"
रवि ने उसे दोनों हाथों से सीधा किया और जेब में रख लिया। उसके हाथ अभी भी काँप रहे थे, पर अब वो काँपते हुए भी साफ़ काम कर रहे थे। उसने शटर उठाया। बाहर की ठंडी हवा मुँह पर लगी। आसमान में हल्की सुर्खी फैल रही थी।
वो मुड़ा, तो लुट्टन दुकान के बाहर खड़ा मिला। पान की दुकान की लाइट जल रही थी, पर वो अपने काउंटर पर नहीं था। वो एक ही जगह खड़ा था, आँखें लाल, बाल बिखरे, बनियान पर पान की लाली सूखी हुई। लग रहा था जैसे पूरी रात इसी जगह खड़ा रहा हो।
"तू सोया नहीं?" रवि ने पूछा।
"सोया कहाँ, यार।" लुट्टन ने हाथ से आँखें मली। "तू उस रात कोई-कोई चीज़ लेकर आया है, जिसका मतलब मैं समझ ही नहीं पा रहा। मैं सोचता रहा — ये शीशी में सच है, तो हम इसे ऐसे आदमी को दिखाएँ, जो दवा पहचाने। डॉक्टर जोशी तो खुद ज़ुबैर के डर से काँप रहे हैं, यार। बेचारे के हाथ आज भी वैसे ही काँप रहे थे।"
रवि ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "तुझे कुछ पता है?"
"मुझे नहीं पता।" लुट्टन ने गले को साफ़ किया। "पर एक आदमी है। मेरे पान की दुकान पर एक बूढ़ा आता था, बड़ा बातूनी। कहता था — उसके चाचा रिटायर फ़ॉरेंसिक डॉक्टर थे। नाम डॉक्टर अनवर। दस साल से किसी से बात नहीं करते। मैंने सोचा, तुझे बता दूँ।"
रवि कुछ देर उसे देखता रहा। फिर बोला, "चल फिर।"
इरा का दफ़्तर ख़ान साहब की मस्जिद के पास था। छोटी सी दो कमरों की जगह, दीवार पर लगे टीवी पर चैनल चल रहा था, और कॉफ़ी की गंध फैली हुई थी। इरा सामने बैठी थी, हाथ में पेन, सामने खुली नोटबुक। उसने सुना और बिना देर किए एक पन्ना पलटा।
"डॉक्टर अनवर।" उसने कहा। "ये नाम मुझे सलाहकार की फ़ाइल में मिला था। रिटायर फ़ॉरेंसिक डॉक्टर। सरकारी लैब में दस साल काम किया, फिर अचानक छोड़ दिया। पुराने इलाक़े की एक गली में अकेला रहता है।"
"क्यों अकेला?" रवि ने पूछा।
इरा ने कंधे उचकाए। "यही तो सवाल है। मैं दो बार उसके घर तक गई थी। दरवाज़ा नहीं खुला। बाहर से ही लौट आई।"
लुट्टन ने चाय का कप उठाया। "अब तीसरी बार हम जाएँगे।"
"चलो।" रवि उठा। "पर एक बात — मैं सामने रहूँगा।"
इरा ने सिर उठाया। "क्यों?"
