Billionaire Empire System – Chapter 66
उन्होंने आख़िरी पन्ना खोला।
तीन हस्ताक्षर थे, नीली स्याही में, तीन नामों के नीचे। पहला — रघु प्रसाद। दूसरा — सलाम ख़ान। और तीसरा… तीसरा जगह खुरची हुई थी। स्याही मिटाई गई थी, पर काग़ज़ पर उँगली रखने से पता चलता था कि वहाँ कभी कुछ लिखा था — एक गहरा निशान, जैसे ज़ख़्म का निशान।
"तीसरा नाम शमशेर का है," क़ासिम भाई ने कहा। उनकी उँगली उस खुरचे हुए हिस्से पर रुकी। "वो नाम मैंने नहीं खुरचा था। तेरे पापा ने खुरचा — इस डर से कि अगर ये बही कभी पकड़ी गई, तो पहले उसका नाम जाएगा। वो अपना नाम बचा रहे थे, रवि। पर वो जानते थे कौन है।"
"आपने मुझे ये सब क्यों नहीं बताया?" रवि की आवाज़ काँपी। "मैं रोज़ आपके पास आता था। रोज़!"
क़ासिम भाई ने उसकी तरफ़ देखा, और उनकी एक आँख में जो परदा था, वो भी अब भीग रहा था।
"क्योंकि मैं डरता था, बेटा। ये बही मेरे पास है तो मैं ज़िंदा हूँ। अगर मैंने इसे किसी को दिया और वो पकड़ा गया, तो शमशेर इसे जला देगा — और फिर तेरे पापा की मौत का कोई सबूत नहीं बचेगा। सिर्फ़ एक झोपड़ी में बैठा एक बूढ़ा बचेगा, जिसके पास कुछ नहीं होगा। मैंने सोचा — चुप रहूँगा। शायद ये बही किसी दिन अपने आप सही हाथ में पहुँच जाए।"
उन्होंने बही उठाई और दोनों हाथों से रवि की तरफ़ बढ़ा दी।
"आज वो दिन आ गया।"
रवि ने बही पकड़ी। वो भारी थी — असली भारी, जैसे उसमें ग्यारह हज़ार लोगों की साँसें भरी हों। उसके हाथ नहीं काँपे। पहली बार नहीं काँपे।
"ये बही मैंने तेरे पापा को दी थी," क़ासिम भाई ने धीरे से कहा। "और तेरे पापा ने इसे मुझे लौटा दिया — मेरी जान बचाने के लिए। उस रात उन्होंने कहा था, 'क़ासिम, तू इसे लेकर भाग जा। मैं यहीं रुकूँगा। अगर सब ठीक हो गया, तो मैं खुद आकर ले जाऊँगा।' मैंने कहा, 'नहीं, भाई, तू ले जा।' उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर कहा — 'अगर मैं न आऊँ, तो इसका मतलब मैं आ नहीं सका। तब तू मेरे बेटे को देना।'"
क़ासिम भाई की आवाज़ टूट गई। उन्होंने हथेली आँखों पर रख ली। इरा ने मुँह फेर लिया। बाहर श्मशान की तरफ़ से किसी चिड़िया की आवाज़ आई, और फिर सन्नाटा।
"दस साल," क़ासिम भाई ने हाथ हटाकर कहा, आँखें लाल। "दस साल मैं इस झोपड़ी में इसी बही की रखवाली कर रहा हूँ। रात में चाकू सामने रखकर सोता हूँ। हर आहट पर उठता हूँ। कोई दरवाज़ा खटखटाता है तो मेरे हाथ पहले चाकू पर जाते हैं। आज भी गया था — तू आया तो मैंने सोचा शमशेर का आदमी है। इसीलिए चाकू उठा लिया।"
रवि ने बही सीने से लगा ली।
"अब मैं क्या करूँ?" उसकी आवाज़ टूटी, पर आँखों में पानी नहीं था। सिर्फ़ एक ठंडापन था, जो पहले कभी नहीं आया।
"बही लेकर सीधे कचहरी जा।" क़ासिम भाई ने उसका कंधा पकड़ा। "कोई वकील नहीं, कोई पुलिस वाला नहीं — क्योंकि वो सब उसके हैं। तू सीधे उस जज के पास जा जिसे अभी तक कोई नहीं खरीद पाया। पर एक बात याद रख — शमशेर तुझे रास्ते में रोकेगा। वो जानता है कि तू आज यहाँ आया है।"
"कैसे?"
