Billionaire Empire System75 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 75

7 min read November 7, 2026

"आपके… आपके बेटे का नाम?"

"क्या फ़र्क पड़ता है, बेटा।" क़ासिम भाई ने कहा। "नाम याद रखने से लौटता नहीं कोई।"

वो चुप हो गए। कमरे में दीये की लौ फुसफुसा रही थी, जैसे बात करना चाहती हो, पर डरती हो। बाहर हवा में कुछ सूखा सा खड़खड़ाया — हो सकता है सियार हो, हो सकता है कुछ और।

तभी दीये की लौ ज़ोर से काँपी। तेल ख़त्म हो रहा था। लौ इतनी छोटी हो गई कि ऐसा लगा अभी अंधेरा उस पर झपटेगा। रवि ने हाथ बढ़ाया कि उसे बचाएं।

क़ासिम भाई ने उससे पहले ही हाथ बढ़ाकर लौ को अपनी झुर्रियों वाली हथेली में ढक लिया। जैसे किसी भीगी चिड़िया को छत मिल गई हो।

रवि ने देखा कि उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

"मुझे यहाँ कोई नहीं ढूँढता।" क़ासिम भाई ने कहा, आँखें लौ पर टिकी हुईं। "क्योंकि सबको लगता है कि मैं मर चुका हूँ।" उन्होंने लौ को दीये पर वापस टिकाया, और धीमे से कहा, जैसे खुद से बोल रहे हों — "और मैं खुद भी कभी-कभी यही सोचता हूँ।"

रवि को लगा कि इस कमरे में सबसे बड़ी चीज़ यह छोटी सी लौ है। और इस झोपड़ी में सबसे अंधेरा कोना भी यही है, जहाँ यह बूढ़ा आदमी दस साल से बैठा है और अपने बेटे के लिए कुछ नहीं कर पाया।

वो कुछ बोलता, तो क़ासिम भाई ने उससे पहले ही कह दिया, "मत कहना। मुझे मालूम है तेरे मन में क्या है। ज़रूर सोच रहा होगा — 'ये बूढ़ा दस साल से क्यों बैठा रहा?'"

रवि ने सिर नीचे कर लिया।

"डर के मारे, बेटा।" क़ासिम भाई ने कहा। "डर के मारे। जब तेरा कोई न बचे, तो हिम्मत किसी और के लिए जुटाना पड़ती है। और मुझे कोई और नहीं मिला। अब तू आया है।" उन्होंने रवि की तरफ़ देखा। "तू भी शायद कोई और ही निकलेगा।"

रवि ने कहा, "मुझे अपने पापा की मौत का सच चाहिए। और जो-जो ग़रीबों का छीना गया है —" उसकी आवाज़ यहाँ रुक गई, गला भर आया था। "— वो वापस।"

क़ासिम भाई कुछ देर चुप बैठे रहे। फिर उन्होंने कहा, "अपना हाथ दिखा।"

रवि ने हाथ आगे किया। क़ासिम भाई ने उसे पलटकर देखा — चाय के धब्बे, उँगलियों की गाँठें, और एक पुराना जला हुआ निशान जो रवि को खुद भी याद नहीं था कब आया।

"तेरे पापा के हाथ पर भी यहीं निशान था।" क़ासिम भाई ने कहा। "मैंने सुना था, जब तू छोटा था, तब केतली गिर गई थी और उन्होंने अपना हाथ आगे कर दिया था — ताकि तेरे ऊपर गरम पानी न गिरे।" उन्होंने रवि का हाथ छोड़ दिया। "तो ये निशान तेरे साथ उन्होंने ही भेजा है। मरने के बाद भी वो तुझे ढक रहे हैं।"

रवि की आँखें भर आईं। उसने तेज़ी से पलकें झपकीं, पर पानी रुका नहीं। उसने मुँह फेर लिया।

"रो ले।" क़ासिम भाई ने कहा, बिलकुल सपाट आवाज़ में। "यहाँ कोई नहीं देखता। और जिसके पापा ऐसे हों, वो रोएगा नहीं तो करेगा क्या? मैं तो रो भी नहीं सकता — दस साल से आँसू सूख गए हैं।"

रवि हँसा और रोया, दोनों एक साथ, जो शायद बहुत बुरा लगता है जब तक कोई और न हो कमरे में।

कुछ देर बाद क़ासिम भाई ने कहा, "अब तेरे सवाल बाक़ी हैं, और मेरी एक शर्त भी।"

"क्या शर्त?"

"मैं तुझे अभी वो नहीं दे सकता जो मेरे पास है।" क़ासिम भाई ने कहा। "तू पहले साबित कर कि तू अपने पापा का बेटा है।"

"कैसे?"

"साबित करता है कि तू सच के लिए कमर कस सकता है। पाँच दिन। जो मैं कहूँ, वो कर। और पाँचवें दिन, अगर तू डगमगाया नहीं, तो वो चीज़ तेरी।"

रवि ने पूछा, "वो चीज़ क्या है?"

