Billionaire Empire System72 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 72

7 min read November 7, 2026

रवि की नींद एक झटके में काफ़ूर हो गई। वो उठकर बैठ गया और घड़ी को दोनों हाथों में उठा लिया।

"क़ासिम?" उसने कहा, आवाज़ फटी हुई थी। "तुमने आज तक कभी किसी का नाम नहीं लिया। मिशन में नाम क्यों? और क़ासिम भाई तो… वो तो झोपड़ी में ही हैं। उन्हें खोजना क्या है?"

घड़ी चुप रही। बस काँटों के नीचे एक छोटी-सी लाल बिंदी जली, फिर बुझ गई।

रवि ने कुर्ता पहना और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। रास्ते में माँ की आवाज़ आई, "इतनी सुबह कहाँ?" उसने पलटकर कहा, "दादी कम्मो से कुछ पूछना है।" माँ ने कुछ सोचा, फिर बोली, "उनका मुँह नहीं लगना, बेटा। वो बात को बात में उलझा देती हैं।" रवि ने सिर हिलाया और निकल गया।

दादी कम्मो का आँगन सुबह की धूप में पीला पड़ रहा था। वो चारपाई पर बैठी पान चबा रही थीं, सामने ताँबे का पुराना तसला रखा था जिसमें भीगे कपड़े पड़े थे। रवि ने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा, "दादी, दो मिनट की बात है।"

दादी ने पान चबाना जारी रखा और बोलीं, "अरे रे रे… सुबह-सुबह? तू तो वो लड़का है जो दुकान खुली रखकर भी बंद रहता है। बैठ।"

रवि बैठ गया। एक पल सोचा, फिर सीधे बोला, "श्मशान के पीछे वाली झोपड़ी। वहाँ कौन रहता है?"

दादी का जबड़ा रुक गया। पान का रस उनके होंठ के कोने पर जम गया। उन्होंने तसले में हाथ डालकर कपड़ा उठाया, निचोड़ा, फिर रख दिया — जैसे उस कपड़े में ही जवाब छिपा हो।

"क्यों?" उन्होंने पूछा, आवाज़ पहले से धीमी। "किसने भेजा तुझे?"

"किसी ने नहीं भेजा, दादी। मुझे जाना है।"

"तो मत जा।" उन्होंने कपड़ा फिर उठाया, फिर निचोड़ा। "वहाँ एक बूढ़ा रहता है। किसी से बोलता नहीं। दिन में एक बार पानी लेने निकलता है, और वो भी ऐसे जैसे कोई परछाई चल रही हो। उसे देखकर बच्चे रो पड़ते हैं, रवि। बच्चे!"

रवि ने झुककर उनके हाथ पर हाथ रखा। "दादी, मुझे जाना है। उस बूढ़े ने मेरे पापा को जाना है।"

दादी कम्मो ने उसकी तरफ़ देखा। बहुत देर तक देखा। फिर उन्होंने पान थूक दिया तसले के पास, और आवाज़ ऐसी निकली जैसे किसी बंद कमरे का दरवाज़ा खुला हो, "तेरे पापा को तो सारा शहर जानता था, बेटा। पर उस बूढ़े ने तेरे पापा को तब जाना था जब ये शहर उन्हें नहीं जानता था।"

वो उठकर खड़ी हो गईं, छड़ी टेकी, और धीरे से बोलीं, "जब जाए, तो कहियो — कम्मो ने भेजा है।" वो रुकीं। "और रवि… वो तुझे अंदर नहीं बुलाएगा। तू खुद ज़िद करियो। उस बूढ़े की ज़िद के आगे सबकी ज़िद छोटी है।"

शाम को रवि ने दुकान लुट्टन को सौंपी। लुट्टन ने पहले तो मुँह बनाया, फिर पूछा, "इस वक़्त कहाँ?" रवि ने कहा, "किसी से मिलने।" लुट्टन ने पान चबाया और बोला, "यार, तेरे 'किसी से मिलने' में अब मेरी जान निकलती है। भगवान भी मुझे भूल गया है।" पर उसने चाबी ले ली और शटर के पास खड़ा हो गया।

रास्ता पतला था, पक्की सड़क से उतरकर मिट्टी और टूटे पत्थरों पर। दोनों तरफ़ कुछ घर थे जिनके दरवाज़े बंद थे — जैसे इस रास्ते के लोग घरों में ही सिमट गए हों। हवा में धुआँ था, और उसके नीचे एक गंध — जली लकड़ी, और कुछ मीठा-सा।

जैसे-जैसे वो आगे बढ़ा, आवाज़ें खत्म होती गईं। श्मशान की दीवार आई, ऊँची, जगह-जगह से टूटी। दीवार के ऊपर से चिता का धुआँ उठता दिख रहा था, जो आसमान में जाकर मिल जाता था। रवि रुका। उसे लगा कि ज़मीन के नीचे से कोई रो रहा है — बहुत धीमी, दबी हुई आवाज़। फिर समझ आया कि वो रोना नहीं, हवा थी जो दीवारों के बीच फँसकर सिसक रही थी।

वो दीवार के साथ-साथ चला। पीछे की तरफ़ एक टूटी झोपड़ी थी — टिन का छज्जा, जगह-जगह से उखड़ा, और दरवाज़ा जो बाहर से लकड़ी के एक टुकड़े से टेका हुआ था। दरवाज़े के सामने ज़मीन पर एक जोड़ी चप्पल रखी थी — बहुत पुरानी, तली घिसी हुई।

