Billionaire Empire System – Chapter 78
तभी रवि का फ़ोन बजा। माँ का नंबर। रवि ने उठाया। "माँ?"
दूसरी तरफ़ सीता देवी की आवाज़ काँप रही थी। "रवि… कहीं से फ़ोन आया था… किसी औरत ने कहा… 'बेटी को बाहर भेज दो, हिसाब बराबर करें'। मैंने पूछा कौन बोल रहा है… तो हँसी आई, और फ़ोन कट गया।"
रवि आँखें बंद करके खड़ा रहा। एक गहरी साँस अंदर खींची, पर साँस फिर नहीं आई। सीने में कुछ अटक गया, जैसे दालचीनी की गरम भाप गले में फँस जाए।
"माँ, तुम दरवाज़ा बंद कर लो। किसी को मत खोलना। मैं पिंकी को लेकर आ रहा हूँ।"
"रवि…" माँ की आवाज़ टूटी। "मेरी बच्ची…"
"माँ।" रवि की आवाज़ अचानक ठंडी हो गई, वैसी ठंडी जो उसके गुस्से में आती थी। "कुछ नहीं होगा उसे। सुनो मेरी बात — कुछ नहीं होगा।"
फ़ोन रखा। इरा उसका चेहरा देख रही थी। उसने कुछ नहीं पूछा, बस थैली से पानी की बोतल निकाली और उसकी तरफ़ बढ़ाई।
"पी लो। खाली पेट लड़ोगे तो गिर जाओगे।"
रवि ने बोतल नहीं ली। उसने टूटी घड़ी जेब से निकाली। हाथ काँप रहे थे, मगर आवाज़ साफ़ थी। "सुनो। मुझे पिंकी की जगह चाहिए। कुछ भी दे दो।"
घड़ी एक पल चुप रही। फिर उसकी सुइयों के नीचे से वो छोटी सी आवाज़ निकली — "दूसरे की आँखों से देखना। सात सौ पॉइंट। जिसे देखना है, उसकी चीज़ हाथ में हो।"
रवि ने पर्ची देखी। पिंकी का फ़ीता जेब से निकाला — उसकी चोटी से टूटकर गिरा हुआ, आधा। "ये है।"
"और सुन ले।" घड़ी की आवाज़ ज़रा रुकी। "हर शक्ति के बीच एक घंटा। इसके बाद अगली बार जब चलाएगा, तो ये सात सौ जाएँगे, और तेरे हाथ एक घंटे काँपेंगे। सोच ले।"
"जोड़ ले।" रवि ने कहा।
उसने फ़ीता हथेली पर रखा। इरा ने उसका हाथ थाम लिया, बिना कुछ बोले। और फिर रवि की आँखों के सामने गली, दुकान, ट्रक — सब धुँधला हो गया।
वो एक बंद कमरे में था।
दीवार पर पुरानी सीलन थी। कोने में खाली डिब्बे रखे थे, जिन पर "राय टावर" लिखा था। सामने एक लोहे की कुर्सी थी और उस पर बैठी थी पिंकी — आँखों पर काली पट्टी, हाथ रस्सी से बँधे, स्कूल की क़मीज़ पर धूल। उसकी नीली रिबन अब बालों में नहीं थी।
और सामने खड़ा था मुश्ताक़। हाथ जेब में, काला चश्मा, दस्ताने। वो धीरे-धीरे बोल रहा था, "डरो मत, बेटी। ये सिर्फ़ तुम्हारे भाई को अक्ल सिखाने का तरीका है। तेरे भैया ने बड़ी ज़िद कर ली है। साहब की घड़ी लौटा दे, बात खत्म।"
पिंकी की ठुड्डी नीचे थी, मगर उसकी आवाज़ रुकी नहीं थी। "मेरे भैया घड़ी नहीं लौटाएँगे।"
मुश्ताक़ हँसा। "अच्छा? और क्यों?"
"क्योंकि घड़ी मेरे पापा की है।" पिंकी ने कहा, और उसकी आवाज़ में बच्चों वाली ज़िद नहीं, इलाक़े की औरतों वाला लोहा था। "और भैया जो चीज़ अपने पापा की कहकर एक बार पकड़ लेते हैं, वो फिर किसी के डर से नहीं छोड़ते। तुम नहीं जानते मेरे भैया को।"
मुश्ताक़ का चेहरा ज़रा सिकुड़ा।
तभी एक और आवाज़ आई — दरवाज़े के पीछे से, मीठी और धीमी। "बस, मुश्ताक़। बच्चों से बहस करने का वक़्त नहीं है।"
मुश्ताक़ ने सिर झुका लिया। और दृश्य टूट गया।
रवि आँखें खोलकर घुटनों पर गिरा। दोनों हाथ ज़ोर से काँप रहे थे, जैसे किसी ने नसों में तार छोड़ दिए हों। इरा ने उसे सहारा दिया। कुछ पल बाद उसने आँखें खोलीं।
"मिल गई?" इरा ने पूछा।
"गोदाम है। राय टावर के डिब्बे हैं। सीलन है, दरवाज़े के बाहर कोई और था — जो मुश्ताक़ को हुक्म दे रहा था।" रवि ने दाँत भींचे। "पिंकी ठीक है। डरी नहीं। मेरी बहन… उसने मुश्ताक़ को मेरे बारे में बता दिया।"
इरा ने उसका कंधा दबाया। "तो चलो। पर एक बात माननी पड़ेगी।"
"क्या?"