ज़रा देर के लिए, क़ासिम भाई के चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो किसी और वक़्त होता तो शायद मुस्कान होती।

"एक बही है।" उन्होंने कहा। "जिसमें तुम्हारे पापा की आवाज़ है।"

रवि उठ खड़ा हुआ।

क़ासिम भाई ने जल्दी से कहा, "आज नहीं। अपनी शर्त पूरी कर। अब जा। और सुन —"

रवि दरवाज़े पर रुका।

"जब तक मैं खुद बुलाऊँ, तब तक उस बही का ज़िक्र किसी से मत करना। इरा से भी नहीं।" उन्होंने दीये की लौ की तरफ़ देखा। "उस लड़की के पापा की भी एक आवाज़ इसी बही में बंद है। उसकी बेटी को डरने का पूरा हक़ है, पर अभी वक़्त नहीं आया।"

रवि ने सिर हिलाया। फिर कुछ याद आया और वो रुका।

"क़ासिम भाई… मुझे एक बात समझ नहीं आई।"

"पूछ।"

"जब शमशेर आज रात यहाँ आया, तब आपने कहा था — 'देर हो गई, बच्चे।' किसकी देर? उसकी, या मेरी?"

क़ासिम भाई ने कोई जवाब नहीं दिया। सिर्फ़ अपने बूढ़े हाथ उठाकर दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया, यानी जाओ। पर जब रवि दरवाज़े की साँकल पर हाथ रख ही रहा था, तब पीछे से आवाज़ आई, बहुत धीमी, बहुत थकी।

"देर मेरी हो गई थी, बेटा। मुझे चाहिए था कि मैं दस साल पहले किसी की ओर देखता — किसी भी तरफ़ जो तेरे जैसा दिखता हो। पर मैंने नहीं देखा। जानता है क्यों? क्योंकि मुझे लगता रहा कि मैं अकेला बचा हूँ।"

रवि ने पलटकर देखा।

"अब मालूम हुआ कि अकेला नहीं हूँ।" क़ासिम भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा बदला जो बीस साल से बंद था। "अब जा। सुबह आना। अपने साथ लुट्टन को लाना — वो मूर्ख दिखता है, पर उसके कान तेज़ हैं। और हाँ," वो रुके, "उस लड़की का खयाल रखना। उसके अब्बू ने मेरी जान बचाई थी, चाहे इसके बदले में उसने अपनी जान गँवाई हो।"

रवि बाहर निकला। श्मशान की हवा चेहरे पर लगी — ठंडी, राख और दूर कहीं से गुड़ की मिठास लिए हुए।

और वहीं, पीपल के पेड़ के नीचे, एक टॉर्च की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी।

इरा खड़ी थी।

टॉर्च की रोशनी आँखों में चुभी। रवि ने हाथ आगे करके आँखें ढकीं और इरा ने तुरंत टॉर्च नीचे कर दी, जैसे शर्मिंदा हो।

"तुम यहाँ?" रवि ने कहा। आवाज़ में गुस्सा आ गया था, और उससे ज़्यादा डर।

"मैं तुम्हारे पीछे-पीछे आई थी।" इरा ने कहा। उसके होंठ सूखे थे, आवाज़ में वो झिझक नहीं थी जो दिन में थी। "तुम्हें नहीं लगा कि रात में अकेले श्मशान जाना ठीक नहीं? तुम्हारे पापा भी ऐसे ही गए थे। किसी को बताए बिना।"

रवि कुछ कहता, उससे पहले इरा ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया — वही हाथ जिस पर जला हुआ निशान था। उसने धीरे से उँगली उस निशान पर रखी, जैसे कोई पुरानी चीज़ छू रही हो।

"मेरे अब्बू के हाथ पर भी था।" उसने कहा, बहुत धीमी आवाज़ में। "मैं छोटी थी, पर याद है। उन्होंने कभी नहीं बताया कहाँ से आया।"

दोनों चुप खड़े रहे। पीछे झोपड़ी से क़ासिम भाई का खाँसना आया, फिर दीये की लौ की फरफराहट।

इरा ने हाथ छोड़ा और पीछे हट गई, जैसे याद आया कि वो क्या कर रही थी।

"क़ासिम भाई ने तुम्हें कुछ दिया?" उसने पूछा।

"नहीं।" रवि ने कहा। और क़ासिम की बात याद आई — इरा से भी नहीं। उसने आँखें नीची कर लीं। "सिर्फ़ पाँच दिन का काम।"

"कैसा काम?"

"पता नहीं।" रवि ने सच कहा। "सुबह बताएँगे।"

इरा ने उसे देखा, बहुत देर तक। उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो पूछना चाहती थी और नहीं पूछ रही थी। फिर उसने अपनी जेब से एक छोटी सी चीज़ निकाली — एक माचिस की डिब्बी, जिस पर कोई बच्चे के हाथ से फूल बना हुआ था, अब धुँधला पड़ा।

"ये मेरे अब्बू की थी।" उसने कहा। "जब वो निकलते थे, तो जेब में रखते थे। आज सुबह मुझे माँ की पुरानी संदूक में मिली।" उसने रवि के हाथ में रख दी। "तुम रखो। रात में तुम्हारे काम आएगी।"

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