Billionaire Empire System – Chapter 68
शमशेर के फैले हाथ हवा में ही रुक गए। रवि ने इरा का हाथ छोड़ा, आधा कदम आगे बढ़ा, और बोला, "आप मेरे पापा के गुरु हैं? तो एक बात बताइए — उनकी आख़िरी रात आपने उनसे क्या कहा था?"
शमशेर की मुस्कान ज़रा भी नहीं हिली, पर उसकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो वहाँ नहीं था। वो हाथ नीचे करके बोला, "बेटा, रात बहुत है। चाय मेरे घर पर पीते हैं।"
"मेरी चाय दुकान पर मिलती है," रवि ने कहा। "और मेरे पास वो चीज़ है जिसके लिए आप इतनी दूर से आए हैं।"
मुश्ताक़ ने एक कदम बढ़ाया, पर शमशेर ने उँगली उठाई। फिर वो धीरे से बोला, "बही दे दे, बेटा। ये तेरे पापा की आख़िरी निशानी है। इसे मैं नहीं, इसकी मिट्टी माँग रही है।"
"मेरे पापा की निशानी पर मेरा हक़ है, आपका नहीं।" रवि ने कुर्ते के ऊपर से सीना थपथपाया। "और ये बही आज रात उस आदमी के पास जाएगी जो इस शहर में बिका नहीं है।"
शमशेर की मुस्कान अब भी वहीं थी, पर आवाज़ थोड़ी नीची हो गई। "सलाम ख़ान? अरे बेटा, सलाम तो पहले ही बिक चुका है। उसकी बेटी से पूछ ले।" उसने इरा की तरफ़ देखा, आँखें ज़रा भी नहीं झुकीं। "तू मेरे दोस्त की बेटी है, इरा। अपने पापा की क़ब्र से एक बार कह आना कि उनका केस अब भी बंद है।"
इरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया, पर उसने हाथ नहीं छोड़ा। रवि ने महसूस किया — उसकी उँगलियाँ अब ठंडी नहीं थीं, गरम थीं, जैसे अंदर कुछ उबल रहा हो।
तभी शमशेर ने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक चमकता हुआ, छोटा सा — और रवि के पैर जैसे ज़मीन में धँस गए।
घड़ी।
वो टूटी घड़ी नहीं थी। ये दूसरी थी — छोटी, सफ़ेद धातु की, खुली हुई, और उसके अंदर एक पतला सा पत्तर। पत्तर पर घिसा हुआ, पर पढ़ा जा सकने वाला निशान — वही आधा टूटा घेरा, अंदर बिंदु।
रवि का गला सूख गया। उसने इरा की तरफ़ देखा। इरा की आँखें उसी पत्तर पर टिकी थीं — मंदिर के काग़ज़ों पर, बूढ़े की तस्वीर की दीवार पर, वही निशान था।
"ये मैंने तेरे पापा की मेज़ से उठाई थी," शमशेर ने घड़ी को उँगलियों में घुमाया। "उस रात। उनके जाने के बाद। तू उस वक़्त कहाँ था, बेटा? अस्पताल में अपनी माँ के पास? या दुकान पर केतली धो रहा था?"
रवि को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। बस एक आवाज़ — दस साल पुरानी — दरवाज़े की चरमराहट।
"और तेरी माँ को तो पता भी नहीं," शमशेर ने घड़ी जेब में रखी, "कि उसका पति उसी के इलाज के पैसे के लिए उस रात मेरे पास आया था।"
इरा का हाथ रवि की मुट्ठी में कस गया।
रवि ने आँखें बंद नहीं कीं। उसने एक गहरी साँस ली — जैसे हर बार लेता है — और फिर बहुत धीमे से बोला, "आप अभी जाइए। क्योंकि अगर आप यहाँ एक मिनट और खड़े रहे, तो जो मैं आज तक किसी से नहीं कह पाया, वो मैं इस गली के हर आदमी के सामने कह दूँगा।"
शमशेर पहली बार चुप हुआ। एक पूरा पल। गाड़ी का इंजन धीरे-धीरे भरभरा रहा था, और दूर कुत्ता अब भी भौंक रहा था।
"जा," शमशेर ने आख़िर कहा, आवाज़ से सारी मिठास उतर चुकी थी। और पलटकर, बिना पीछे देखे, गाड़ी में बैठ गया।
मुश्ताक़ ने रवि की तरफ़ आख़िरी बार देखा। उसके काले दस्ताने में हाथ मुट्ठी बना हुआ था।
गाड़ियाँ निकल गईं।
रवि तभी घुटनों पर आया। इरा ने उसे सहारा दिया। उसके हाथ काँप रहे थे — माँ की शक्ति का बुख़ार अभी उतरा नहीं था।
"रवि, तू ठीक है?" इरा की आवाज़ थरथरा रही थी।
"बही सही सलामत है," उसने फुसफुसाया और कुर्ते पर हाथ रखा।
इरा ने उसका चेहरा देखा। फिर बोली, "तूने सुना, ना? उसने कहा — मेरा पापा बिक चुका है।"
रवि ने उसके हाथ पर हाथ रखा। "तो हम उसे दोबारा खरीदेंगे। सच के पैसे से।" उसने मुश्किल से मुस्कान बनाई। "चल, कचहरी।"
कचहरी का दरवाज़ा रात में भी खुला था। सलाम ख़ान सीढ़ी पर खड़े थे, हाथ में लाल काग़ज़ का लिफ़ाफ़ा, चेहरे पर वो थकान जो वकीलों की आँखों में रहती है। उन्होंने बही देखी, हाथ बढ़ाया, पर पहले पूछा, "इसके अंदर सब है?"
