Billionaire Empire System – Chapter 781
रवि ने उसे देखा। "और तुम मेरे पास क्यों आए?"
रोहित ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। उसकी हथेली पर एक छोटी सी चीज़ थी — एक टूटा हुआ बटन, चाँदी का, जिस पर एक उभरी हुई लकीर थी।
"ये उस रात का है," रोहित ने धीरे से कहा। "उस रात जब तुम्हारे पापा मरे थे। मैं उस वक़्त पंद्रह साल का था। मैंने इसे घर के बाहर पड़ा देखा था और डर के मारे जेब में डाल लिया था। आज तक रखा है।"
रवि ने वो बटन अपनी हथेली में लिया। हल्का था। चाँदी का। और उस पर एक हल्की सी खरोंच थी, जैसे किसी ने उसे दीवार से रगड़ा हो।
"रवि," रोहित ने कहा, "मैं तुम्हारे साथ हूँ। जो भी करना हो, मैं साथ दूँगा। पर एक बात साफ़ कर लो — जब सब ख़त्म हो, मेरे पापा को माफ़ी नहीं चाहिए। सज़ा चाहिए। और वो सज़ा मैं खुद दूँगा।"
रवि ने रोहित की आँखों में देखा। उसमें वो शिकारी नहीं था जो कल तक था। उसमें एक बेटा था, जो अपने बाप से पहली बार माफ़ी नहीं, सच माँग रहा था।
"ठीक है," रवि ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो फ़ैसले के वक़्त आती है। "पर एक चीज़ मेरी भी है। तुम्हारे पापा जिस से मिलते हैं हर महीने… उसकी अगली मुलाक़ात का वक़्त मुझे बताओ, और उस दिन तुम हमारे साथ आओगे।"
रोहित ने एक गहरी साँस ली, जैसे कोई पहाड़ उसके सीने से उतर रहा हो।
"दो दिन बाद," उसने कहा। "राय मेडिकल की बारहवीं मंज़िल। शाम को छह बजे। वो कभी नहीं चूकते।"
क़ासिम भाई ने पहली बार आँखें उठाईं और धीरे से बोले, "तो फिर, बेटा, अब सिर्फ़ दो दिन बचे हैं। और उन दो दिनों में हमें वो चीज़ ढूँढनी है जो रघुराज के काँपते हाथ पकड़ सके।"
रवि ने घड़ी देखी। दो बजकर इकतालीस मिनट। सुइयाँ चल रही थीं।
उसने वो टूटा हुआ चाँदी का बटन जेब में रखा और चाय का पहला घूँट लिया — वो चाय ठंडी थी, पर उसे लगा जैसे उसके पूरे शरीर में आग फैल गई हो।
॥
रात भर रवि की आँख नहीं लगी। छत पर पीठ के बल लेटा वो आसमान देखता रहा, पर आसमान में तारे नहीं, रोहित का चेहरा दिख रहा था। "मेरे पापा को माफ़ी नहीं चाहिए, सज़ा चाहिए… और वो सज़ा मैं खुद दूँगा।" ये लाइन उसके कान में बजती रही, जैसे कोई ताना हुआ तार कहीं अंदर काँप रहा हो।
सुबह पाँच बजे वो उठा। माँ अभी अस्पताल में थीं, पिंकी उनके पास। घर सुनसान था। उसने मुँह धोया, पुरानी क़मीज़ पहनी और चल दिया दुकान की तरफ़, बस आदत से — क्योंकि दुकान तो अब उसकी थी ही नहीं।
गली के मोड़ पर पहुँचा तो पैर रुक गए। शटर खुला था।
उसका दिल धक् से रह गया। किसी ने दुकान खोल दी? ज़ुबैर का आदमी? वो दौड़कर पास गया, और जो देखा उससे उसकी साँस अटक गई।
दुकान के ऊपर चमचमाता नया साइनबोर्ड लगा था। पीला, चौकोर, ताज़ा पेंट की महक उड़ रही थी। और उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था — "प्रसाद चाय भंडार — यहाँ सच और चाय, दोनों गरम।"
साइनबोर्ड के नीचे लुट्टन खड़ा था। मैली बनियान, होंठों पर पान की लाली, हाथ में पेंट का डिब्बा और ब्रश। उसके माथे पर पसीना था, और चेहरे पर वो वाली मुस्कान, जो वो तभी मुस्कुराता है जब उसने कोई बड़ी बेवकूफ़ी कर दी हो।
"लुट्टन…" रवि की आवाज़ फट गई। "ये क्या है?"
"यार, तेरी तो दुकान भी नहीं रही," लुट्टन ने ब्रश नीचे रखते हुए कहा, जैसे ये कोई बहुत साधारण बात हो। "फिर मैंने सोचा, कुछ तो करना चाहिए। तेरे पापा की दुकान पर ज़ुबैर का नाम नहीं लगेगा। बस।"
रवि वहीं खड़ा रह गया। उसने पापा की घड़ी देखी, फिर साइनबोर्ड देखा, फिर लुट्टन के हाथों में पकड़े उस पुराने ब्रश को देखा, जिसकी सींकें घिसी हुई थीं। लुट्टन ने रात भर जागकर ये किया था। अकेले।
"तूने ये… रात भर में?"
"दो बजे से," लुट्टन ने कंधे उचकाए। "भगवान भी मुझे भूल गया है, यार, पर नींद नहीं भूली। सो मैंने सोचा, तेरे पापा के लिए कुछ कर लूँ। पैसे वाले आदमी तो हमेशा मिल जाएँगे, रवि। पर तेरे पापा जैसा चाय वाला नहीं मिलेगा।"
रवि की आँखें भर आईं। उसने मुँह फेर लिया, पर लुट्टन ने देख लिया और तुरंत बात बदल दी, क्योंकि भावुक होना उसके हिसाब से बीमारी थी। "अरे, और सुन — पेंट भी मैंने खुद मिलाया। पीला, क्योंकि तेरे पापा को पीला पसंद था, ना? बोलना मत कि नहीं पसंद था, नहीं तो पूरा दिन मेरी लॉटरी की कसम खिलवाऊँगा।"
रवि हँसा। हँसी गले में अटक गई, आधी हँसी और आधा सिसकी, दोनों मिल गए। उसने लुट्टन के कंधे पर हाथ रखा और कुछ नहीं कहा। कहने की ज़रूरत नहीं थी।
तभी शकुंतला दौड़ती हुई आई, सिर पर लाल दुपट्टा, हाथों में गीला कपड़ा। "रवि! रवि, बाहर देख ज़रा! पूरी गली खड़ी है!"
रवि दौड़कर बाहर आया।
गली में लोग थे। बहुत लोग। बेंच पर बैठने की जगह नहीं, खड़े होने की जगह नहीं। दुकान के सामने एक लंबी लाइन लगी थी — सत्तर-अस्सी लोग, कंधे से कंधा मिलाए। दादी कम्मो, हाथ में लाठी, सबसे आगे खड़ी थीं। पीछे मुन्ना भाई अपनी टेढ़ी टाँग के सहारे खड़ा था, गले में तुलसी की माला, और वो कुछ गुनगुना रहा था। रघु दूध के डिब्बे लिए खड़ा था, और शकुंतला का पति भी वहीं था — आज वो नशे में नहीं था, सीधा खड़ा था।
और सबके हाथों में एक-एक काग़ज़ था। वही काग़ज़, जो गली के हर दरवाज़े के नीचे से सुबह-सुबह सरका दिया गया था। उस पर सीधे-सादे अक्षरों में लिखा था — "रविवार, सुबह दस बजे, सेवा सदन के सामने। सच सुनना है, तो आना।"
रवि ने एक काग़ज़ अपने हाथ में लिया। उसका हाथ काँपने लगा। "ये मैंने नहीं बाँटे," उसने धीरे से कहा। "मैंने तो किसी को कुछ नहीं बताया।"
पीछे से छड़ी की टक-टक आई। दादी कम्मो आगे आईं, पान चबाते हुए, झुर्रियों में धँसी आँखों में एक अजीब सी चमक। "अरे रे रे," उन्होंने कहा, "मैंने बाँटे।"
रवि पलटा। "दादी?"
"तेरे पापा मेरे लिए भी चाय छोड़ जाते थे, बेटा," दादी कम्मो ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो सूखापन था जो सिर्फ़ बहुत उम्र जीने के बाद आता है। "रोज़ सुबह, मेरे दरवाज़े पर एक गिलास चाय रखकर जाते थे। एक दिन भी नहीं भूले। जब वो गए, तो तेरी माँ ने वो आदत निभाई। और अब तेरी बारी है।"
उन्होंने रवि के हाथ में एक काग़ज़ रखा, फिर धीरे से कहा, "मैं जानती हूँ ये घड़ी कहाँ से आई, बेटा। तेरे पापा ने जिस रात इसे घर लाया था, वो रात मैंने अपनी आँखों से देखी है। उस रात वो रोया था। और मुझसे बोला था — 'दादी, ये चीज़ मेरे बेटे के हाथ लगेगी, तो सारा शहर बदल जाएगा।' अब तू खुद जान जाएगा कि वो क्या थी।"
रवि की साँस रुक गई। ये सुनकर उसके पूरे शरीर में एक झुरझुरी दौड़ गई, और आँखों के आगे पापा का चेहरा घूम गया — वो रात, दालचीनी की महक, टूटी घड़ी, और कोई नहीं जानता था कि उस बूढ़ी औरत के पास सालों से ये राज़ दबा था।
रवि झुककर दादी के पैर छूने लगा। "दादी…"
"उठ, उठ," दादी ने छड़ी टेकते हुए कहा, पर उनकी आवाज़ भर्रा गई थी। "मुझे तेरे पैर छूने नहीं आए थे। तेरे पापा की तरह खड़ा हो, तो सही।"
भीड़ में हल्की हँसी दौड़ी। मुन्ना भाई ने सबसे आगे से आवाज़ लगाई, "चाय मिलेगी या सिर्फ़ सच?" और शकुंतला ने हँसकर कहा, "दोनों, मुन्ने! दोनों!"
रवि हँसा। उस हँसी में वो ताक़त थी जो पिछले कई दिनों में नहीं आई थी। उसने लुट्टन के साथ मिलकर लाइन में चाय बाँटनी शुरू की। केतली चढ़ी, दूध उबला, पहली चुस्की और फिर पूरी गली में वो ख़ुशबू फैली, जो बचपन से उसके साथ थी। बेंच पर बैठे लोगों ने चाय ली, रघु ने दूध का डिब्बा खोला, और दादी कम्मो सबसे पहले गिलास पीकर बोलीं, "हाँ, अब मज़ा आया।"
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