"क्योंकि उसका आदमी शहर के हर मोड़ पर खड़ा है।" क़ासिम भाई ने खिड़की की तरफ़ इशारा किया। "और तेरे पीछे भी आया होगा। मुझे नहीं लगता वो चुप बैठेगा।"
रवि ने इरा की तरफ़ देखा। इरा ने उसकी नज़र पकड़ी और धीरे से सिर हिलाया — जैसे कह रही हो, ठीक है, मैं तेरे साथ हूँ।
तभी बाहर गाड़ियों की रोशनी पड़ी।
तीन सफ़ेद घेरे झोपड़ी की दीवारों पर फैल गए, छत से फिसलकर ज़मीन पर आ गए। इंजन की आवाज़ बंद हुई। दरवाज़ा खुला, फिर बंद हुआ — धड़ाम। पैरों की आवाज़ आई, कई पैरों की। और फिर एक आवाज़ आई जो क़ासिम भाई की आवाज़ से भी ठंडी थी, पर मीठी — बहुत मीठी, जैसे किसी ने शहद में ज़हर घोल दिया हो।
"क़ासिम भाई… चाय पिलाओगे? पुराना दोस्त आया है।"
क़ासिम भाई का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उन्होंने उठने की कोशिश की, पर उनके घुटने जवाब दे गए। वो वापस ज़मीन पर बैठ गए और रवि की तरफ़ देखकर फुसफुसाए।
"ये वही है।"
रवि ने बही को कुर्ते के अंदर खोंसा। उसकी उँगलियाँ अब भी काँप नहीं रही थीं। पर उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था — धड़… धड़… धड़… — जैसे कोई बंद कमरे में दरवाज़ा पीट रहा हो।
इरा ने उसका हाथ पकड़ा। उसकी हथेली बर्फ़ जैसी ठंडी थी। रवि ने उसे दबाया और धीरे से फुसफुसाया, "डरो मत। दरवाज़े के पास रुकना। मैं जो कहूँ, वही करना।"
दरवाज़े पर दो दस्तकें और हुईं। तीन नहीं, दो — जैसे कोई तमीज़दार आदमी हो, पर उँगली की एक हड्डी से मार रहा हो। धीरे, नाप कर।
"क़ासिम भाई, दरवाज़ा नहीं खोलोगे?" वही मीठी आवाज़। "दस साल हो गए। इतनी दूर से आया हूँ।"
क़ासिम भाई ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ हिले — "शमशेर… शमशेर नहीं… कोई नहीं… बस बही… बस बही…" — जैसे कोई अपने आपको संभालने के लिए किसी मंत्र को दोहरा रहा हो।
रवि ने उनका कंधा थामा। "क़ासिम भाई, आप यहीं रहिए। मैं खोलता हूँ।"
"नहीं, रुक—"
पर रवि उठ चुका था। उसने बही कुर्ते में ठीक से खोंसी, कमर कसी, और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। इरा को किनारे खींचकर खड़ा किया और दस्तक पड़ने से पहले ही बेंड़ी उठाकर खोल दी।
बाहर खड़ा आदमी सफ़ेद कुर्ता-पाजामा पहने था। बाल सफ़ेद, बहुत सफ़ेद — पर चेहरा चिकना, जैसे उम्र उसने अपने ऊपर लगने ही नहीं दी। मुँह पर हल्की मुस्कान, आँखें शांत, और हाथ में एक छोटी सी मिट्ठी डली हुई। जैसे कोई पड़ोसी सुबह-सुबह दूध लेने आया हो।
"बेटा।" उसने मुस्कुराकर कहा। "मैं तेरे पापा का गुरु हूँ, शमशेर। तुझसे मिलने का बहुत मन था।"
रवि ने उसकी तरफ़ देखा। कोई डर नहीं। कोई झटका नहीं। बस एक ठंडा सा ख़याल — ये वही चेहरा है जो पापा की आख़िरी तस्वीर में उनके साथ खड़ा था, सबसे पीछे, सबसे खामोश, और सबसे करीब।
और उसके पीछे, ज़मीन से आधा फुट ऊँचा, मुश्ताक़ भाई खड़ा था — काला सूट, काला चश्मा, और हाथ में वही काला दस्ताना पहने हुए।
शमशेर ने रवि के कंधे पर हाथ रखने के लिए हाथ बढ़ाया। रवि ने पीछे हटकर उसे रोका — घुटने ज़मीन पर जमा लिए।
"बेटा, शर्माओ मत," शमशेर ने कहा, हाथ वापस खींचते हुए। "मैं तेरे पापा के साथ दिन-रात रहा हूँ। उनकी आख़िरी रात मैं भी था।" उसकी मुस्कान थोड़ी और गहरी हुई। "बहुत अच्छे आदमी थे। बहुत सीधे।"
क़ासिम भाई ने पीछे से कराह भरी आवाज़ निकाली — जैसे कोई ज़ख़्म पर हाथ रख रहा हो।
रवि ने शमशेर की आँखों में देखा। उनमें कुछ नहीं था — कोई शरारत नहीं, कोई घमंड नहीं, सिर्फ़ एक खालीपन, जो किसी दीवार से टकराकर लौटता नहीं।
"आप मेरे पापा के गुरु थे?" रवि ने पूछा, आवाज़ बिलकुल सीधी।
"थे। और आज भी हूँ — तेरे।" शमशेर ने सिर हिलाया। "मैं तुझे वो सब दे सकता हूँ जो तेरे पापा चाहते थे तुझे मिले। पर उन्होंने तुझे रास्ता नहीं बताया। उन्होंने तुझे सिर्फ़ ये बताया — 'क़ासिम के पास जा।' क़ासिम के पास जाकर तूने पाया क्या? एक बूढ़ा, एक टूटी बही, और ये पुरानी दुकान वाला बोझ।"
उसने मुश्ताक़ के कंधे पर हाथ रखा। "मुश्ताक़, रवि की बही ले लो। बेटा इतना भारी बोझ लेकर नहीं चल सकता।"
मुश्ताक़ आगे बढ़ा। रवि ने इरा को किनारे किया और अपनी जगह से नहीं हिला। उसने कुर्ते के अंदर हाथ डाला — पर बही नहीं निकाली। उसने मुश्ताक़ के काले दस्ताने की उँगली पर हाथ रखा और बड़ी शांति से कहा, "मुश्ताक़ भाई, ये दस्ताना गरम है। आपको पसीना आ रहा है।"
मुश्ताक़ रुक गया। उसका चेहरा नहीं बदला, पर उसकी उँगलियाँ — जो बही की तरफ़ बढ़ रही थीं — थोड़ी देर स्थिर रहीं।
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