Billionaire Empire System77 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 77

7 min read November 7, 2026

बच्चे ने अपना हाथ बढ़ाकर इरा की कलाई पकड़ी। इरा ने दूसरा हाथ भी उसके सिर पर रख दिया और धीरे से कहा, पहली बात, बहुत धीमी आवाज़ में, "मैं हूँ ना।"

वो तीन शब्द सुनकर रवि के अंदर कुछ टूटा। उसके पापा जब मरे थे, तब किसी ने उससे ये नहीं कहा था। माँ रो रही थी, माँ को भी कोई चाहिए था जो ये कहे।

वो वहीं खड़ा रहा, हाथ में टॉर्च, और अंदर ही अंदर उसने एक बात ठान ली — इस औरत को अब कभी अकेले नहीं जाने दूँगा। चाहे वो गुस्सा करे, चाहे मुझे छिपाने के लिए डाँटे।

इरा उठी। उसने बच्चे के गाल पर हल्का हाथ फेरा और अंदर जाते हुए किसी बूढ़ी औरत का हाथ पकड़कर उसे बच्चे की तरफ़ इशारा किया। औरत ने सिर हिलाया, बच्चे को गोद में उठाया।

इरा वापस रवि के पास आई और उससे टॉर्च ले लिया। उसके चेहरे पर कुछ नहीं था — ना भावुकता, ना मुझे-देखा-क्या। बस एक थकी हुई सफ़ाई।

"तुमने उससे कुछ क्यों नहीं कहा?" रवि ने पूछा। "कुछ… अच्छी बात?"

इरा ने उसे देखा। "जब मेरे अब्बू मरे, तो लोग बहुत अच्छी बातें बोले। 'वो बहादुर थे, वो अच्छे आदमी थे, भगवान उन्हें अपने पास बुला ले गया।'" उसने टॉर्च आगे की। "किसी ने मेरे सिर पर हाथ नहीं रखा। जब सब चले गए, तब मैं अकेली बैठी थी।" उसने रवि की तरफ़ देखा। "अच्छी बातें भूल जाती हैं। हाथ याद रहता है।"

वो चल दी। रवि एक पल खड़ा रहा, फिर उसके पीछे-पीछे चला।

गली के मोड़ पर इरा ने उसका हाथ पकड़ लिया। रवि चौंका — दिन में इस औरत ने उससे अभी-अभी झगड़ा किया था।

"रवि।" उसने कहा। आवाज़ थोड़ी काँप रही थी, पर आँखें सीधी थीं। "अब आगे हम दोनों साथ जाएँगे। और कोई अकेले नहीं। तुम्हारा जो भी मिशन है, मैं उसका हिस्सा नहीं — मैं उसकी साथी हूँ। समझे?"

रवि ने उसका हाथ देखा — छोटा हाथ, गरम, उँगलियों में थोड़ी स्याही लगी थी, जैसे अभी कुछ लिखा हो।

"समझ गया।" उसने कहा।

इरा ने हाथ छोड़ा और आगे बढ़ गई। पर उसके चेहरे पर वो मुस्कान आई जो वो जान-बूझकर छिपाती थी।

दोनों गली में घुसे, तो सुबह की पहली किरण छतों पर पड़ चुकी थी। रवि की दुकान का शटर अब भी बंद था, काग़ज़ वहीं चिपका था। पर वो अब उसकी तरफ़ नहीं देखता रहा।

घर का दरवाज़ा खुला था। हमेशा ऐसा ही होता था — माँ सुबह जल्दी उठकर बाहर झाड़ू लगाती थी। पर आज झाड़ू बाहर पड़ी थी, और गली में कोई नहीं था।

रवि के कदम रुक गए। दरवाज़े के बाहर पिंकी का स्कूल बैग पड़ा था — एक पट्टा टूटा हुआ, बगल में उसकी चप्पल उलटी पड़ी थी। हमेशा जोड़ी में रहने वाली चप्पल।

"इरा…" रवि की आवाज़ फट गई।

वो अंदर दौड़ा। माँ खाट पर बैठी थी। हाथ में फ़ोन, आँखें ऐसी जैसे कोई सपना देख रही हो और उससे उठना नहीं चाहती। रसोई से दाल की गंध आ रही थी — माँ आज दुकान से पहले खाना बना रही थीं। खाना ठीक वहीं रखा था, चूल्हे पर, और नीचे की आँच बुझ चुकी थी।

"माँ?" रवि ने उसके पास बैठकर उसका कंधा पकड़ा। "माँ, पिंकी कहाँ है?"

