Billionaire Empire System – Chapter 73
"आप…" उसकी आवाज़ फट गई। "आप वो आदमी हैं। तस्वीर में। पापा के साथ।"
क़ासिम भाई ने देखा — देर तक देखा, जैसे किसी चीज़ को अंदर तक तौल रहे हों। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "तेरी आँखें वैसी ही हैं। जैसी उस रात थीं जब उसने मुझे बचाया था।" उनकी आवाज़ टूटी, पर उन्होंने सँभाल ली। "उस रात के बाद मैंने इन आँखों में सिर्फ़ डर देखा। सालों तक। किसी के चेहरे पर उसकी चमक नहीं देखी।"
वो उठे — कमरे में सबसे ऊँची चीज़ बनकर खड़े हुए — और रवि के सामने आकर रुके।
"बेटा," उन्होंने कहा, "अंदर आया है तो अब सुन ले। जो तेरे पापा ने मेरे लिए किया, उसका कर्ज़ मैं आज तक नहीं चुका सका। और आज तू आ गया, यहाँ, इस झोपड़ी तक — तो समझ ले कि कुछ तो बाकी है।"
रवि ने अपने आँसू पोंछे और घड़ी जेब से निकालकर हथेली पर रख दी।
क़ासिम भाई की नज़र घड़ी पर पड़ी। उनका चेहरा एक पल में बदल गया — डर जैसा, और उससे भी बड़ा कुछ। वो पीछे हटे, जैसे उसने कोई आग देखी हो।
"इसे…" उनकी आवाज़ काँपी। "इसे यहाँ से हटा। इसे मत दिखा मुझे।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने इसे दस साल से नहीं देखा।" उनकी आँखें घड़ी से चिपकी रहीं, मगर वो हाथ नहीं बढ़ाया। "और जिस दिन आख़िरी बार देखा था, उस रात के बाद मेरी ज़िंदगी में कोई सुबह नहीं आई।"
वो लौटकर अपनी चारपाई पर बैठ गए और अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया। फिर बहुत धीरे बोले, "वो ट्रस्ट का खज़ांची था। सेवा सदन का। और मैं… मैं उसका साथी था। जिस दिन ट्रस्ट हड़पा गया, उसी रात से मैं यहाँ हूँ। मरा नहीं, पर ज़िंदा भी नहीं।"
रवि के होंठ सूख गए। उसने पूछा, "आपने पुलिस को क्यों नहीं बताया?"
क़ासिम ने हाथ नीचे किए। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो शब्दों से पहले आ गया।
"बताया था, बेटा। मेरे बेटे को बताया था।"
कमरे में बस टपकती बूँदें रह गईं। रवि ने कुछ पूछा नहीं। वो जानता था कि कुछ जवाब पूछने से नहीं, रुकने से आते हैं।
क़ासिम भाई ने गहरी साँस ली। "वो शहर का सबसे बड़ा आदमी था, फिर भी मेरे बेटे के पास गया। मीठी बातें कीं, पैसे दिए, और एक रात उसे ज़िंदगी में ऐसी जगह पहुँचा दिया जहाँ से लौटना नहीं था।" वो रुके। "और मैं… मैं यहाँ बैठा हूँ। पानी लेने निकलता हूँ। लोग मुझे पागल समझते हैं। पर मैं पागल नहीं हूँ, रवि। मैं कायर हूँ। और कायर इंसान अपनी कायरता के साथ जीना सीख लेता है।"
रवि के हाथों में घड़ी की धातु ठंडी थी। उसने बहुत धीरे कहा, "क़ासिम भाई, मैं भी डरता हूँ। रोज़ डरता हूँ। बलवंत के आदमी गली में आते हैं तो मेरे हाथ काँपते हैं — नहीं, सच कहूँ, मेरे पैर भी काँपते हैं।" उसने घड़ी हथेली पर कसकर पकड़ी। "पर जब काँपते-काँपते अगला कदम बढ़ जाता है, तो पता चलता है कि डर कदम के आगे नहीं, पीछे रह जाता है।"
क़ासिम भाई ने उसकी तरफ़ देखा। देर तक। फिर उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया — बहुत धीरे — और रवि के सिर पर रख दिया। उनका हाथ काँप रहा था, पर हल्का था।
"मैंने सुना है," उन्होंने कहा, "तेरी दुकान पर एक लड़की आती है। रिपोर्टर। इरा?"
रवि ने हैरानी से देखा। "आपको कैसे…"
"मैं यहाँ अंधा नहीं हूँ, बेटा।" उनके होंठों पर पहली बार कुछ आया जो मुस्कान जैसा था, पर बहुत थका हुआ। "बस आँखें मुँह से छिपी हैं, दिमाग़ नहीं। जानता हूँ कि पुराने चौकी का हवलदार रघुवीर तेरे पास आता है, और जानता हूँ कि शहर की सबसे ज़िद्दी रिपोर्टर तेरे चाय के भरोसे बैठती है।" उन्होंने हाथ खींच लिया। "उससे कहियो — उसके पापा का मामला मेरे पास है। पर अभी नहीं। अभी नहीं।"
रवि ने तुरंत पूछा, "अभी क्यों नहीं?"
