Billionaire Empire System63 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 63

7 min read November 7, 2026

"वो कहता है, 'रामदीन भाई, आप ही इस शहर के आख़िरी ईमानदार आदमी हो।' हँसता है। फिर हर बार जाते वक़्त वही बात पूछता है।"

"क्या?"

रामदीन चारपाई पर बैठ गया। छड़ी उसके घुटनों के बीच खड़ी रही।

"वो पूछता है, 'रामदीन भाई, रघु के बेटे को क्या पता है?'"

रवि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। इरा ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत।

"कल भी आया था," रामदीन ने कहा। "कल रात। मेरे हाथ में चाय का कप था। उसने पूछा — 'कुछ पता चला?' मैंने कहा नहीं। वो हँसा। फिर बोला — 'अब ज़्यादा देर नहीं। वो आएगा।' और वो चला गया।" उसने सिर घुमाया, खाली आँखों से रवि की आवाज़ की तरफ़। "वो तुझे पहले से जानता है, बेटा। तेरे आने से पहले।"

"कौन, पंडित जी?" रवि की आवाज़ काँप रही थी। "कौन आता है? नाम बताइए।"

रामदीन ने होंठ सिकोड़े। बहुत देर तक कुछ नहीं बोला। फिर उसने धीरे से, इतना धीरे कि रवि को झुकना पड़ा, कहा —

"जिसे तू अपना गुरु मानता है, बेटा।"

कमरे में एक पल के लिए कुछ नहीं हिला। न हवा। न दीवार पर पड़ी धूप की लकीर। रवि के हाथ अपने आप काग़ज़ छोड़कर नीचे गिर गए। वो काग़ज़ फ़र्श पर गिरा और उसका कोना पलट गया — ग्यारह नाम, दस काटे हुए, और सबसे नीचे लाल गोला।

"क़ासिम भाई?" रवि ने फुसफुसाया।

रामदीन ने सिर हिलाया — धीरे, धीरे।

"नहीं बेटा। क़ासिम तो खुद मरे हुए लोगों में छिपा है। वो आदमी और है। वो…" उसने छड़ी को दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे गिरने से बचा रहा हो। "वो जो तुझे घड़ी के बारे में सब बताता है। वो जो तेरे पापा का सबसे करीबी था।"

रवि को चक्कर आने लगा। उसने एक हाथ दीवार पर टिकाया। दीवार पर वो ताज़ा निशान अभी भी उँगली के नीचे ठंडा लग रहा था — "बही सुरक्षित है। जो ढूँढेगा, वो पाएगा।"

"मैं कुछ समझ नहीं…" रवि ने कहा। "घड़ी तो पापा की बनाई है। घड़ी मुझे सच बताती है। घड़ी ने…"

"घड़ी सच बोलती है," रामदीन ने कहा। "वो झूठ नहीं बोलेगी। पर वो सिर्फ़ वही बताती है जो उससे पूछा जाए। और कोई अगर तेरे सामने सही सवाल रखे, तो तू उल्टा रास्ता भी पकड़ लेता है।"

इरा ने रवि की तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ कठोर थी, साफ़ — "पंडित जी, नाम बताइए। मुझे नाम चाहिए।"

रामदीन ने उसकी तरफ़ सिर घुमाया। "तू ख़ान की बेटी है?"

इरा ठिठकी। "आपको कैसे…?"

"तेरी आवाज़ में हल्की-सी उर्दू का लचक है। सलाम ख़ान की आवाज़ भी ऐसी ही थी।" बूढ़े का हाथ काँपा। "वो भी मेरे पास आता था। उसने भी मुझसे एक बात पूछी थी, आख़िरी बार — 'रामदीन भाई, क्या इंसान इतना बदल सकता है?' मैंने कहा, 'बेटा, इंसान नहीं बदलता। इंसान का लालच बदलता है, और फिर वो इंसान को बदल देता है।'"

"नाम," इरा ने दोहराया। "मेरे पापा के कातिल का नाम।"

रामदीन ने होंठ खोले, फिर बंद कर लिए। उसका हाथ छड़ी पर और कसकर भिंच गया। कमरे में सिर्फ़ इरा की साँस सुनाई दे रही थी — तेज़, रुक-रुक कर।

"पंडित जी…" रवि ने धीरे से कहा। "आप जानते हैं। फिर भी चुप हैं। क्यों?"

"क्योंकि मैं डरता हूँ, बेटा।" बूढ़े की आवाज़ टूट गई। "दस साल से मैं इसी कमरे में बैठा हूँ। जो मेरे पास आता है, वो मुझे चाय पिलाता है और मेरी आँखों में देखता है। मेरी आँखें नहीं देखतीं, पर मैं उसकी आवाज़ पहचानता हूँ। वो आवाज़… जो एक दिन मेरे लिए दुआ माँगती थी, आज मेरे लिए सवाल माँगती है।"

इरा ने रवि का हाथ छोड़ दिया और एक कदम आगे बढ़ी। "मेरे पापा को किसने मारा?"

रामदीन कुछ देर चुप बैठा। फिर उसने धीरे से कहा, "उस रात तीन लोग थे। तेरे पापा, तेरे पापा का दोस्त… और एक तीसरा, जिसे कोई नाम नहीं जानता था। वो तीसरा आज भी इस शहर में है। सबके सामने घूमता है। सबकी इज़्ज़त करता है।"

"आप उसका नाम क्यों नहीं बोलते?" रवि की आवाज़ ऊँची हो गई। "मेरे पापा मरे। इरा के पापा मरे। आप यहाँ बैठे हो, ज़िंदा हो, और भी जानते हो… तो नाम क्यों नहीं बोलते?"

