Billionaire Empire System79 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 79

7 min read November 7, 2026

रवि के रोंगटे खड़े हो गए। वो मुस्कुराया — आँखों में पानी था, मगर होंठ खुल गए। क़मीज़ की जेब में पिंकी का तीन महीने पुराना हाथ से बना कार्ड था, जिस पर लिखा था "दुनिया के सबसे अच्छे भैया" — उसने उसे छुआ।

और फिर अंधेरे में एक आदमी उसके सामने आकर खड़ा हो गया। ठीक आधा मीटर दूर। उसकी साँस सुनाई दे रही थी। "आ गया?"

रवि रुका।

"साहब ने कहा था — तू आएगा। बोले, 'भैया आएँगे, वो नहीं रुकते'।" आदमी हँसा, और उसके साथ ही दीवार पर लगी बड़ी पीली बत्ती जल उठी।

चटाक! रोशनी ने रवि की आँखों को चौंधिया दिया। वो हाथ आड़ा करके खड़ा रहा, और जब आँखें खुलीं —

सामने, पुराने लोहे के तख़्त पर बैठा था बलवंत राय। सफ़ेद कुर्ता, गले में सोने की चेन। हाथ में चाय का कप नहीं, एक पतला सफ़ेद फ़ीता था — पिंकी का स्कूल का फ़ीता, जो वो अपनी चोटी में बाँधती थी। वो उसे उँगली पर लपेट रहा था, धीरे-धीरे, जैसे कोई घड़ी की चाबी घुमा रहा हो।

बलवंत ने सिर उठाया और मुस्कुराया। उसकी आवाज़ पत्थर जैसी धीमी थी।

"आओ बेटा। बैठो। चाय ठंडी हो रही है।"

॥

मुस्कान बलवंत के चेहरे पर टिकी रही, जैसे किसी ने उसे वहीं चिपका दिया हो। उसने फ़ीता उँगली पर एक और चक्कर दिया, धीरे-धीरे, और रवि के पैर अपने आप जम गए। गोदाम में हवा भारी थी — गीली लकड़ी और पुराने तेल की बदबू, और उसके ऊपर बलवंत के इत्र की मीठी महक।

"बैठो बेटा, खड़े क्यों हो। चाय ठंडी हो रही है।" बलवंत ने सामने रखी लोहे की कुर्सी की तरफ़ इशारा किया, जैसे अपने ही घर में किसी मेहमान को बैठा रहा हो।

रवि हिला नहीं। उसकी नज़र बलवंत की उँगली पर लिपटे सफ़ेद फ़ीते पर थी। वो फ़ीता जिसे उसने सुबह पिंकी की चोटी में बाँधा था — खुद बाँधा था, क्योंकि पिंकी को गाँठ ठीक से नहीं आती थी और हर बार भैया को बुलाती थी।

बलवंत ने उसे देखा और मुस्कुराया। "बेटा, तेरी बहन साफ़-सुथरी लड़की है। पढ़ने में तेज़ है ना? डॉक्टर बनना चाहती है। अच्छा सपना है, बहुत अच्छा सपना।" उसने फ़ीता हवा में उठाया। "सपने पूरे करने के लिए पैसे लगते हैं, बेटा। और पैसा… पैसा वहीं मिलता है, जहाँ दिमाग़ हो। तेरे पास दिमाग़ है, बस ज़िद ज़्यादा है।"

रवि के होंठ सूख रहे थे। उसकी छाती में जो पहले गुस्सा उबल रहा था, वो नीचे उतर गया — ठंडा, गहरा, पत्थर जैसा। उसने एक गहरी साँस ली और आवाज़ इतनी धीमी निकली कि खुद भी चौंका।

"साहब… आपने मेरी बहन को छुआ।"

बलवंत हँसा। ठहाका नहीं, बस गले से एक छोटी आवाज़, जैसे किसी पुरानी कुर्सी की चरमराहट। "छुआ नहीं, बेटा। बुलाया है। शहर में मेरे बहुत से घर हैं, एक में अपनी बेटी रखी है ना — सोचा, अच्छे घर की बिटिया के साथ थोड़ी देर बैठ लूँ। मेहमानी की है। उसे यहाँ कुछ नहीं होगा। मेरे यहाँ मेहमान को कुछ नहीं होता।"

"मेहमान को कुछ नहीं होता," रवि ने दोहराया, और उसकी आवाज़ में कोई ज़ोर नहीं था, बस एक ठंडा सच था। "साहब, मेहमान को आप धमकी देते हैं?"

बलवंत की उँगली रुक गई। एक पल के लिए गोदाम की रोशनी उसके चेहरे से उतर गई, और जो बचा वो सिर्फ़ ठुड्डी का बोझ था। फिर वो फिर मुस्कुराया, पर इस बार मुस्कान में दाँत नहीं थे। "बेटा, तू अभी जवान है। जवानी में लोग बहुत सीधे सवाल पूछते हैं और बहुत सीधे जवाब पाते हैं। तेरे पापा भी थे ऐसे —" उसने एक पल रुककर फ़ीता गोद में रखा — "मुझे उनसे बात करनी होती थी, तो पहले सोचना पड़ता था। कोई आदमी ऐसा हो जिसे डराया न जा सके, तो उसे संभालना पड़ता है। तेरे पापा को मैंने बहुत प्यार से संभाला था।"

रवि के हाथ पसलियों के पास कस गए। पीछे की तरफ़ से अचानक एक हल्की सी आवाज़ आई — चटाक, फिर धड़! एक आदमी कराहा।

बलवंत का सिर उठा। "कौन —"

और तभी गोदाम के पीछे का दरवाज़ा खुला और मीरा सिंह अंदर चली आई। उसके हाथ में कोई हथियार नहीं था, बस उसकी कलाई का लच्छा हुआ था जैसे वो कलाई घुमाकर किसी का हाथ मरोड़ आ रही हो। एक आदमी ज़मीन पर पड़ा था, हाथ पकड़े हुए। दूसरा उसकी तरफ़ लपका, और मीरा का एक ही वाक्य गूँजा —

"पैर जमा!"

वो झुकी, "कमर नीचे!" — और उसकी कोहनी उस आदमी की छाती पर ऐसी पड़ी कि वो पीछे उड़कर डिब्बों पर गिरा। "दोबारा!" वो उसके ऊपर पहुँची और उसका हाथ पीठ के पीछे मरोड़कर छोड़ दिया।

बलवंत की आँखें सिकुड़ीं। "ये क्या नाटक —"

रवि को यही पल चाहिए था। वो बिजली की तरह पलटा और पिंकी की तरफ़ लपका। मुश्ताक़ रास्ते में आड़े आया, दस्ताने पहने हुए, आधे अंधेरे में उसकी काले चश्मे की डिबिया सफ़ेद लग रही थी।

"रुक जा, लड़के —"

रवि ने रुकने का नाम नहीं लिया। उसने मुश्ताक़ का दायाँ हाथ पकड़ा, उस जगह — ठीक जले हुए निशान पर — और उँगलियों से कस दिया।

"आअह!" मुश्ताक़ की चीख गोदाम की छत से टकराई। उसका शरीर पलटा, घुटने झुके। चटाक! रवि ने उसे दीवार से लगा दिया, एक हाथ उसकी छाती पर, दूसरा उसी जले हुए चमड़ी पर।

"तुम…" मुश्ताक़ ने काँपती आवाज़ में कहा।

"मुझे पता है," रवि ने उसके कान के पास कहा, आवाज़ ठंडी, "ये निशान कहाँ से आया। साहब ने जलाया था ना? 'सबक़' के लिए।" उसने ज़ोर और बढ़ाया। मुश्ताक़ की साँस रुक गई। "आज मैं तुम्हें नहीं जलाऊँगा। आज सिर्फ़ इतना कह दूँगा — तेरी बारी भी आएगी। और तब तुम्हें पता होगा कि जलना क्या होता है।"

मुश्ताक़ ने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली।

मीरा ने पीछे से आवाज़ दी, "रवि! बहन!"

रवि ने मुश्ताक़ को छोड़ा — वो दीवार के सहारे सरक कर नीचे बैठ गया, हाथ सीने से चिपकाए। रवि लोहे की कुर्सी तक पहुँचा। पिंकी बँधी बैठी थी, आँखों पर काला कपड़ा, हाथ पीछे रस्सी से बँधे, पर मुँह खुला था और होंठ काँप रहे थे।

"भैया?" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "भैया, तुम हो?"

रवि के हाथ काँप रहे थे — शक्ति के बाद वाला कँपकँपाना, पर इस वक़्त उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था। उसने पट्टी खोली। पिंकी की आँखें खुलीं — बड़ी, लाल, पानी से भरी — और वो एक पल रुकी, जैसे यकीन नहीं हो रहा, फिर फूट-फूटकर रो पड़ी।

"भैया…" वो उसके गले में लिपट गई, अपनी पूरी छोटी ताक़त से। "मैं डरी नहीं थी, भैया। मैं सिर्फ़ माँ के बारे में सोच रही थी। बार-बार सोच रही थी कि माँ ने दवाई ली या नहीं… उसने सुबह नाश्ता किया या नहीं… भैया, माँ ने खाया?"

रवि ने उसे गोद में उठा लिया। वो सोलह साल की थी, पर इस वक़्त उसका वज़न पंद्रह साल की बच्ची जैसा लग रहा था — कितनी हल्की, कितनी छोटी। उसने माथे पर होंठ रखे और कुछ देर आँखें बंद कर लीं। उसकी खुद की आवाज़ भर्रा रही थी। "माँ ठीक है। माँ ने ही कहा था — जा, पिंकी को लेकर आ। माँ तेरा इंतज़ार कर रही है।"

पीछे से बलवंत की आवाज़ आई, अब भी धीमी, अब भी मीठी, जैसे कुछ हुआ ही न हो। "अच्छा है, बेटा। बहन को ले जा।" उसने कुरसी से उठते हुए कुर्ता झाड़ा। "ये तो शुरुआत थी। मैं तो सिर्फ़ तुझे देखना चाहता था — देखना चाहता था कि तेरे अंदर तेरे पापा कितने बचे हैं।" वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा, फिर रुका और बिना पलटे बोला, "मिल गए ना जवाब? तेरे पापा भी ऐसे ही ठंडे पड़ जाते थे, बेटा। जब बहुत गुस्सा आता था, तो आवाज़ और धीमी हो जाती थी।" वो हँसा। "अच्छा लक्षण है।"

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