"तुम अकेले नहीं जाओगे।"
रवि कुछ कहता, उससे पहले दुकान के शटर के पास से आवाज़ आई। "ये सही बोल रही है।"
मीरा सिंह दरवाज़े पर खड़ी थी। क़मीज़ के बाहर पुरानी शॉल, हाथ में लकड़ी की मोटी लाठी, चेहरे पर वो ठंडा सब्र जो सिर्फ़ अखाड़े में पलता है।
रवि ने इरा की तरफ़ देखा, फिर मीरा की तरफ़। "तुम यहाँ कैसे…"
"तेरी दुकान से दो गली छोड़कर रहती हूँ, रवि।" मीरा ने लाठी ज़मीन पर टिकाई। "सुबह से तीन आदमी उस ट्रक के पीछे खड़े दिख रहे थे। मैंने तुझे देखा, तेरी बहन को देखा। मुझे पता था तू अकेला भागेगा।"
"मीरा —"
"मैंने देखा है तेरे जैसे भाई-बाप को जाते हुए।" मीरा की आवाज़ सपाट हो गई, जैसे कोई पुराना ज़ख़्म बिना आवाज़ के खुल रहा हो। "मेरे भाई ने भी अकेले जाना चुना था, जिस रात वो ज़मीन के काग़ज़ों पर हस्ताक्षर नहीं कर रहा था। उस रात के बाद मैंने उसका चेहरा नहीं देखा। मैं अब दोबारा वैसा नहीं देखूँगी।"
रवि ने उसे देखा। मीरा की आँखों में वो चीज़ थी जो रवि रोज़ आईने में देखता था।
"तो चलेगी?" उसने पूछा।
"मैं पहले चलूँगी।" मीरा ने लाठी उठाई। "रास्ता बताओ।"
लुट्टन दुकान के पीछे से साइकिल खींचता हुआ निकला। मुँह में पान था, मगर आज उसकी हँसी गुम थी। "यार रवि… भगवान भी मुझे भूल गया है। पर आज मैं तुझे नहीं भूलूँगा।"
"तू रुक, लुट्टन। दुकान —"
"दुकान की —" लुट्टन ने पान थूका। "आज दुकान बंद। मेरी बहन भी है, रवि। मुझे भी लगता है कि किसी दिन यही होगा किसी की बहन के साथ। आज तेरी है तो कल किसी की। चल।"
और फिर चार लोग निकल पड़े।
गोदाम बस स्टैंड के पीछे, पुरानी सब्ज़ी मंडी की तरफ़ था — जहाँ अब कोई सब्ज़ी नहीं आती थी, सिर्फ़ राख और रद्दी आती थी। पीली दीवार, लोहे का बड़ा फाटक, और ऊपर एक टूटी खिड़की जिसके शीशे कब के गिर चुके थे।
रवि ने पीछे की तरफ़ से चक्कर लगाया। धूल में पैरों के निशान थे — ताज़े। दो जोड़ी, फिर तीन। फाटक के पास एक मोटी काली गाड़ी खड़ी थी, जिस पर नंबर प्लेट के ऊपर कपड़ा टँगा था।
मीरा ने आवाज़ दबाई। "तीन लोग अंदर। मुझे दिख रहे हैं।"
लुट्टन पीछे की खिड़की से झाँका। उसकी चप्पल फिसली — "अरे बाप —" उसने खिड़की का किनारा पकड़ा, मगर ईंट चटक कर टूट गई। छन्न!
अंदर एक आदमी पलटा। "कौन?"
रवि ने एक गहरी साँस खींची। जैसे उसने आज तक हर बार खींची थी — पर इस बार साँस अंदर गई, और उसके साथ कुछ और भी अंदर गया। कोई गरम चीज़, सीने से पेट तक, जो उसे ज़मीन से ज़रा और ऊँचा उठा रही थी।
"चढ़ जाओ छत पर। मीरा, तू पीछे के दरवाज़े से। लुट्टन, मेरे साथ।" उसने कहा। इरा ने हाथ पकड़ा। "और मैं?"
"तू —" रवि एक पल रुका। "तू दरवाज़े पर रुक। अगर मैं अंदर फँसा… तो कोई गवाह चाहिए। तेरे बिना कोई सुनने वाला नहीं होगा।"
इरा ने उसकी आँखों में देखा। समझ गई। फ़ोन निकालकर उसने रिकॉर्डिंग चालू की।
रवि छत के किनारे पर खड़ा था। नीचे अंधेरा था, सिर्फ़ टिमटिमाती एक पीली बत्ती। उसने घड़ी सीने से लगाई और कूद गया।
धड़ाम!
उसके पैर पुरानी टीन की चादर पर पड़े, और चादर चरमराती हुई नीचे दब गई। अंधेरे में कोई चीखा। रवि उठा, गोदाम के फ़र्श पर पैर जमाया, और उसकी आँखें अंधेरे से लड़ने लगीं।
तभी उसके कान से एक आवाज़ गुज़री — पतली, दबी, मगर साफ़। पिंकी की आवाज़।
"सुनो। तुम जितना मारोगे, मेरे भैया उतना ज़्यादा उठेंगे। तुम नहीं जानते मेरे भैया को।"
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