"क्योंकि तेरे पीछे अगर कोई है, तो वो तुझे देख रहा है।" रवि ने कहा। "मुझे देखे, तो मुझे पता चलेगा।"
इरा कुछ देर उसे देखती रही। फिर उसने अपनी नोटबुक बंद की और उठ खड़ी हुई।
पुराने इलाक़े की वो गली इतनी पतली थी कि तीनों को एक-एक करके चलना पड़ा। दीवारों पर चूने की पपड़ी उखड़ी हुई थी, और एक जगह जंग लगे पाइप से पानी टपक रहा था। घर के बाहर आँगन में तुलसी का पौधा था, और दरवाज़े पर ज़ंग लगी कुंडी। दरवाज़े का रंग उतर चुका था। लग रहा था जैसे सालों से यहाँ कोई नहीं आया।
रवि ने दरवाज़ा खटखटाया। कोई जवाब नहीं।
दो बार और। फिर अंदर से किसी के चलने की धीमी आवाज़ आई। कुंडी खुली। दरवाज़ा थोड़ा सा खुला और उसमें से एक बूढ़ा चेहरा झाँका।
डॉक्टर अनवर कद में छोटे थे, कमर झुकी हुई, सफ़ेद बाल कानों तक बिखरे हुए। आँखों पर मोटा चश्मा था, जिसके पीछे की आँखें धुँधली पर सीधी थीं। उनके हाथ में एक पुरानी लाठी थी, जिस पर उँगलियों के निशान बन गए थे।
"क्या है?" उन्होंने कहा। आवाज़ रूखी थी, जैसे दरवाज़े का रंग।
"सर, मेरा नाम रवि प्रसाद है।" रवि ने कहा। "मेरे पापा अशोक प्रसाद थे।"
बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया। बस चश्मे के पीछे उनकी आँखें एक पल के लिए ठिठक गईं।
"सर, मुझे एक चीज़ दिखानी है।" रवि ने कहा। "बस एक मिनट।"
अनवर ने तीनों को ऊपर से नीचे देखा। फिर कुछ देर चुप रहे, जैसे अंदर हिसाब लगा रहे हों। "एक मिनट," वो बोले, और दरवाज़ा खोल दिया।
अंदर दो कमरे थे। एक में पुरानी कुर्सी, चटाई, और लकड़ी की मेज़, जिस पर किताबों का ढेर पड़ा था। दूसरी तरफ़ एक छोटी खिड़की से सुबह की रोशनी आ रही थी। हवा में धूल, पुराने काग़ज़ और कपूर की गंध थी। दीवार पर एक तस्वीर टेढ़ी लटकी थी — किसी लैब की, जिसमें सफ़ेद कोट पहने कई लोग खड़े थे।
रवि ने जेब से शीशी निकाली और मेज़ पर रख दी।
"सर, ये शीशी मुझे पापा की निशानी में मिली थी। इसमें एक आदमी की आख़िरी साँस है। मैंने ये खोली थी। और मुझे उस रात में… एक सुई दिखी, जो उस आदमी ने खुद अपनी बाँह में लगाई थी।"
डॉक्टर अनवर ने एक पल शीशी को देखा, और फिर उनका चेहरा बदल गया। वो कुर्सी से उठे, दो कदम बढ़े, और शीशी उठा ली। उनके हाथ अचानक काँपने लगे — ऐसे काँपने लगे जैसे कोई बूढ़ा आदमी नहीं, बल्कि कोई पुराना ज़ख़्म काँप रहा हो।
रवि ने यही देखा। उसका दिल एक पल को रुक गया।
बूढ़े ने शीशी को आँखों के करीब लाया, काँच पर उँगली फेरी, और फिर फुसफुसाए — "ये… ये तो मैंने बहुत पहले देखी थी।"
लुट्टन ने चुपचाप चाय का कप मेज़ पर रख दिया, जो उसने रास्ते में खरीदी थी। चाय छलक गई। किसी ने नहीं पोछा।
"बेटा," अनवर ने धीरे से कहा, और अब उनकी आवाज़ बदल चुकी थी। "तुम्हें पता है तुम क्या लेकर आए हो?"
रवि ने गला साफ़ किया। "नहीं। इसीलिए तो आपके पास आया हूँ।"
अनवर कुर्सी पर बैठ गए, पर शीशी अपने हाथ में ही रखी। उन्होंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा और एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई बहुत पुरानी दुआ याद आ गई हो। फिर उन्होंने आँखें खोली और रवि की तरफ़ देखा।
"तुम्हारे पापा अशोक…" वो रुके, फिर बोले, "…मैं उन्हें जानता था। नहीं, यूँ कहो — मैं उन्हें देखता था, पर कभी मिला नहीं।"
"कैसे?" इरा ने आगे बढ़कर पूछा।
अनवर ने उसकी तरफ़ देखा। "तुम कौन हो?"
"इरा ख़ान। रिपोर्टर।"
अनवर का चेहरा थोड़ा और सख़्त हुआ। "तुम्हारे पापा सलाम ख़ान थे?"
इरा एक पल को ठिठक गई। "आप उन्हें जानते थे?"
अनवर ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने शीशी उठाई और दीवार पर टँगी तस्वीर की तरफ़ इशारा किया। "ये तस्वीर देखो। दस साल पुरानी है। सरकारी लैब की है। मैं उस लैब में जूनियर डॉक्टर था। हम दवाओं के नमूने जाँचते थे, और उन पर मुहर लगाते थे। उस साल एक नई दवा बनी — बहुत ज़रूरी दवा, दिल के मरीज़ों के लिए। एक रात कुछ शीशियाँ लैब से ग़ायब हो गईं।"
लुट्टन ने धीरे से कहा, "और आपने किसी को बताया?"
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