Billionaire Empire System – Chapter 783
रवि ने उसकी तरफ़ देखा। रघुवीर की आँखें छत की तरफ़ उठी हुई थीं, जैसे वो खुद से कुछ कह रहा हो।
"रवि," उसने धीरे से कहा, "मैंने दस साल इस फ़ाइल को देखने की हिम्मत नहीं की। जब भी ये अलमारी दिखती, मेरी टाँगें काँपने लगतीं। मैं सोचता — अगर मैंने देखा, और कुछ ऐसा मिला जो मुझे फँसा दे, तो बच्चे क्या खाएँगे?" उसने रवि की तरफ़ मुड़कर देखा। "आज बेटा, तेरे साथ देख रहा हूँ। और अजीब बात है… अब डर नहीं लग रहा।"
रवि उठा और रघुवीर के पास जाकर उसका हाथ पकड़ लिया। रघुवीर का हाथ ठंडा और पसीने वाला था।
"सर," रवि ने कहा, "आप दस साल से अकेले डर रहे थे। अब अकेले नहीं हैं।"
रघुवीर ने पलकें झपकीं, बहुत तेज़, जैसे उसे रोकना मुश्किल हो रहा हो। फिर उसने हंसने की कोशिश की और अपना हाथ खींचकर वर्दी सीधी की। "हाँ, हाँ, बड़ी बातें। पहले वो पन्ने निकालें, फिर मेरी वर्दी की बात करना।"
उसने चाबी उठाकर रवि की हथेली पर रख दी। "आज रात बारह बजे। जब तिवारी अपने घर चला जाए और यहाँ सिर्फ़ एक सिपाही रहे, जो मेरा पुराना साथी है। मैं तुम्हें पिछली खिड़की से अंदर लाऊँगा।"
रवि ने चाबी मुट्ठी में बंद कर ली। "सर, अगर पकड़े गए तो?"
रघुवीर ने अपनी वर्दी का कॉलर पकड़कर हिलाया। "तो ये वर्दी जाएगी। पर आज सुबह मैंने अपनी बीवी से जो कह दिया है, उसके बाद ये वर्दी मुझे खुद से भारी लग रही है।"
रवि थाने से निकला तो बाहर शाम हो चुकी थी। मंदिर की घंटी कहीं दूर बज रही थी और सब्ज़ी मंडी की तरफ़ से गाड़ियों का शोर आ रहा था। रास्ते में उसने इरा को फ़ोन किया।
"रघुवीर को पन्ने मिल गए हैं," उसने कहा। "मगर फ़ाइल से दो पन्ने किसी ने निकाले हैं। वो तिवारी की तिजोरी में हो सकते हैं।"
इरा उस पल चुप हो गई। फिर बोली, "रवि, तुम उसकी तिजोरी तक कैसे पहुँचोगे?"
"रघुवीर ले जाएँगे। आज रात।"
इरा ने एक गहरी साँस ली। "मैं साथ चलूँगी।"
"इरा…"
"रवि, ये बहस का वक़्त नहीं है। तुम अकेले अंदर जाओगे और मैं बाहर गाड़ी में बैठी रहूँगी — ये मुझे पसंद नहीं।" उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो अब रवि पहचानने लगा था। "मैं बाहर खड़ी रहूँगी। अगर एक भी गड़बड़ हुई, तो मैं सीधा लाइव जाऊँगी। तुम्हारे पास मेरा नंबर है।"
रवि मुस्कुराया, पता नहीं क्यों। "ठीक है।"
"और रवि…" उसने रुककर कहा, "आज शाम को माँ से मिल लेना। वो सुबह से पूछ रही हैं।"
"जा रहा हूँ।"
घर पहुँचा तो आँगन में दीया जल रहा था और माँ पुरानी चारपाई पर बैठी थीं। उनके हाथ में पिंकी की कॉपी थी — वही जिस पर लिखा था "पिंकी ड्रीम प्रोजेक्ट"। उनके चेहरे पर वो भाव था जो रवि ने पहले कभी नहीं देखा — कुछ हैरानी, कुछ डर, और उसके नीचे एक गहरी शांति।
"माँ?" रवि ने पास जाकर कहा।
सीता देवी ने सिर उठाया। "आज मैंने पिंकी का बैग साफ़ किया। उसकी किताबें निकालीं। ये कॉपी नीचे से मिली।"
रवि ने कहा, "ये उसकी ड्रीम प्रोजेक्ट कॉपी है, माँ। उसके सपने लिखे हैं।"
"हाँ," माँ ने धीरे से कहा। "पर रवि, पन्ने पलटते-पलटते आख़िर में एक पन्ना आया, जो पिंकी की लिखाई में नहीं है। वो तेरे पापा की लिखाई है। मैं उनकी लिखाई कैसे नहीं पहचानूँगी?" उनकी आवाज़ हल्की काँपी, फिर सँभली। "वो पन्ना देखकर मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने सोचा, पहले तुझे दिखाऊँ।"
रवि ने कॉपी ली। उसके हाथ भारी हो गए। उसने आख़िरी पन्ना पलटा।
पुरानी स्याही में, टेढ़ी-मेढ़ी लिखाई में, चार लाइनें थीं। कोई तारीख़ नहीं, कोई नाम नहीं। बस इतना —
"रवि, अगर तू ये पढ़ रहा है, तो मैं जानता हूँ तूने सवाल पूछना शुरू कर दिया है। अच्छा किया। अब शीशी खोल।"
रवि की साँस रुक गई। उसने पन्ने को दोनों हाथों से पकड़ लिया, जैसे वो उड़ जाएगा।
"माँ…" उसने धीरे से कहा, और उसकी आवाज़ फट गई। "ये… ये लिखा है 'अब शीशी खोल'?"