"सब," रवि ने कहा। "और एक बात, साहब — जो आपको पहले बतानी चाहिए थी। आपकी बेटी आज रात ख़तरे में थी, और मेरी वजह से। माफ़ करना।"
सलाम ख़ान ने इरा की तरफ़ देखा, और उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने कुछ नहीं कहा, सिर्फ़ बेटी का सिर सहलाया — दो सेकंड के लिए — जैसे अदालत में भी पिता को पिता रहना है, फिर बही लेकर अंदर चले गए।
लौटते वक़्त आसमान हल्का नीला हो रहा था। इरा चलते-चलते रुकी और बोली, "रवि, तूने शमशेर से माँ की बात छिपाई। वो जानता है तेरी माँ ठीक है।"
रवि भी रुक गया। "वो जानता है?" उसने धीरे से दोहराया, जैसे सवाल खुद से पूछ रहा हो।
"उसने कहा ना — तेरी माँ को तो पता भी नहीं। जैसे… जैसे उसे पता है कि तेरी माँ अब इंसुलिन पर नहीं है।"
रवि ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में धूप नहीं थी, सिर्फ़ एक सवाल, जो किसी जवाब के सामने खड़ा था।
घर पहुँचते-पहुँचते सुबह हो गई। माँ खटिया पर बैठी थीं, हाथ में रामायण खुली थी, पर आँखें दरवाज़े पर थीं। पिंकी उनके पैरों के पास सोई थी, स्कूल की क़मीज़ में ही।
रवि ने पैर धोकर अंदर घुसते ही माँ की आँखें उस पर पड़ीं। और माँ ने किताब बंद कर दी।
"आज तीन बजे से पढ़ने की कोशिश कर रही हूँ," माँ ने धीरे से कहा, "पर शब्द एक जगह नहीं टिक रहे। तेरे पापा भी जब रात में लौटते थे, मैं ऐसे ही किताब लेकर बैठती थी — दिखाने के लिए कि मैं नहीं जाग रही।"
रवि चुपचाप उनके पास बैठ गया। माँ ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया, अँगूठे से आँखों के नीचे की कालिमा पोंछने की कोशिश की, फिर बोलीं, "तेरी आँखों में आज पापा वाली बात है। वही ज़िद, वही डर।"
रवि कुछ नहीं बोला। उसने माँ के हाथ पकड़े और अपने माथे पर रख लिए। हाथ काँपा — माँ का हाथ, उसके माथे पर, सुबह की ठंडी हवा में।
"माँ," उसने फुसफुसाया, "आपने मुझसे कुछ छिपाया ना? पापा के बारे में।"
माँ की उँगलियाँ उसके माथे पर ठिठक गईं।
काफ़ी देर बाद उन्होंने कहा, "एक रात वो बहुत देर से आए। आँखें लाल थीं। मैंने पूछा तो बोले — 'सीता, तू अपने इंसुलिन की फ़िक्र मत कर। मुझे एक आदमी से दस हज़ार देने हैं, और उसके बाद हम चैन से रहेंगे।'" माँ ने साँस भरी। "अगली सुबह वो नहीं उठे।"
रवि ने आँखें बंद कर लीं।
"मैंने कभी नहीं पूछा," माँ ने कहा, आवाज़ अब बहुत धीमी थी, "क्योंकि डरती थी। अब तू पूछ रहा है, तो सुन — जो भी तू करे, मेरे लिए नहीं। मेरे लिए तू पहले ही बहुत कर चुका। अपने पापा के लिए कर।"
रवि ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में पानी था, पर वो गिरा नहीं। उसने माँ के पैर छुए, खड़ा हुआ, और तभी बाहर दुकान की तरफ़ देखा — शटर पर अब भी मुश्ताक़ की मोहर वाला काग़ज़ चिपका था।
"शकुंतला दीदी पहले से गई होंगी," उसने कहा। "मुझे शटर खोलना है।"
"रवि," माँ ने टोका, "तूने रात भर आँख नहीं झपकाई।"
"माँ, आज दुकान खुलेगी।" उसने कमरे से बाहर कदम रखा। "वरना कल जो आएगा, वो कहेगा — देखा, डर गया।"
दुकान का शटर आधा ही ऊपर उठा था कि शकुंतला गली के मोड़ से हाँफती हुई दौड़ी आई। सिर का लाल दुपट्टा उलझा हुआ, हाथ में गीला कपड़ा।
"रवि! रवि, वो फिर आया है!" उसने घुटनों पर हाथ रखकर साँस ली। "नुक्कड़ पर। दो आदमियों के साथ। मैंने सोचा… सोचा तू अभी घर में होगा…"
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