बूढ़े ने अपनी खाली आँखें उठाईं। उसके होठों पर एक पुरानी थकान थी। "क्योंकि मैंने एक बार नाम बोला था, बेटा। तेरे पापा ने मुझे बचाया था। मैंने दूसरी बार बोला, तो सलाम ख़ान मर गया। अब तू आया है।" उसने छड़ी धीरे से फ़र्श पर टिकाई। "अगर मैं तीसरी बार नाम बोलूँ… तो क्या तू बचेगा?"

रवि ने जेब में ठंडी धातु महसूस की। घड़ी। उसकी उँगलियाँ उस पर रुकीं।

"मुझे बचने की ज़रूरत नहीं," उसने कहा। "मुझे सच की ज़रूरत है।"

रामदीन ने सिर हिलाया। बहुत देर तक वो ऐसे ही बैठा रहा, जैसे अंदर ही अंदर कोई हिसाब लगा रहा हो। फिर उसने धीरे से छड़ी उठाई और उसका सिरा दीवार की तरफ़ कर दिया — ठीक उस जगह, जहाँ उँगली से लिखा निशान था।

"उस रात," वो बोला, "मैं इसी कमरे में था। तेरे पापा ने मुझे यहीं छिपाया। दरवाज़े के बाहर उनकी आवाज़ आई — 'रामदीन, चुप रहना। जो भी हो, चुप रहना।' फिर पैरों की आवाज़ गई। फिर… एक आवाज़।" उसने रुककर साँस ली। "किसी ने कहा — 'रघु, तुमने ग़लत आदमी को अपना भाई बनाया।'"

"किसकी आवाज़ थी?" इरा ने पूछा।

"वो आवाज़ मैंने बहुत साल पहले सुनी थी। एक दुकान पर। जब तेरे पापा और वो… दोनों हँस रहे थे। दोनों ने मेरे लिए चाय मँगाई थी।" बूढ़े का हाथ काँपा। "वही आदमी अब मेरे पास आता है। मुझे चाय पिलाता है। वही चाय… जो उसने उस दिन मँगाई थी।"

रवि का गला सूख गया। "आप कह रहे हैं कि… मेरे पापा का सबसे अच्छा दोस्त…"

"वो मेरे पास कल रात आया," रामदीन ने कहा, जैसे रवि ने कुछ नहीं कहा हो। "कप मेरे हाथ में रखा। फिर बैठकर बोला — 'रामदीन भाई, वो लड़का बड़ा हो गया है। तेज़ है। ज़िद्दी है।' फिर हँसा। 'पूछता है रघु के बारे में। मुझसे पूछता है।' "

इरा ने रवि की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो दोनों के दिल में एक साथ उठा — रवि ने किससे पूछा था? किस घड़ी के पास बैठकर उसने अपने पापा की बात की थी?

"और मैंने पूछा," रामदीन का सिर झुका, " 'तुम रघु के बेटे से मिलते हो?' तो वो बोला — 'रोज़, रामदीन भाई। रोज़। उसे पता ही नहीं कि वो किसके पास बैठा है।'"

रवि घड़ी को जेब से बाहर निकालने ही वाला था, पर हाथ रुक गया। उसके दिमाग़ में एक-एक करके चेहरे चलने लगे — हर वो शख़्स जो उससे अपने पापा के बारे में बात करता था। जो उसके कंधे पर हाथ रखता था। जो कहता था, "बेटा, तुम्हारे पापा बहुत अच्छे आदमी थे।"

रामदीन ने अपना चेहरा उस तरफ़ किया जिधर से रवि की साँस आ रही थी। उसकी आवाज़ अब बहुत हल्की थी, जैसे कोई आख़िरी बात कह रहा हो।

"वो आदमी कल भी आया था। उसने मुझसे पूछा कि रघु के बेटे को क्या पता है।"

रवि का दिल ज़ोर से धड़का। "कौन?"

रामदीन का चेहरा ठंडा हो गया। खाली आँखों में कुछ ऐसा आया जो डर और शर्म दोनों था। उसने होंठ धीरे से खोले —

"जिसे तू अपना गुरु मानता है, बेटा।"

॥

"क़ासिम भाई?" रवि की आवाज़ फट गई। "आप कह रहे हैं… क़ासिम भाई?"

रामदीन ने धीरे से सिर हिलाया। उनकी खाली आँखें उसी तरफ़ थीं, जिधर से रवि की साँस आ रही थी।

"नहीं बेटा। क़ासिम तो खुद दस साल से छिपा बैठा है। वो आदमी और है।" बूढ़े ने छड़ी पर दोनों हाथ टिका दिए। "वो जो तुझे घड़ी के बारे में सब बताता है। वो जो तेरे पापा का सबसे करीबी था।"

कमरे में एक पल के लिए कुछ भी नहीं हिला। दीवार पर टपकता पानी भी जैसे रुक गया। रवि का सिर घूमने लगा। उसने दीवार का सहारा लिया। मुँह में एक अजीब सा स्वाद भर आया — लोहे जैसा।

इरा ने आगे बढ़कर पूछा, "नाम? बाबा, नाम क्या है?"

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