Billionaire Empire System64 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 64

7 min read November 7, 2026

रामदीन ने होंठ सिकोड़े, जैसे मुँह में कोई कड़वी चीज़ रख ली हो।

"नाम नहीं बताऊँगा, बेटी। नाम बताया तो ये लड़का उसके पास दौड़ा चला जाएगा। और वो इसे भी उसी तरह सुलझा देगा — जैसे इसके पापा को सुलझाया।" उसने छड़ी उठाई और धीरे से रवि के सीने की तरफ़ इशारा किया। "मैं तुझे एक शब्द देता हूँ। शमशेर।"

रवि के कान में वो शब्द गूँजा। और अचानक उसे कुछ याद आया। दादी कम्मो की छत। चबाते हुए पान के बीच से निकली वो बात — "शमशेर… तेरे पापा का गुरु था, और बलवंत का पुराना साथी। जिसने तेरे पापा को ट्रस्ट से जोड़ा…"

"शमशेर," रवि ने धीरे से दोहराया। "वो… वो पापा का गुरु था।"

रामदीन का चेहरा जैसे और ठंडा हो गया। "हाँ। वही। उसी ने तेरे पापा को ट्रस्ट से जोड़ा था। उसी ने उन्हें उस आदमी के सामने खड़ा किया। और जिस रात तेरे पापा मरे…" बूढ़े की आवाज़ टूटी। "उसी ने बाहर से आवाज़ दी थी।"

इरा ने रवि की तरफ़ देखा। रवि का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। उसकी आँखों में जो चल रहा था, वो शब्दों में नहीं था — हर वो दिन, हर वो बात, जब किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा था, "बेटा, तुम्हारे पापा बहुत अच्छे आदमी थे।"

रवि घुटनों के बल बैठ गया। उसने रामदीन का हाथ पकड़ लिया। बूढ़े के हाथ की नसें उभरी हुई थीं, नाखून पीले, त्वचा काग़ज़ जैसी पतली।

"बाबा, मुझे बही चाहिए।" रवि की आवाज़ भर्रा गई। "आप जो कहेंगे करूँगा। बस वो बही मुझे चाहिए।"

रामदीन ने अपना दूसरा हाथ धीरे से उठाया और रवि के सिर पर रख दिया। वो हाथ काँप रहा था। दस साल का इंतज़ार उस एक स्पर्श में उतर आया।

"बही की जगह तेरे पापा ने मुझे बताई थी," उसने कहा। "उसी श्मशान के पास, उसी झोपड़ी में, जहाँ तू क़ासिम से मिलने जाता है।" उसने रुककर साँस ली। "बही क़ासिम के पास ही है, बेटा।"

रवि ठिठक गया।

"पर एक बात सुन ले।" रामदीन की आवाज़ अब बहुत धीमी थी, जैसे कोई राज़ कह रहा हो। "क़ासिम को पता नहीं कि बही के पीछे कौन है। वो सिर्फ़ इतना जानता है कि ये बही उसके पास रखवाई गई थी, किसी अपने ने। उसे बताना पड़ेगा। और वो… वो शमशेर से डरता है। बहुत डरता है।"

इरा ने रवि का कंधा थाम लिया। "तो हम अभी चलते हैं।"

रामदीन ने सिर हिलाया, पर उसके चेहरे पर वो पुराना डर अभी भी था। "जाओ। पर रास्ते में पीछे मत देखना। इस गली में आज कुछ ज़्यादा ही सन्नाटा है।"

रवि उठा। पैर जैसे किसी और के थे। उसने बूढ़े के पैर छुए, फिर इरा के साथ बाहर निकला। दरवाज़े के बाहर धूप थी, पर रवि को लगा जैसे शाम हो गई है।

मंदिर की सीढ़ियाँ उतरते वक़्त उसने धीरे से कहा, "अगर क़ासिम भाई भी…"

इरा ने उसकी बात काटी, पर आवाज़ में नरमी थी। "तो हमें खुद देखना पड़ेगा। आँख बंद करके भरोसा नहीं, रवि। मैं भी अब यही सीख रही हूँ।" उसने अपना बैग सँभाला। "मेरे बॉस ने मुझे बेवकूफ़ बनाया। तुम्हारे क़ासिम भाई हो सकता है बेकसूर हों, पर हम जाँच करेंगे, आँखें बंद करके नहीं।"

वो गली के मुहाने की तरफ़ बढ़ रहे थे। सामने एक टेम्पो धीरे-धीरे गुज़रा। उसके पीछे एक साइकिल वाला लड़का घंटी बजाते हुए निकला। रवि को लगा जैसे कोई देख रहा है — पीछे, छत पर, किसी खिड़की से।

उसने इरा का हाथ पकड़ा और रफ़्तार बढ़ा दी।

रास्ते में रवि एक शब्द भी नहीं बोला। इरा भी चुप रही। पुराने शहर की गलियाँ बदलती गईं — दीवारों पर नए पोस्टर, एक कटा हुआ बैनर जिस पर मोटे अक्षरों में बलवंत राय का नाम आधा झूल रहा था। आगे शहर की सीमा पर श्मशान की ऊँची दीवार दिखी, ऊपर से नीम के पेड़ों की शाखाएँ लटकती हुईं।

रवि तेज़ चल रहा था, पर अचानक उसके क़दम रुक गए। इरा ने पीछे मुड़कर देखा।

"क्या हुआ?"

