Billionaire Empire System – Chapter 70
रवि ने पास नहीं लिया।
"साहब ने कहा है," आदमी ने आवाज़ थोड़ी धीमी की, "कि अगर आप नहीं आए, तो वो खुद सुबह फिर आएँगे।" उसने रुककर जोड़ा, "पर तब आपके साथ कोई और भी होगा। भीड़ होगी। आपकी गली वाले सब देखेंगे।" वो मुस्कुराया। "साहब भीड़ में बात नहीं करते। वो बस… आते हैं।"
गाड़ी की खिड़की ऊपर चढ़ी और गाड़ी धीरे से आगे बढ़ गई। गली के मोड़ पर उसकी लाल बत्ती एक पल के लिए जली, फिर बुझ गई।
रवि वहीं खड़ा रहा। जेब में लिफ़ाफ़ा था, हाथ में पास। पीछे घर में माँ सो रही थीं, और वो जानता था कि वो सो नहीं रही हैं। माँ की साँस पहचानता था वो — सोई हुई साँस और जागी हुई साँस में फ़र्क़ होता है। आज वो जाग रही थीं।
उसने घड़ी की तरफ़ देखा, जो मेज़ पर रखी थी। काँटे स्थिर थे, जैसे सब जानते हों और चुप बैठे हों।
"क्या करूँ?" रवि ने धीरे से पूछा।
घड़ी से आवाज़ नहीं आई। कोई मिशन नहीं। कोई पॉइंट नहीं। बस सन्नाटा। और यही सन्नाटा सबसे बड़ा जवाब था — ये लड़ाई पॉइंट की नहीं, आदमी की थी। यहाँ कोई इनाम नहीं मिलेगा। यहाँ सिर्फ़ ये तय करना है कि तू कौन है।
रवि ने कुर्सी खींची और बैठ गया। बाहर आसमान में पहली किरण आने में अभी देर थी। उसने पास को मेज़ पर रख दिया और सामने दीवार पर लगी पापा की तस्वीर को देखने लगा।
"पापा," उसने धीरे से कहा, "आप भी वहीं गए थे ना? उनके पास? छत पर? चाय पीने?"
तस्वीर से कोई जवाब नहीं आया। बस पापा वैसे ही मुस्कुरा रहे थे जैसे हमेशा मुस्कुराते थे — जैसे सब कुछ ठीक है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
"तो फिर मैं भी जाऊँगा," रवि ने कहा। "पर एक बात पक्की है — मैं वहाँ से झुककर नहीं आऊँगा। अगर मैं झुका, तो आपकी चाय का नाम मिट जाएगा।"
उसने पास उठाया और कुर्ता पहना।
रवि ने सुबह होने का इंतज़ार नहीं किया। चार बजे वो घर से निकला। माँ जाग रही थीं, पर उन्होंने रोका नहीं। सिर्फ़ इतना कहा, "जल्दी लौट।" और हाँथ में गमछा पकड़ा दिया। रवि ने गमछा गले में डाला और चल दिया।
राय टावर तक पैदल गया — तीन किलोमीटर। रास्ते में शहर करवट बदल रहा था — दूध वाले की साइकिल, कुत्तों का झुंड, एक अधेड़ आदमी जो सड़क किनारे बेचैनी से खड़ा था। रवि ने किसी से आँख नहीं मिलाई।
राय टावर का गेट बंद था। उसने पास दिखाया। चौकीदार ने बिना पूछे खोल दिया। लिफ़्ट सीधे छत पर जाती थी — बारहवीं मंज़िल, और उसके ऊपर लोहे की सीढ़ी, जिस पर लिखा था "सिर्फ़ ख़ास मेहमान।"
रवि सीढ़ी चढ़ा। हवा इतनी तेज़ थी कि दरवाज़ा खोलते ही उसका कुर्ता फूल गया। छत पर ट्यूबलाइट की रोशनी थी, दो कुर्सियाँ, बीच में छोटी मेज़, और मेज़ पर चमकती केतली।
बलवंत राय बैठा था। सफ़ेद कुर्ता, पर आज उस पर सोने की चेन नहीं थी। बस एक सादी सफ़ेद शर्ट, और हवा से उसके बाल कुछ बिखरे हुए थे। उसने रवि को देखा और मुस्कुराया — आज उसकी मुस्कान में कुछ नरम था। या शायद नरमी का नाटक।
"आ गए," बलवंत ने कहा। "बैठो, बेटा। चाय ठंडी हो रही थी।"
रवि ने कुर्सी खींची और बैठ गया। बलवंत ने खुद चाय डाली — पहले रवि के कप में, फिर अपने। ये अंदाज़ रवि को अजीब लगा। शहर का सबसे बड़ा आदमी उसके लिए चाय डाल रहा है।
"पहले पी लो," बलवंत ने कहा। "फिर बात करते हैं।"
रवि ने कप उठाया। भाप उठ रही थी। चाय में अदरक थी, इलायची थी, और कुछ और भी था जो उसे पहचाना-सा लगा। पापा भी ऐसी ही चाय बनाते थे — अदरक खूब, इलायची थोड़ी, और शक्कर कम। रवि ने चुम्बन लिया। गला जल गया, और उसके साथ ही आँखों में कुछ और भी।
"अच्छी है," रवि ने धीरे कहा। "आपने बनाई?"
