Billionaire Empire System56 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 56

7 min read November 7, 2026

रवि का दिल तेज़ हो गया। "फिर दे दे मुझे।"

"तेरे पास अठारह सौ पॉइंट हैं। दे दूँ?" घड़ी रुकी। "पर सुन ले। हर बार कीमत भुगतनी पड़ती है। तेरे हाथ दो दिन के लिए काँपेंगे। केतली नहीं उठा पाएगा। दुकान दो दिन बंद रहेगी।"

"और माँ?"

"तेरी माँ ठीक हो जाएगी। इंसुलिन की ज़रूरत ख़त्म हो जाएगी — हमेशा के लिए नहीं, दो महीने के लिए।"

दो महीने। रवि ने आँखें बंद कीं। दो महीने। दो महीने में कितना कुछ हो सकता था। पर दो महीने माँ के लिए, बिना सुई के, बिना डर के…

"ले लो," उसने कहा।

"पहले सोच ले," घड़ी ने कहा, और आवाज़ पहली बार सख़्त थी। "अगर तेरे हाथ दो दिन नहीं उठे, तो कल जो भी होगा — तू कुछ नहीं कर पाएगा। मुश्ताक़ ने कहा था कल शाम तक। कल शाम से पहले तू…"

"ले लो!"

चुप्पी। फिर घड़ी के काँच के पीछे एक झटका हुआ — हल्का, गरम, जैसे किसी ने अंदर दीया जलाया हो। रवि की हथेली में गर्मी दौड़ गई, और उसके हाथ की उँगलियाँ पहली बार जाग उठीं, जैसे किसी ने उन्हें अंदर से ठंडा कर दिया हो।

"मिल गई," घड़ी ने कहा। "अब जा।"

रवि दुकान से निकला। शटर गिरा। गली में अब भी लोग खड़े थे। किसी ने कहा, "बेचारा…" किसी ने कहा, "देखा, ये नई उम्र के लड़के…" और कोई चुप रहा।

रवि ने किसी की तरफ़ नहीं देखा। वो सीधा घर की तरफ़ चला। दो गलियाँ, एक मोड़, और घर की सीढ़ियाँ।

दरवाज़ा खुला था। माँ खिड़की के पास बैठी थीं, हाथ में रामायण, पर आँखें किताब पर नहीं — बाहर। खाँसी आई, और उन्होंने किताब से मुँह ढक लिया।

"माँ," रवि ने कहा।

"आ गया?" सीता देवी ने देखा। उन्होंने जल्दी से किताब बंद की, जैसे कुछ छिपा रही हों। "मैंने सुना, गली में शोर था। शकुंतला आई थी क्या?"

रवि उनके पास बैठ गया। धीरे से उनका हाथ पकड़ा। हाथ ठंडा था, नसें पतली, और उँगलियों में हल्की कँपकँपी।

"माँ," उसने कहा। "आँखें बंद करो।"

"क्यों? क्या हुआ?"

"बस बंद करो।"

सीता देवी ने उसकी आँखों में देखा। उन्हें कुछ समझ नहीं आया, पर उन्होंने आँखें बंद कर लीं। और रवि ने अपना हाथ उनके माथे पर रख दिया।

गर्मी। पहले हल्की, फिर तेज़। जैसे उसकी हथेली से कोई गरम पानी बह रहा हो और सीधा माँ के अंदर जा रहा हो। माँ का शरीर एक बार काँपा। वो पीछे हटीं, फिर रुक गईं।

रवि का हाथ काँपने लगा। पहले उँगलियाँ, फिर कलाई, फिर पूरी बाँह। जैसे किसी ने अंदर से तार खींच दिया हो। दर्द नहीं था — बस थकान, बहुत ज़्यादा थकान।

और फिर, अचानक, सब रुक गया।

माँ ने आँखें खोलीं। उनके चेहरे का पीलापन हल्का हो गया था। गालों पर थोड़ी लाली थी, और साँस — साँस अब फूल नहीं रही थी।

"क्या…" उन्होंने अपने हाथ देखे। "क्या किया तूने?"

रवि ने हाथ पीछे खींच लिया। हाथ अब भी काँप रहा था, बुरी तरह। उसने छिपाने की कोशिश की, पर माँ की नज़रें तेज़ थीं।

"माँ, तुम… तुम ठीक हो?"

"मैं ठीक हूँ," सीता देवी ने कहा, और आवाज़ में हैरानी थी। "मैं… मुझे अच्छा लग रहा है। बहुत दिनों बाद। जैसे अंदर से कोई बोझ हट गया हो।"

वो उठीं। बिना सहारे। पैर ज़मीन पर, और वो सीधी खड़ी हो गईं। रामायण मेज़ पर रखी, और उन्होंने दो कदम चले — बिना हिलते, बिना थमते।

रवि को अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं आ रहा था।

"तूने किया?" माँ ने पूछा, और आवाज़ अब डर की थी। "रवि, ये क्या था? तेरे हाथ…"

"कुछ नहीं, माँ।" रवि ने हाथ पीठ के पीछे छिपाया। "बस थकान है। आज दुकान ज़्यादा चली थी।"

"झूठ मत बोल।"

"माॅं, प्लीज।" उसने आवाज़ धीमी कर दी। "बस दो दिन। दो दिन में सब ठीक हो जाएगा।"

