Billionaire Empire System – Chapter 67
"तू ज़्यादा बोलने लगा है, चाय वाले," मुश्ताक़ ने ठंडे शब्दों में कहा।
शमशेर हँसा। हल्की, ठंडी हँसी। "छोड़ो, मुश्ताक़। बच्चा डर गया है। शुरू में सब डरते हैं।" वो रवि की तरफ़ झुका और बिलकुल धीमे से बोला, "क़ासिम ने तुझे कुछ बताया होगा। अधूरी बातें। आधा सच सबसे बड़ा झूठ होता है, बेटा। मैं वो आदमी हूँ जिसने तेरे पापा को ट्रस्ट से मिलाया। जिसने उन्हें वो दिया जो कोई नहीं दे सका — एक मौक़ा। और मैं ही वो आदमी हूँ जिसने उनकी लाश के पास खड़े होकर कहा था, 'इस शहर में सच बोलने वाले की सज़ा मौत होती है।' तुझे क्या लगता है, तेरे पापा किसके डर से मरे थे — बलवंत के? नहीं, बेटा। मेरे।"
रवि की साँस एक पल के लिए रुकी।
शमशेर ने उसका कंधा फिर छुआ — इस बार रवि पीछे नहीं हटा। उसने धीरे से कहा, "सोच ले। आज रात सो जा। कल सुबह अगर तू इस झोपड़ी से बाहर निकला और मेरे साथ चल पड़ा, तो तेरी माँ का इलाज, तेरी बहन की पढ़ाई, तेरी दुकान — सब कुछ पहले जैसा। और अगर नहीं निकला…" उसने रुककर मुस्कुराया, "तो तू क़ासिम की तरह इसी झोपड़ी में बैठा रहेगा। चाकू सामने रखकर सोएगा। मैं तुझसे कुछ नहीं छीनूँगा, बेटा। मैं सिर्फ़ तुझे वहीं पहुँचा दूँगा जहाँ तू खुद जाना चाहता है।"
वो पलटा और गाड़ी की तरफ़ चल दिया। मुश्ताक़ ने एक पल रवि को घूरा, फिर शमशेर के पीछे हो लिया।
गाड़ी का दरवाज़ा खुला, बंद हुआ। इंजन की आवाज़ उठी, और रोशनी दीवारों से फिसलकर रास्ते पर चली गई। श्मशान का अंधेरा फिर लौट आया।
रवि वहीं खड़ा रहा। उसके पैर ज़मीन पर जमे हुए थे।
क़ासिम भाई ने पीछे से धीरे से कहा, "जो उसने कहा — पापा की लाश के पास खड़े होकर — वो सच है, रवि। मैं भी वहाँ था। मैंने वो आवाज़ सुनी थी।"
रवि ने पलटकर उनकी तरफ़ देखा। फिर इरा की तरफ़। इरा का चेहरा पीला था, पर आँखें सूखी थीं। उसने बही की तरफ़ देखा — रवि के कुर्ते के अंदर, दबी हुई, पर सुरक्षित।
"इरा," रवि ने धीरे से कहा। "तूने सुना? उसने कहा — कल सुबह। मतलब आज रात वो चुपचाप इंतज़ार करेगा। मतलब उसे पक्का यक़ीन है कि मैं आ जाऊँगा।"
इरा ने उसका हाथ पकड़ा। "तो हम यही ग़लती करेंगे क्या? जो वो चाहता है?"
रवि ने क़ासिम भाई की तरफ़ देखा।
"नहीं," उसने कहा। "हम वही करेंगे जो वो नहीं चाहता। हम आज रात, अभी, कचहरी जाएँगे।"
क़ासिम भाई ने उसकी तरफ़ देखा — सफ़ेद दाढ़ी, खुली आँखें, और उन होंठों पर पहली बार एक कमज़ोर सी, टूटी सी मुस्कान आई।
"तू अपने पापा पर गया है, बेटा। उन्होंने भी ऐसा ही कहा था — 'जो उसके सामने से रास्ता बंद कर दे, उसके पीछे से निकल जाओ।'"
रवि ने बही कुर्ते से निकाली। उसे दोनों हाथों से पकड़ा, आँखों के सामने उठाया, और एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं। उसकी उँगलियों में बही का किनारा दबा — पतला, ठंडा, और अंदर से धड़कता हुआ।
"पापा," उसने बहुत धीरे से फुसफुसाया, "आज मैं आपके पीछे नहीं, आगे खड़ा हूँ।"
फिर उसने बही इरा की तरफ़ बढ़ा दी। "इसे अपने बैग में रख। अगर मुझे कुछ हो जाए, तो तू भाग जाना — और बही किसी भी हालत में उसके हाथ मत आने देना।"
इरा ने बही ली, पर उसने भी उसे बैग में नहीं रखा। उसने अपनी क़मीज़ के अंदर खोंसा और कहा, "मैं भागूँगी नहीं। मैं सिर्फ़ तेरे साथ रहूँगी। मरने के लिए भी। जीने के लिए भी।"
क़ासिम भाई ने ज़मीन से उठने की कोशिश की। रवि ने हाथ बढ़ाया और उन्हें खींचकर खड़ा किया। उनके घुटने डगमगा रहे थे, पर वो खड़े थे।
"मैं भी चलूँगा," उन्होंने कहा।
"आप नहीं," रवि ने साफ़ कहा। "आप यहाँ रहिए। आपकी वजह से ही आज बही बची है। अगर मैं लौटा, तो सीधे यहाँ आऊँगा। और अगर नहीं लौटा…" उसने बही की तरफ़ देखा, "…तो ये बही आपका जवाब होगी।"
क़ासिम भाई ने उसका सिर अपने माथे से टिका दिया। उनकी दाढ़ी रवि के माथे को छू रही थी — ठंडी, सख़्त, और अजीब तरह से अपनी।
"जा," उन्होंने कहा। "तेरे पापा की दुआएँ तेरे साथ हैं।"
बाहर निकलते ही रवि ने फ़ोन निकाला।
उसने मोबाइल निकाला — स्क्रीन पर उँगली फिसल रही थी, हाथ अब भी काँप रहे थे। कचहरी के बंद दरवाज़े, रात के गार्ड, कोई जान-पहचान वाला। कोई नहीं।
"फ़ोन किसे करूँ?" उसने इरा की तरफ़ देखा। "रात के ग्यारह बज रहे हैं। कोई नहीं उठेगा।"
इरा ने उसके हाथ से फ़ोन लिया और स्क्रीन उँगली से खिसकाकर एक नंबर पर रोक दिया — सलाम ख़ान। वकील साहब।
"ये सोए होंगे," रवि ने कहा।
"तो उठेंगे।" इरा ने फ़ोन रवि के हाथ में वापस रख दिया। उसकी आवाज़ में वो काँप नहीं था जो चेहरे पर था। "रवि, आज रात जो सोया, वो कल सुबह उठकर कुछ नहीं कर पाएगा। जो जाग रहा है, वही कुछ करेगा।"
रवि ने घंटी बजाई। एक बार। दो बार। सात बार। और फिर आवाज़ आई — नींद में डूबी, फटी, गुस्से वाली। "कौन? इस वक़्त?"
"सलाम साहब, मैं रवि बोल रहा हूँ। रघु प्रसाद का बेटा।" उसने एक साँस ली। "मेरे पास वो बही है। पूरी बही। ग्यारह हज़ार नाम, हिसाब, और शमशेर का हस्ताक्षर। मैं आज रात कचहरी ला रहा हूँ। आपको सिर्फ़ इतना करना है — रजिस्ट्रार को फ़ोन करके जगा दीजिए, और एक गवाह साथ लेकर पहुँच जाइए।"
दूसरी तरफ़ पूरी तरह सन्नाटा था। फिर बिस्तर की चरमराहट, और सलाम ख़ान की आवाज़ अब साफ़ थी, नींद जैसे किसी ने झाड़ दी हो। "तू पागल है? रात में? कचहरी बंद होती है।"
"आप वकील हैं, साहब। बंद दरवाज़े खुलवाना आपका काम है, मेरा नहीं।" रवि ने क़ासिम भाई की झोपड़ी की तरफ़ देखा, जहाँ वो दहलीज़ पर खड़े थे। "मेरा काम सिर्फ़ इतना है — बही को आपके हाथ तक पहुँचाना। बाकी आप जानें।"
सलाम ख़ान ने एक गहरी साँस ली। "ठीक है। एक घंटे में पहुँचता हूँ। और रवि…" उनकी आवाज़ भारी हो गई, "…तेरे पापा ने मुझ पर भरोसा किया था। आज तू कर रहा है। मत करवा मुझे शर्मिंदा।"
फ़ोन कटा। रवि ने मोबाइल जेब में रखा और इरा की तरफ़ मुड़ा। उसकी आँखों में अब कुछ और था — डर नहीं, एक अजीब सी शांति, वो शांति जो बड़ी लड़ाई से ठीक पहले आती है।
"एक बात," इरा ने धीरे से कहा, "शमशेर ने कहा — तेरे पापा मेरे डर से मरे थे। अगर वो सच कह रहा है, तो… तो हम जिस आदमी से लड़ रहे हैं, वो सिर्फ़ बलवंत का आदमी नहीं है। वो खुद बड़ा है।"
रवि ने उसका हाथ थामा। उँगलियाँ ठंडी थीं, पर उसने छोड़ा नहीं।
"मुझे पता है," उसने कहा। "पर आज रात मुझे उससे नहीं लड़ना। आज रात मुझे सिर्फ़ उस काग़ज़ तक पहुँचना है जो उसे सूली पर चढ़ा देगा। लड़ाई कल होगी — जब सारा शहर देख रहा होगा।"
वो झोपड़ी की तरफ़ मुड़े, क़ासिम भाई को आख़िरी बार देखा,और फिर गली के मोड़ की तरफ़ बढ़ चले। श्मशान की सड़क सुनसान थी, दूर कहीं एक कुत्ता भौंक रहा था।
पर वो मोड़ तक भी नहीं पहुँचे थे कि सामने से तेज़ रोशनी आई — दो गाड़ियाँ, एक के पीछे एक, रास्ता रोककर खड़ी हो गईं। दरवाज़े खुले, और पहली गाड़ी से उतरा वो — लंबा, सफ़ेद कुर्ता, चेहरे पर वही मीठी मुस्कान।
"बेटा," शमशेर ने दोनों हाथ फैलाकर कहा, "मैंने कहा था ना — कल सुबह। तूने मेरी बात नहीं मानी।" उसने पीछे मुड़कर देखा, जहाँ मुश्ताक़ भाई खड़ा था, हाथ में वही काला दस्ताना पहने। "अच्छा हुआ। अब मुझे तुझे रास्ते में रोकने का बहाना नहीं ढूँढ़ना पड़ेगा।"
रवि ने इरा का हाथ कसकर दबाया। ठंडी हवा चल रही थी, और उसके कुर्ते के नीचे, दिल के ठीक ऊपर, क़ासिम भाई की बही धड़क रही थी — जैसे कोई दूसरा दिल उसके साथ चल रहा हो।
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