बलवंत हँसा। हँसी छोटी थी, आवाज़ से ज़्यादा हवा में। "ना, बेटा। मैंने कभी चाय नहीं बनाई। मैं तो बस पीता हूँ।" उसने प्याली को दोनों हाथों से पकड़ा। "पर एक आदमी था, जो बनाता था। वो चला गया। तब से मैं एक भले आदमी को पैसे देकर ये चाय बनवाता हूँ — वैसी ही बनाता है, पर फिर भी…" उसने गले से आवाज़ निकाली। "कुछ पीछे रह जाता है। तुम समझोगे। तुम चाय वाले हो।"
रवि ने कप नीचे रखा।
बलवंत ने उसे देखा। हवा एक पल के लिए रुकी। "बेटा, तुममें दम है। मैंने बहुत देखे हैं। बीस साल से मैं इस शहर में लोगों को तोड़ता आया हूँ — कोई एक दिन में झुकता है, कोई हफ़्ते में। ज़्यादातर लोग पहली थप्पड़ में झुक जाते हैं।" उसने उँगली उठाई। "तुम नहीं झुके।"
रवि चुप रहा।
"तुमने मेरा आदमी बेनक़ाब किया। मेरी दुकान पर ताला लगवाया तो तुमने भीड़ जुटाई। मेरी बही कब्जे में की। मेरा दामाद — माफ़ करना, मेरा मुंशी — शमशेर तक तुम्हारे पीछे पड़ा है और तुम ज़िंदा हो।" बलवंत ने सिर हिलाया। "बीस साल में ऐसा एक ही आदमी कर पाया था।"
"कौन?"
बलवंत ने कप उतार दिया। "तेरे पापा।"
रवि की साँस एक पल के लिए रुकी, फिर चली।
बलवंत उठा। वो उसकी कुर्सी के पीछे जाकर खड़ा, दूर शहर की तरफ़ देखने लगा। नीचे बत्तियाँ जल रही थीं — छोटी-छोटी, बिखरी हुई, जैसे किसी ने आसमान को उलटकर ज़मीन पर बिछा दिया हो।
"मेरे साथ आ जाओ," बलवंत ने कहा, बिना पलटे। "मैं तुमसे झगड़ा नहीं करना चाहता। मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं है — सच कहूँ तो मुझे किसी की ज़रूरत नहीं है।" वो पलटा। "पर तुम जैसे आदमी इस शहर में ग़लत जगह खड़े हो। तुम गली में सड़ जाओगे। मेरे साथ आओ — तुम्हारी माँ का इलाज मेरी ज़िम्मेदारी। पिंकी की पढ़ाई मेरी ज़िम्मेदारी। जो फ़ीस बाक़ी है, वो मैं भूल जाओगे जैसे कभी थी ही नहीं।" उसने हाथ फैलाया। "और ये दुकान — भूल जाओ इस दुकान को। मैं तुम्हारे नाम से एक होटल खुलवा दूँगा। शहर के बीच में। जिसके बाहर लिखा होगा — 'प्रसाद'। तेरे पापा का नाम, पर बड़ा। इतना बड़ा कि गली का नाम ही तेरे नाम पर पड़ जाए।"
रवि ने सुना। हवा छत पर तेज़ थी, पर उसके अंदर एक अलग हवा चल रही थी — ठंडी, साफ़।
"सर," रवि ने कहा, आवाज़ धीमी, "चाय ठीक है। गरम भी है।" उसने कप को मेज़ पर रख दिया — दोनों हाथों से, आराम से। "पर ये चाय उस पैसे से बनी है जो ग्यारह हज़ार लोगों का है। उनमें से एक आदमी मेरी गली में रहता था — उसकी बीवी आज भी किसी के घर बर्तन माँजती है। एक औरत है, जिसका पति तुम्हारी फ़ैक्टरी में मरा, और उसे 'हादसा' कहकर बंद कर दिया गया।" रवि ने उठकर खड़ा हो गया, कुर्सी को आराम से पीछे सरकाया। "इस पैसे की चाय मेरे गले से नहीं उतरती, सर। इसलिए माफ़ करना।"
बलवंत की मुस्कान वहीं रुक गई। चेहरे पर कुछ जम गया — न गुस्सा, न हँसी, बस एक ठंडी, खाली तबीयत। उसकी उँगली उठी और फिर नीचे आई। शायद उसने सोचा कि यहाँ कोई देख नहीं रहा।
वो रवि के पास आया। उसकी कद थोड़ा ऊँचा था। उसने रवि के कंधे पर हाथ रखा। हाथ भारी था — जैसे कोई बोरी रख दी हो। और रवि का कंधा जम गया। शरीर का सारा खून उस एक जगह पर आ गया, और वहीं रुक गया।
"तेरे पापा ने भी ऐसा ही कहा था," बलवंत ने धीरे कहा। वो इतना करीब था कि उसकी साँस रवि के कान को छू रही थी। "बिलकुल ऐसा ही। वो भी नहीं झुके। उन्होंने भी मुझे ग्यारह हज़ार लोगों की याद दिलाई।" उसने हाथ खींच लिया, और अपनी जेब से रुमाल निकालकर उँगलियाँ पोंछीं। "और देख, वो कहाँ है।"
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