माँ ने उसके चेहरे को देखा। बहुत देर तक। फिर उन्होंने कोई सवाल नहीं पूछा। बस उसका सिर अपने सीने से लगा लिया, और रवि को लगा कि वो पहली बार इतने दिनों में उनकी साँस बिना आवाज़ के सुन रहा है — बिना घरघराहट, बिना खाँसी।

तभी घड़ी ने उसकी जेब में हल्का-सा झटका दिया।

रवि ने माँ को छोड़ा और खिड़की से बाहर देखा। गली के मोड़ पर एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। कोई उतरा नहीं। बस गाड़ी वहीं थी, और उसकी खिड़की के पीछे किसी का चेहरा नहीं दिख रहा था — सिर्फ़ अंधेरा।

रवि ने धीरे से परदा खींच दिया।

उसने घड़ी जेब से निकाली। उसका काँच अब और पीला था, और उसके पीछे एक लाइन उभर रही थी, धुएँ जैसे अक्षरों में — "अगला मिशन: तेरी माँ की दवा लौटाओ। इनाम: पंद्रह हज़ार पॉइंट।"

"पंद्रह हज़ार?" रवि ने फुसफुसाया।

"पंद्रह हज़ार," घड़ी ने कहा। "और ये आख़िरी मिशन नहीं है जो तुझे डरेगा।"

रवि ने उसे वापस जेब में रखा। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर अंदर कहीं एक छोटी-सी चीज़ ठंडी और साफ़ थी, जैसे बरसात के बाद की मिट्टी।

वो खिड़की के पास खड़ा रहा। बाहर सफ़ेद गाड़ी अब भी वहीं थी।

और तभी माँ ने पीछे से कहा, "रवि, तेरे पापा के बक्से में एक पुरानी डायरी है। मैंने आज उसमें पहली बार खोला… उसके पन्नों पर कोई नाम लिखा है, बार-बार।"

रवि ने पलटकर देखा।

"कौन सा नाम, माँ?"

माँ ने होंठ हिलाए, और उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़ ज़मीन से खोदकर निकाली जा रही हो। "शमशेर भाई।"

रवि के हाथों मेें कँपकँपी अचानक रुक गई। वो नाम उसने पहले भी सुना था — बुख़ार में, माँ की बेचैन रातों में, पापा की टूटी आवाज़ में।

और जिस आदमी का दरवाज़ा छह दिन पहले उसने देखा था, उसी दरवाज़े पर अब ये नाम चिपका था — "शमशेर हुसैन — सिविल लाइन्स"।

"लेकिन माँ," रवि ने धीरे से कहा, "क़ासिम भाई ने कहा था कि पापा का हत्यारा उनके सबसे करीब था।"

माँ ने उसकी आँखों में देखा। और फिर वो कहा जो रवि को सुनकर पत्थर हो जाना चाहिए था — "और उसी क़ासिम भाई का बहनोई था शमशेर भाई।"

बाहर सफ़ेद गाड़ी ने टर्न लिया और गली से चली गई। रवि ने उसकी टेललाइट देखी, फिर अपने काँपते हाथ, फिर माँ का चेहरा — जो अब पहली बार साफ़ दिख रहा था, बीमारी के बादल उतर चुके थे।

और रवि को समझ आया कि आज की रात उसने माँ की बीमारी जीती है, पर शायद जंग का दरवाज़ा खोल दिया है।

॥

मुश्ताक़ जाते-जाते रुका और बिना पलटे बोला, "वैसे, तेरी माँ का इंसुलिन अब शहर में कहीं नहीं मिलेगा, बेटा। साहब ने कह दिया है।"

रवि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। दादी कम्मो की छड़ी हवा में रुक गई। शकुंतला के हाथ से गीली बाल्टी छूट गई और पानी गली में फैल गया। मुश्ताक़ अपने आदमियों के साथ मुड़ा और धीरे-धीरे चल दिया, जैसे उसने कोई बहुत मामूली बात कह दी हो।

रवि एक पल वहीं खड़ा रहा। फिर बिना किसी से कुछ कहे, वो दौड़ पड़ा।

गली, फिर मोड़, फिर सीढ़ियाँ। उसकी साँस फूल रही थी, पर पैर रुके नहीं। दरवाज़े पर पहुँचकर वो एक पल के लिए थमा।

अंदर से आवाज़ आ रही थी — माँ की खाँसी। लंबी, गहरी, जैसे कुछ अंदर ही अंदर टूट रहा हो।

रवि ने दरवाज़ा धकेला।

माँ चारपाई पर बैठी थीं, कंबल गले तक खींचा हुआ। उनके हाथ में एक छोटा-सा कपड़ा था जिसे मुँह पर रखकर वो खाँस रही थीं। रवि को देखकर उन्होंने कपड़ा नीचे किया और मुस्कुराने की कोशिश की।

"आ गया? दुकान कैसे छोड़ी?"

रवि ने जवाब नहीं दिया। वो सीधा आलमारी के पास गया, उसकी निचली दराज़ खोली, और अंदर रखा लोहे का डिब्बा बाहर निकाला।

डिब्बे के अंदर दो शीशियाँ थीं। एक पूरी। एक आधी।

बस।

"रवि?" माँ की आवाज़ पीछे से आई। "क्या कर रहा है?"

"कुछ नहीं, माँ।" उसने डिब्बा बंद किया और वापस रख दिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी हो गई थीं। "बस देख रहा था।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho