Billionaire Empire System76 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 76

7 min read November 7, 2026

"इरा —"

"मैं तुमसे कुछ नहीं पूछ रही।" उसने काट दिया, पर आवाज़ कड़वी नहीं थी। "बस… जब सच पता चले, तो मुझे सबसे पहले बताना। मैं आख़िरी में नहीं सुनना चाहती। मैंने एक बार आख़िरी में सुना था — पापा की मौत की खबर। दोबारा नहीं।"

वो पलटी और अंधेरे में चली गई। उसके कदमों की आवाज़ दूर होती गई, फिर पूरी तरह ख़त्म। रवि हाथ में माचिस की डिब्बी लिए खड़ा रहा। उसका अंगूठा उस फूल पर फिर रहा था जो किसी बच्चे ने बनाया था।

वो झोपड़ी की तरफ़ मुड़ा। दरवाज़े पर क़ासिम भाई खड़े थे, चादर ओढ़े, दीया हाथ में।

"सुन लिया सब?" रवि ने कहा।

"बूढ़े के कान तेज़ होते हैं।" क़ासिम भाई ने कहा। फिर उन्होंने माचिस की डिब्बी की तरफ़ देखा और उनका चेहरा कठोर हो गया। "इसे संभालकर रख। और सुन — कल सुबह पहला काम। शमशेर के आदमी शहर में घूम रहे हैं। तुझे उनसे कुछ उठाना है। ख़तरनाक है। पर अगर तू अपने पापा का बेटा है, तो करेगा।"

रवि ने माचिस की डिब्बी जेब में रखी, ठीक उस घड़ी के ऊपर जो उसके सीने से लगी थी। दो चीज़ें, दो मरे हुए बाप, और एक ही सच।

"करूँगा।" उसने कहा।

क़ासिम भाई ने दीया बुझा दिया। अंधेरे में सिर्फ़ उनकी आवाज़ बची।

"तो सुन, बेटा। कल से तेरी असली परीक्षा शुरू होती है। और अगर तू इसमें फँसा, तो जान ले — तेरे पापा की आवाज़ वाली बही हमेशा के लिए चुप हो जाएगी।"

॥

दीये की लौ बुझी और चारों तरफ़ अंधेरा उतर आया, पर क़ासिम भाई की आख़िरी बात अंधेरे में भी जलती रही — "तेरे पापा की आवाज़ वाली बही हमेशा के लिए चुप हो जाएगी।"

रवि ने कुर्ते की जेब पर हाथ रखा। नीचे माचिस की डिब्बी थी, ऊपर सीने से चिपकी टूटी घड़ी। दो चीज़ें, दो मरे हुए बाप, और बीच में वो खड़ा — कुछ भी नहीं बचा था जिसे वो दाँव पर न लगा सके।

वो झोपड़ी से बाहर निकला, ठंडी हवा चेहरे पर लगी। श्मशान की तरफ़ से जलती लकड़ी की गंध आ रही थी, दूर कहीं कोई रो रहा था। और उसी वक़्त उसे पेड़ के नीचे रोशनी दिखी।

इरा खड़ी थी। हाथ में छोटी टॉर्च, जिसकी पीली रोशनी ज़मीन पर काँप रही थी। उसके चेहरे पर वो ठंडा गुस्सा था जो बात करने से पहले ही सब कह देता है।

"तुम यहाँ?" रवि ने कहा, और खुद ही अपनी आवाज़ में वो झूठ सुन लिया जो उसने अभी-अभी बोला था।

"मुझे मत बताओ कि मैं यहाँ नहीं हूँ।" इरा ने कहा। उसने टॉर्च नीचे की और आगे आई। "तुम मुझे बताए बिना अकेले आ गए। रात में। श्मशान के पीछे। एक ऐसे आदमी के पास जिसके बारे में तुम खुद कुछ नहीं जानते।"

"मुझे देर हो रही थी —"

"मत बोलो।" उसने काट दिया। फिर उसने एक गहरी साँस ली और आवाज़ नीची की, पर तीखी ही रखी। "रवि, मैं तुम्हारी सहकर्मी नहीं हूँ कि तुम मुझे छिपाओ। मैं रिपोर्टर हूँ। सच मेरा काम है। और सच तुम्हारी जेब में नहीं, उस बूढ़े की झोपड़ी में है — जहाँ तुम मुझे ले जाने से डर रहे हो।"

रवि ने कुछ कहना चाहा, पर पीछे झोपड़ी का दरवाज़ा फिर खुला। क़ासिम भाई चादर ओढ़े बाहर आए, दीया अब भी हाथ में, बुझा हुआ। उन्होंने टॉर्च की रोशनी में इरा को देखा और उनके कदम रुक गए।

एक पल के लिए कुछ नहीं हुआ। फिर क़ासिम भाई ने दीया नीचे रखा और धीरे से बोले, "ये… ये इरा है? सलाम ख़ान की बेटी?"