रवि ने धीरे से दरवाज़ा खटखटाया। कोई जवाब नहीं।

फिर खटखटाया, थोड़ा ज़ोर से। अंदर से सिर्फ़ मोमबत्ती की लौ का काँपना सुनाई दिया — जैसे किसी ने भीतर साँस रोक ली हो।

"क़ासिम भाई?" रवि ने कहा, आवाज़ सिर्फ़ दरवाज़े तक पहुँची। "मैं रवि हूँ। रघु प्रसाद का बेटा। दादी कम्मो ने भेजा है।"

अंदर एक खड़खड़ाहट हुई — कुछ गिरा। फिर एक लंबी चुप्पी। फिर पैरों की आहट, धीमी, खींचती हुई, और दरवाज़े के नीचे से रोशनी की एक पतली लकीर दिखाई दी।

दरवाज़ा खुला। सामने एक बूढ़ा खड़ा था, कमरे के अंधेरे में लिपटा, सिर पर गंदा सफ़ेद कपड़ा लिपटा हुआ था। बस मोमबत्ती की लौ इतनी थी कि उसके हाथ दिखें, और हाथ थे — झुर्रियों से भरे, पर सीधे और स्थिर।

"तू झूठ बोल रहा है," बूढ़े की आवाज़ आई — सूखी, पर साफ़। "दादी कम्मो किसी को यहाँ नहीं भेजती।"

"तो फिर मैं अकेला ही आया, क़ासिम भाई," रवि ने कहा। "मुझे अंदर आने दीजिए।"

बूढ़ा एक पल रुका। फिर एक तरफ़ हट गया — इतना कि रवि को निकलने की जगह मिल जाए, और इतना कम कि मानो वो पूरी तरह मना भी कर रहा हो।

रवि अंदर गया। छत से टपकन की आवाज़ आ रही थी, फ़र्श पर पानी इकट्ठा था। एक तरफ़ टूटी चारपाई पर चटाई बिछी थी, दूसरी तरफ़ तीन पत्थरों पर एक केतली रखी थी जिससे धुआँ नहीं, बस कालिख उठ रही थी। दीवार पर एक पुरानी तस्वीर टँगी थी — धुँधली-सी, पर रवि ने पहचान लिया कि वहाँ कोई सफ़ेद कपड़ों वाला आदमी खड़ा था।

बूढ़ा मोमबत्ती के पास लौटकर बैठ गया और उसने अपना मुँह पहले जैसे ही कपड़े से ढक लिया। बस आँखें दिख रही थीं — दो काली खिड़कियाँ जिनमें लौ की परछाई काँप रही थी।

"बोल," बूढ़े ने कहा। "क्या चाहिए?"

रवि ने जेब से घड़ी निकाली — नहीं, उसने हाथ रोक लिया। पहले उसने कहा, "क़ासिम भाई, मेरे पापा रघु प्रसाद। आप उन्हें जानते हैं?"

बूढ़े की आँखें हिलीं। एक पल के लिए कपड़े के नीचे से साँस की आवाज़ तेज़ हुई, फिर सब शांत हो गया। "जानता हूँ? नहीं।" वो रुका। "जानता था। पहले। उस दुनिया में, जो अब नहीं है।"

"वो दुनिया कौन-सी थी?"

"कहानियाँ सुनने आया है?" बूढ़े की आवाज़ में झल्लाहट आई। "जा, बेटा। तेरी चाय ठंडी हो रही है।"

"मेरी चाय चूल्हे पर है, क़ासिम भाई। और मैं यहाँ बिना जवाब नहीं जाऊँगा।" रवि उसके सामने वाली चारपाई पर बैठ गया। "मेरे पापा को किसी ने मारा। मुझे पता है। मैं उसका सच ढूँढ रहा हूँ।"

बहुत देर तक कोई आवाज़ नहीं आई। सिर्फ़ छत से टपकती बूँदें गिनती रहीं। बूढ़ा अपने हाथों को गोद में रखे बैठा रहा, और उसकी उँगलियों में हल्की कँपकँपी थी जो वो छिपाने की कोशिश कर रहा था।

फिर बूढ़े ने धीरे से कहा, "तू उस घड़ी वाले का बेटा है।"

रवि का दिल एक बार ज़ोर से धड़का। उसने कुछ नहीं कहा।

भूखा उसकी तरफ़ झुका। मोमबत्ती की लौ उसके कपड़े पर आई और फिर उसने — बहुत धीरे, जैसे कोई पुराना ज़ख़्म खोल रहा हो — मुँह से कपड़ा हटाया।

सामने सफ़ेद दाढ़ी थी, कमर तक। और उस पर एक चश्मा — मोटा, काला, एक तरफ़ की कनी टूटी और धागे से बँधी हुई। वही चश्मा। बिलकुल वही चश्मा जो पापा की पुरानी तस्वीर में था, जो माँ ने चालीस साल से दीवार पर टाँगा हुआ था, जिस पर हर दिवाली पर धूल पोंछी जाती थी।

रवि के हाथ काँपने लगे। उसने घुटने टेक दिए — अपने आप, सोचे बिना — और उसकी आँखों से पानी निकल आया। उसे शर्म नहीं आई।

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