रवि ने दीवार का सहारा लिया। उसकी साँस तेज़ थी, हाथ काँप रहे थे — बुख़ार का असर अभी गया नहीं था, और ऊपर से ये शब्द। उसने मुँह खोला, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर धीरे से बोला, "इरा… मैं जिसे गुरु कहता था। जिसके पास बैठकर अपने पापा की बातें करता था। जिसने मुझे घड़ी के बारे में सब बताया। जिसने माँ की दवाई का रास्ता दिखाया।" उसने मुट्ठी बाँधी। "वही मेरे पापा का कातिल है।"

इरा कुछ नहीं बोली। उसने बस अपना हाथ बढ़ाकर रवि का काँपता हाथ थाम लिया। वो ठंडा था। उसकी अँगुलियों में हल्की कँपकँपी थी।

दोनों ऐसे ही खड़े रहे। पास के नाले से सड़ी चीज़ की बदबू आ रही थी, और दूर कहीं श्मशान की तरफ़ से किसी के रोने की आवाज़ आ रही थी। अजीब बात — रवि को यही आवाज़ अब जानी-पहचानी लगी।

"उसने मेरे सामने कभी झूठ नहीं बोला," रवि ने कहा। "यही तो सबसे बुरा है। उसने कभी झूठ नहीं बोला। उसने बस कुछ बातें छिपाईं। और मैंने… मैंने उस पर आँख बंद करके भरोसा किया। हर बार।" उसकी आवाज़ भर्राने लगी। "जब माँ बीमार थी, जब दुकान पर ताला लगा, जब इंसुलिन नहीं मिल रहा था — मैं उसी के पास जाता था। उसे पूछता था, 'अब क्या करूँ?' और वो मुस्कुराकर कहता था, 'हिम्मत रख, बेटा।'"

इरा ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया। रवि ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, पर इस बार पानी नहीं था। इस बार कुछ और था — एक ठंडा, साफ़ गुस्सा।

"तुम ठीक हो?" इरा ने पूछा।

"नहीं।" रवि ने गहरी साँस ली। "पर मैं अब भी खड़ा हूँ।"

वो फिर चलने लगे। श्मशान की दीवार के पास पहुँचते ही हवा बदल गई — वहाँ चंदन और राख की गंध थी, और मिट्टी की सोंधी बदबू। नीम के पेड़ के नीचे से एक कुत्ता भौंका और फिर चुप हो गया।

झोपड़ी दूर ही दिख गई। उसका दरवाज़ा आज आधा खुला था।

रवि के पैर अपने आप धीमे पड़ गए। इरा ने भी कदम रोक लिया।

"मैं बाहर रहती हूँ," उसने धीरे से कहा। "दस मिनट। अगर आवाज़ नहीं आई तो अंदर आ जाऊँगी।"

रवि ने सिर हिलाया। वो अकेला आगे बढ़ा।

झोपड़ी का दरवाज़ा धकेलते ही चरमराई आवाज़ निकली। अंदर अंधेरा था, पर खिड़की से आती पतली रोशनी में रवि ने देखा — क़ासिम भाई ज़मीन पर बैठे थे, पालथी मारे, पीठ दीवार से टिकी हुई। उनके सामने एक छोटी लकड़ी की मेज़ थी और उस पर पीली बही खुली पड़ी थी। पन्ने पलटते-पलटते रुके हुए, जैसे बीच में ही छोड़ दी गई हो।

रवि की नज़र उनके हाथ पर गई।

क़ासिम भाई के दाहिने हाथ में एक चाकू था। तेज़, चमकता हुआ, नई धार वाला। और वो चाकू उन्होंने उठा हुआ था — सीधा रवि की तरफ़, दरवाज़े की तरफ़।

रवि का खून जम गया। उसकी साँस रुक गई। वो पीछे हटा, पीठ दरवाज़े की लकड़ी से टकराई।

"क़ासिम भाई?" आवाज़ उसकी अपनी थी, पर जैसे किसी और की।

क़ासिम भाई नहीं हिले। उनका चेहरा वैसा ही खाली था, काला चश्मा आँखों पर, सफ़ेद दाढ़ी छाती तक। पर उनका हाथ हवा में था, चाकू की नोक काँप रही थी — या शायद रवि की नज़र काँप रही थी।

क़ासिम भाई का हाथ धीरे-धीरे नीचे आया। चाकू मेज़ पर रखा, ठक से। फिर उन्होंने काला चश्मा उतारा और रवि को देखा। उनकी आँखें सूजी हुई थीं, जैसे बहुत देर से रो रहे हों।

"तू आ गया," उन्होंने कहा। आवाज़ बैठी हुई थी। "मुझे लगा तू आएगा ही नहीं। मैं तो सोच रहा था, इसी चाकू से…" उन्होंने बात अधूरी छोड़ दी और चाकू की तरफ़ देखा।

रवि की टाँगें काँप रही थीं। वो दरवाज़े से सटा खड़ा रहा। "आप ये क्या कर रहे थे?"

क़ासिम भाई ने बही की तरफ़ हाथ बढ़ाया और उसे बंद कर दिया। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं। "बैठ जा। खड़ा मत रह। मुझे तेरी आवाज़ सुननी है, बात करनी है। दस साल से मैं इस झोपड़ी में अकेला बैठा हूँ, रवि। अकेला।"

रवि धीरे से बैठ गया। फर्श ठंडा था, नमी उसकी हथेली से चिपक गई।

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