इरा की टॉर्च हिल गई।

"आप… आप मेरे अब्बू को जानते हैं?" उसकी आवाज़ से पूरा गुस्सा उतर गया। बचा सिर्फ़ एक छोटी लड़की का घबराया सवाल।

क़ासिम भाई ने चादर कस ली और उन्होंने आँखें नीची कर लीं, जैसे कुछ पुराना बोझ उठाना पड़ रहा हो। "जानता हूँ? बेटी, तेरे अब्बू मेरे साथ हिसाब लिखते थे। सेवा सदन के रजिस्टर में उनकी लिखाई ऐसी थी कि कोई मिलाए नहीं।" उन्होंने रुककर साँस ली। "और एक बार… एक बार उन्होंने मुझे बचाया था।"

"कैसे?" इरा ने आगे कदम रखा।

क़ासिम भाई ने रवि की तरफ़ देखा, फिर इरा की तरफ़। श्मशान की तरफ़ से हवा चली और दीये की राख उड़ा ले गई। "उस रात मुझे पता चल गया था कि ट्रस्ट का पैसा कहाँ जा रहा है। मैंने तेरे अब्बू से कहा कि भाग चलो, सब बता देंगे। तेरे अब्बू ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा — 'क़ासिम, तू भाग, अगर तू बचेगा तो काग़ज़ बचेंगे। मैं नहीं भागूँगा, मेरे कागज़ मेरे घर में हैं।'"

इरा टॉर्च पकड़े खड़ी रही। उसके होंठ काँप रहे थे।

"तो आप भाग गए।" उसने कहा। आवाज़ में इल्ज़ाम नहीं था, बस सच जानने की थकान थी। "और मेरे अब्बू… मेरे अब्बू क्यों नहीं भागे?"

क़ासिम भाई ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने बस अपना चश्मा उतारा, उसे चादर से पोंछा, और फिर वापस पहन लिया। यही उनका जवाब था — इरा के अब्बू नहीं भागे क्योंकि उनके पास कागज़ थे, और जिसके पास कागज़ होता है, उसे मारा जाता है, भगाया नहीं जाता।

"मुझे माफ़ कर दे बेटी।" क़ासिम भाई ने आख़िर में कहा। "मैं उस रात भागा था। दस साल से भाग रहा हूँ। इस झोपड़ी में।"

इरा ने उनकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। उसने पलटकर रवि को देखा — एक लंबी, थकी नज़र, जिसमें गुस्सा नहीं था, बस ये सवाल कि अब क्या।

"चलो।" उसने बस इतना कहा।

श्मशान का रास्ता छोटा था, पर उस रात लंबा लगा। दोनों चुप चले जा रहे थे। इरा की टॉर्च की रोशनी सड़क पर उछलती रही। रवि को लगा कि उसे कुछ कहना चाहिए — कोई सफ़ाई, कोई बहाना। पर जो कहना था, वो बहाना नहीं होता।

"माफ़ करना।" उसने आख़िर में कहा। "अकेले आने के लिए।"

इरा ने कदम रोके नहीं। "रवि, मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ कि तुमने मुझे नहीं बताया। मैं नाराज़ हूँ कि तुमने खुद को अकेला रखा।" उसने पलटकर देखा। "तुम्हारे पापा भी ऐसे ही अकेले गए थे। और मेरे अब्बू भी। दोनों ने सोचा कि अकेले लड़ेंगे, तो कोई और नहीं मरेगा। और दोनों —"

वो वाक्य पूरा नहीं कर पाई। उसकी आवाज़ रुक गई, और उसने अपनी आस्तीन से आँखें पोंछीं, बहुत तेज़, जैसे कोई गलती छिपा रही हो।

रवि उसके पास आया। उसने कुछ कहा नहीं, क्योंकि कहने के लिए कुछ सही नहीं था। तभी सामने से किसी के रोने की आवाज़ आई।

श्मशान के बाहर लोहे के फाटक के पास एक बच्चा बैठा था। छह-सात साल का। मैला कुर्ता, नंगे पैर, गोद में एक फटा हुआ खिलौना। अंदर से लकड़ी जलने की गंध आ रही थी और दूर कुछ लोग मंत्र बोल रहे थे। बच्चा अपने घुटनों में मुँह घुसाए, धीरे-धीरे रो रहा था — ना ज़ोर से, ना रुक-रुक कर। बस बहता हुआ, जैसे दिन भर का रोना अब आदत बन गया हो।

रवि रुक गया। ऐसे वक़्त में क्या कहते हैं, उसे कभी पता नहीं चला था। उसके अपने पापा मरे थे तो लोग उसके सिर पर हाथ रखते थे और वो और ज़ोर से रोता था।

पर इरा आगे बढ़ गई। उसने टॉर्च रवि को पकड़ाई और बच्चे के पास जाकर बैठ गई — बिना कुछ बोले, बिना पूछे। उसने धीरे से अपना हाथ उसके सिर पर रखा और वहीं बैठी रही।

बच्चा पहले तो सिकुड़ गया, फिर धीरे-धीरे उसका रोना हल्का हुआ। इरा कुछ नहीं बोली। कोई सांत्वना नहीं, कोई "डरो मत, भगवान साथ है" नहीं। बस हाथ सिर पर रखा रहा।

रवि दूर से खड़ा देखता रहा। उसने इरा को दिन में कई बार देखा था — चैनल के बाहर धरने पर बैठी, माइक थामे किसी बिल्डर के दरवाज़े पर सवाल दागती हुई, मुश्ताक़ के आदमी के सामने आँखें न झुकाती हुई। ये सब देखा था। पर ये औरत… ये औरत जो अभी-अभी रोई थी और फिर ऐसे बैठ गई जैसे उसका पूरा काम यही हो।

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