सीता देवी ने उसकी तरफ़ देखा। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। उन्होंने फ़ोन उसकी तरफ़ बढ़ाया — काँपते हाथ, जैसे वो कोई ज़िंदा छिपकली पकड़ रही हों।

"फ़ोन आया था।" उन्होंने कहा। आवाज़ एक बंद कमरे से आ रही थी। "आधे घंटे पहले। किसी ने कहा — 'बेटी स्कूल से सीधे घर आ जाए। बाहर मत भेजो। हिसाब बराबर करना है।'" उन्होंने रवि का हाथ पकड़ लिया, उँगलियाँ हड्डी जैसी सख़्त। "मैंने पिंकी को स्कूल भेज दिया था। रोज़ की तरह। वो अभी तक नहीं लौटी।"

रवि ने फ़ोन लिया। स्क्रीन पर पिंकी का आख़िरी मैसेज था — "भैया, दोपहर की छुट्टी में घर आ रही हूँ।"

भेजा गया — सुबह के नौ बजकर दस मिनट पर। घड़ी देखी। अब ग्यारह बज रहे थे।

क़ासिम भाई की आख़िरी बात उसके कान में गूँजी — "कल से तेरी असली परीक्षा शुरू होती है।"

रवि ने पिंकी का नंबर मिलाया। घंटी बजती रही। निकालें। फिर मिलाया। इस बार फ़ोन बंद।

धड़… धड़… धड़… उसका दिल उसके सीने में नहीं, गले में धड़क रहा था।

इरा दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने बैग और चप्पल देखी, फिर रवि का चेहरा। "कितना वक़्त हुआ?"

"दो घंटे।" रवि ने कहा। आवाज़ ऐसी जैसे किसी और की हो।

इरा ने अपना फ़ोन निकाला और सीधे कोमल का नंबर मिलाया, पर रवि उसे सुन नहीं रहा था। वो टूटी घड़ी निकाल रहा था, हाथ काँप रहे थे, और माँ उसके पीछे खाट पर बैठी थी — एक हाथ मुँह पर, दूसरा रामायण की किताब पर, जैसे भगवान से सीधी बात कर रही हो।

घड़ी की सुइयाँ जगह पर टिकी थीं। पर उसके अंदर एक हल्की सी हलचल हुई, जैसे कोई जाग रहा हो।

रवि ने घड़ी को होंठों तक लाकर फुसफुसाया, "पिंकी को ढूँढना है। मुझे कुछ दो।"

और घड़ी ने जवाब दिया, इतनी धीमी आवाज़ में कि सिर्फ़ वो सुन सका — "अब सिर्फ़ सच बचा है।"

रवि ने मुट्ठी भींची। आँगन में खड़ी इरा ने उसे देखा — उसके चेहरे से आँसू कब के सूख चुके थे, बचा था सिर्फ़ एक ठंडा, साफ़, भयानक सब्र।

"इरा।" उसने कहा। "तुमने कहा था, दोनों साथ चलेंगे।"

इरा ने फ़ोन जेब में रखा। "कहा था।"

"तो अब चलो। पहले मुश्ताक़ के आदमियों को ढूँढते हैं।" रवि ने कुर्ते का पल्ला ठीक किया, माचिस की डिब्बी जेब में दबाई, और घड़ी सीने से लगाई। "पिंकी अकेली नहीं है। और जो भी उसे छूएगा…" उसकी आवाज़ धीमी हो गई, वैसी धीमी जिसमें उसकी बहन की हँसी भी थी और पापा की चुप्पी भी।

माँ ने पीछे से कहा, "रवि…"

रवि पलटा।

सीता देवी उठ चुकी थी। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, आँखों का पानी पोंछा, और तस्वीर के आगे जाकर दीया जलाया — सुबह का दीया, जो रोज़ जलता था और आज एक भी नहीं जला था।

"जा।" उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में लोहा था। "पिंकी को लेकर आ।"

और तभी फ़ोन बजा — नया नंबर, अनजान। रवि ने उठाया।

दूसरी तरफ़ से एक मीठी, ठंडी आवाज़ आई। "रवि प्रसाद? मैं मुश्ताक़ को कह रहा हूँ, बच्ची से मत डराओ — इन्होंने तो आज सुबह का खाना भी नहीं खाया।" एक हल्की हँसी। "बेटा, सुबह का चाय का वक़्त हो गया। चलो, आओ। सामने वाला ट्रक तुम्हारे इंतज़ार में खड़ा है।"

फ़ोन कट गया।

रवि ने घड़ी को मुट्ठी से दबाया और दरवाज़े से बाहर देखा। गली के मोड़ पर, सुबह की उजली धूप में, एक ट्रक खड़ा था — पीछे का दरवाज़ा खुला, और उसके अंधेरे में कुछ सफ़ेद चमक रहा था, एक पतली नीली रिबन।

इरा ने उसका हाथ पकड़ा। "मैं साथ हूँ।"

रवि ने एक गहरी साँस ली — वो साँस जो वो हर बात से पहले लेता था, खुद को संभालने की आदत। पर इस बार साँस अंदर नहीं गई। बस रुक गई।

"चलो।" उसने कहा।

॥

गली के मोड़ पर पहुँचते-पहुँचते ट्रक का पिछला दरवाज़ा बंद हो गया। धड़ाम! रवि दौड़ा, इरा उसके पीछे। मगर इंजन पहले ही गरज उठा था। पहिए धूल उड़ाते निकल गए, और जो बचा वो था — सड़क पर पड़ी पीली धूल में एक टूटा सफ़ेद फ़ीता, और उसके नीचे एक छोटी पर्ची।

रवि ने पर्ची उठाई। उस पर सिर्फ़ चार शब्द लिखे थे — "शाम छह बजे, गोदाम।"

इरा ने पर्ची पढ़ी और आसपास देखा। गली खाली थी। दूर एक बुढ़िया दरवाज़े में खड़ी थी, पर उसने भी आँखें फेर लीं। डर इलाक़े में सबसे तेज़ चीज़ थी, और आज वो सबकी आँखों में दिख रहा था।

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