माँ ने उसका चेहरा देखा और उनकी आँखें भर आईं। "कौन सी शीशी, रवि?"
रवि ने उनकी तरफ़ देखा। क़ासिम भाई की वो काँच की शीशी तो वो कब की खोल चुका था — उसमें पापा की आख़िरी साँस थी। फिर पापा ये कौन सी शीशी खोलने को कह रहे थे?
उसने शीशी के बारे में सोचा, पापा की उस आवाज़ के बारे में सोचा जो उसने सुनी थी, और उसे अचानक लगा कि उसकी गर्दन के पीछे ठंडी हवा का एक झोंका आया है। जैसे कोई उसके कान के पास आकर फुसफुसाया हो।
उसने पन्ने को करीब से देखा। लिखाई के नीचे, कोने में, बहुत छोटा सा, एक निशान था — चार खड़ी लकीरें और उनके ऊपर एक आड़ी लकीर। जैसे कोई घड़ी की सुइयाँ खींचकर दिखा रहा हो। रवि ने अपनी कलाई देखी, जहाँ पापा की चाँदी की घड़ी टिक-टिक कर रही थी। उसने कॉपी सीने से लगा ली और माँ की तरफ़ देखा।
"माँ, ये पन्ना मुझे मिला है…" उसकी आवाज़ धीमी थी, "…पर ये सवाल मुझसे बड़ा है।"
तभी उसकी जेब में फ़ोन काँपा। स्क्रीन पर रघुवीर का नाम। रवि ने उठाया।
दूसरी तरफ़ से रघुवीर की फुसफुसाती आवाज़ आई, "रवि… तिजोरी खुल गई। तू जल्दी आ। पर एक बात है…"
रवि का दिल ज़ोर से धड़का। "क्या?"
"तिजोरी के अंदर दो पन्ने नहीं हैं। तीन हैं। और तीसरे पन्ने पर तेरे पापा की लिखाई में सिर्फ़ एक लाइन है — 'अगर मैं मर गया, तो ये मेरा क़त्ल है।' उसके नीचे एक नाम है, रवि।"
रवि का हाथ काँपने लगा। "कौन सा नाम, सर?"
दूसरी तरफ़ से सिर्फ़ साँस की आवाज़ आ रही थी। फिर रघुवीर ने धीरे से कहा, "मैं नाम नहीं बोल सकता, रवि। तेरे कानों तक बोलूँगा। बस जल्दी आ।"
और फ़ोन कट गया।
॥
फ़ोन कटा तो रवि की उँगलियाँ स्क्रीन पर जम गईं। माँ ने उसका चेहरा देखा और बिना कुछ पूछे बस इतना कहा, "जा। पिंकी को मैं सँभाल लूँगी।"
रवि ने कॉपी सीने से लगाई, माँ के पैर छुए और सीधे गली में भागा। रात के दो बज रहे थे। गली में सिर्फ़ एक कुत्ता भौंक रहा था और लुट्टन की दुकान का बल्ब झिलमिला रहा था।
थाने की पिछली कोठरी में रघुवीर सिंह बैठा था। उसके सामने लोहे की तिजोरी खुली पड़ी थी और उसके हाथ में तीन पुराने पन्ने। उसका चेहरा पसीने से चमक रहा था, पर आँखें पहली बार बिलकुल सीधी थीं।
"सर," रवि ने साँस रोककर कहा। "नाम क्या है?"
रघुवीर ने पन्ना उलटा कर दिया। "पहले ये सुन ले। तेरे पापा ने लिखा है — 'मुझे पता है कि मुझे मारा जाएगा। पर मैं चुप नहीं रहूँगा। जो काग़ज़ मेरे पास हैं, वो सबसे बड़ी गवाही हैं। मेरे बाद अगर कुछ हो, तो सबसे पहले क़ासिम से मिलना। वो जानता है, कहाँ रखा है।' और उसके नीचे…"
रघुवीर ने आवाज़ और धीमी की। "उसके नीचे दो नाम हैं, रवि। एक बलवंत राय का। और दूसरा… डॉक्टर रघुराज का।"
रवि को लगा जैसे कोठरी की छत उसके सिर पर आ गिरी। वो दीवार का सहारा लेकर खड़ा रहा।
"रघुराज," उसने धीरे से दोहराया। "भीतर का चीफ़ साहब।"
"हाँ," रघुवीर ने कहा। "और एक बात — तेरे पापा ने इस पन्ने के नीचे तारीख़ भी डाली है। ये लिखा है उस रात से चार दिन पहले। मतलब…"
"मतलब पापा को पता था," रवि ने कहा। उसकी आवाज़ ठंडी हो गई, बिलकुल वैसी जैसी उसकी आदत थी जब गुस्सा सातवें आसमान पर हो। "चार दिन पहले से पता था कि उन्हें मारा जाएगा। और वो फिर भी चुप रहे। मुझसे कुछ नहीं कहा।"
"कहते, तो तू उसी दिन मर जाता," रघुवीर ने कहा। "वो तुझे बचा रहे थे, रवि।"
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