क़ासिम भाई ने उसकी आँखों में देखा। और फिर उन्होंने वो बात कही जिससे रवि की रीढ़ ठंडी हो गई।
"क्योंकि अभी इस झोपड़ी में तीन लोग थे।" उन्होंने धीरे कहा। "तू, मैं… और वो।"
रवि घूमा। उसने देखा — टूटी खिड़की के पास, मिट्टी में साफ़ पैरों के निशान थे, ताज़े, और वहाँ से एक तरफ़ दीवार की कालिख खुरची हुई थी। जैसे किसी ने दीवार से कुछ पढ़ा हो, या कुछ उतारा हो।
"कौन था?" रवि की आवाज़ धीमी और ठंडी हो गई।
क़ासिम भाई बहुत देर तक खामोशी से खड़े रहे। फिर उन्होंने कहा, इतना धीरे कि रवि को लगा कि उन्होंने सपने में सुना — "मैं यहाँ अंधेरा होने के बाद कोई दरवाज़ा नहीं खोलता। आज भी नहीं खोलता था। जब तूने खटखटाया, मैंने सोचा नहीं खोलूँगा।" वो रुके। "पर दरवाज़ा पहले से खुला था, बेटा। किसी ने बाहर से लकड़ी हटा दी थी, और मैंने वो आवाज़ नहीं सुनी।"
रवि ने झुककर मिट्टी के पैरों के निशान देखे। निशान झोपड़ी से निकलकर श्मशान की दीवार की तरफ़ जाते थे, और फिर गायब हो जाते थे — जैसे कोई चलता हुआ हवा में मिल गया हो। हवा में अब भी चिता की राख और उसके नीचे एक अलग गंध थी — कुछ तेल जैसा, चिकना।
"क़ासिम भाई," रवि ने पूछा, खड़े होकर, "आपने मुझे अपना नाम क्यों बताया? मैंने तो कुछ कहा ही नहीं था। आपने खुद कहा — 'क़ासिम'।"
क़ासिम भाई ने अपना चश्मा ठीक किया और फिर रवि की तरफ़ देखा। उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो रवि ने पहले कभी किसी में नहीं सुना था — जैसे कोई बहुत पुरानी लड़ाई हारकर, आख़िरी बार शस्त्र उठा रहा हो।
"क्योंकि बेटा, ये नाम मैंने दस साल में किसी को नहीं बताया।" उन्होंने झोपड़ी के उस दरवाज़े की तरफ़ देखा जो अब भी खुला था और जिसके बाहर अंधेरा घना हो रहा था। "पर आज जो खिड़की से देखकर गया है — उसने तेरे आने से पहले ही देख लिया था कि तू आ रहा है। और मुझे लगता है…" उन्होंने साँस रोकी, "…उसने यहाँ कुछ ऐसा देखा है जो मेरे पास नहीं है। पर तेरे पास हो सकता है।"
रवि की उँगलियों में घड़ी की सुइयाँ पहली बार हिली।
और फिर बाहर, दूर श्मशान की दीवार के पीछे से, एक गाड़ी का इंजन शुरू हुआ। दो लाइटें जलीं, फिर बुझ गईं।
रवि ने दो कदम बढ़ाकर दरवाज़े से झाँका। अंधेरे में लाइटें फिर जलीं, इस बार ज़्यादा देर तक। गाड़ी धीरे-धीरे श्मशान की दीवार के साथ-साथ खिसक रही थी, जैसे कोई रास्ता भूला हुआ हो और खोज रहा हो।
"क़ासिम भाई, आप अंदर आ जाइए," रवि ने कहा।
"नहीं।" क़ासिम भाई ने मोमबत्ती की लौ दो उँगलियों से दबाई और बुझा दी। धुआँ एक सीधी लकीर में ऊपर उठा। "जब वो आता है, तब इन दीवारों के भीतर देख लेता है। बाहर खड़ा रहता है। बाहर से देखने में उसे हिम्मत लगती है, अंदर आने में नहीं। इसलिए अंदर अंधेरा रहता है। अंधेरे में भी कुछ दिखता है उसे, पर सब कुछ नहीं।"
रवि ने पूछा, "वो कौन है?"
क़ासिम भाई ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने अपना कंबल उठाया और रवि के कंधों पर डाल दिया। कंबल में सीलन और चंदन की गंध थी, और नीचे कुछ कड़ा सा। रवि ने हाथ डाला तो उँगली लकड़ी के एक ढक्कन पर टिकी।
"ये क्या है?"
"पानी की मटकी।" क़ासिम भाई ने कहा। "उसमें जो है, वो मेरा नहीं। तेरे पापा का है। दस साल से मैंने इसे किसी को नहीं दिया। किसी को देना नहीं था।"
बाहर गाड़ी का दरवाज़ा खुला। चटाक। फिर जूतों की आवाज़ आई — धीमी, नापी हुई, जैसे कोई अंधेरे में भी रास्ता जानता हो। रवि ने मोमबत्ती बुझी होने पर भी दरवाज़े की दरार से बाहर झाँका। कुछ नज़र नहीं आया। सिर्फ़ एक आदमी की परछाई दीवार पर पड़ी — लंबी, चौड़े कंधों वाली, और उसके हाथ में कुछ था जो पतला और सीधा था।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno