Billionaire Empire System55 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 55

7 min read November 7, 2026

वो धीरे से आगे बढ़ा। दस्ताने वाला हाथ जेब में डाला, दूसरे हाथ से एक सिगरेट निकाली। सिगरेट जलाई। धुआँ उसके चश्मे के पीछे तैर गया।

"रवि प्रसाद," उसने कहा। आवाज़ ऐसी जैसे किसी ने ठंडे पानी में पत्थर गिराया हो। "आ जाओ, बेटा। साहब ने बुलाया है।"

रवि ने बाहर आकर सामने खड़े दोनों आदमियों को देखा। एक ने डंडा ऊपर उठाया और फिर धीरे से नीचे कर दिया — जैसे कह रहा हो, 'देख लो, फिर सोच लो।'

"मुश्ताक़ भाई," रवि ने कहा, आवाज़ धीमी। "इतनी रात को? बात क्या है?"

"तीन दिन हो गए, बेटा।" मुश्ताक़ ने सिगरेट का धुआँ छोड़ा। "घड़ी लौटाने का वक़्त आ गया है। साहब का सब्र भी एक हद तक होता है।"

रवि ने जेब में हाथ रखा। घड़ी वहीं थी। गरम। बहुत गरम।

"घड़ी मेरे पापा की है," उसने कहा।

मुश्ताक़ हँसा। पर वो हँसी नहीं थी — वो आवाज़ थी जो गले से निकलती है जब कोई ताना देता है।

"तेरे पापा की?" उसने सिगरेट ज़मीन पर गिराई और पैर से कुचल दी। "बेटा, तेरे पापा ने वो चीज़ छिपाई थी जो साहब की थी। जो साहब की चीज़ छिपाता है…" वो कुछ देर रुका, और उसकी नज़र रवि की जेब पर टिकी रही, "…उसका अंजाम तेरे पापा ने देख लिया।"

गली में सन्नाटा छा गया। दूर एक खिड़की से किसी ने झाँका और परदा गिरा दिया। पान की दुकान के पीछे चूहे की आवाज़ आई।

रवि का हाथ जेब में था। उसकी उँगलियाँ घड़ी पर टिकी थीं। और घड़ी — घड़ी अब बहुत गरम थी, जैसे किसी ने उसे अंदर से जला दिया हो।

"छह सौ पॉइंट," घड़ी ने रवि के कान में फुसफुसाया। "पर याद रख — आज झूठ भी काम नहीं आएगा।"

रवि ने धीरे से हाथ जेब से बाहर निकाला।

"मुश्ताक़ भाई," उसने कहा। "पापा का अंजाम जो भी था — वो मुझे पता है।"

मुश्ताक़ का चश्मा एक पल के लिए रुका। दोनों आदमियों ने डंडा सँभाला।

"और मुझे ये भी पता है," रवि ने कहा, "कि तुम्हारे हाथ पर जो निशान है — वो भी साहब ने ही दिया था।"

मुश्ताक़ ने अपना दस्ताना वाला हाथ अनजाने में सीने से लगा लिया और तुरंत छोड़ दिया। पर एक पल को उसकी साँस टूटी — रवि ने देखा।

पर फिर उसने खुद को सँभाला और हाथ उठाकर एक इशारा किया।

दोनों आदमी एक क़दम आगे बढ़े।

तभी बगल से एक आवाज़ आई — दुकान की सीढ़ी से, दादी कम्मो की, छड़ी सीधी उठाए हुए।

"अरे रे रे! तू मेरे बेटे पर हाथ उठाएगा? पहले इस अस्सी साल की बूढ़ी से निपट, फिर उसे छूना!"

मुश्ताक़ एक पल के लिए हिचका।

और उसी पल — रवि ने अपना हाथ पीछे खींचा और क़दम जमा लिया। गली में तीनों बल्ब अब पूरी तरह जल रहे थे। रवि को अपने हाथ ठंडे लग रहे थे, और उसकी साँस — साँस धीमी और गहरी, जैसे उसने हर बात से पहले ली थी।

॥

मुश्ताक़ के आदमी ने डंडा उठाया और सीधा रवि के कंधे पर दे मारा।

पर डंडा हवा में रुक गया। दादी कम्मो की छड़ी आड़ी आ गई थी — पतली सी लकड़ी, पर हाथ में ज़ोर था। छड़ी और डंडा टकराए। चटाक!

"अरे रे रे!" दादी चिल्लाईं। "तूने अस्सी साल की औरत का हाथ पकड़ा है, बेटा! अब देख, ये हाथ क्या करता है!"

और उन्होंने छड़ी घुमाई। आदमी के घुटने पर पड़ी। वो दर्द से झुक गया और एक गली की भाषा में गाली बोलने लगा।

भीड़ हँस पड़ी। कोई बोला, "दादी! दादी!" किसी ने ताली बजाई।

मुश्ताक़ का चेहरा नहीं बदला। उसने धीरे से अपना दूसरा हाथ जेब से निकाला — और तभी बगल से पानी की बौछार आई।

छपाक!

शकुंतला खड़ी थी, लाल दुपट्टा, बाल्टी दोनों हाथों से पकड़े। पानी सीधा मुश्ताक़ के सफ़ेद सूट पर गिरा। उसकी क़मीज़ आधी भीग गई, चश्मे पर बूँदें चिपक गईं।

"छी!" शकुंतला ने बाल्टी नीचे रखी और कमर पर हाथ रख दिया। "तुम लोग रोज़ आते हो, गली में घूमते हो, धमकाते हो — कभी चाय के पैसे दिए हैं? एक दिन भी?"

मुश्ताक़ ने चश्मा उतारा और रुमाल से पोंछा। उसकी आँखें अब दिख रही थीं — छोटी, लाल, और अंदर कुछ ऐसा जो हँसी नहीं था।

"शकुंतला," उसने कहा। आवाज़ बहुत शांत। "तेरे पति का केस भी मेरे पास है। याद है ना? फ़ैक्टरी का?"

शकुंतला का हाथ कमर से नीचे गिर गया।

गली में सन्नाटा छा गया। किसी ने दबी आवाज़ में कहा, "अरे, अब ये भी…" और बात अधूरी छोड़ दी।

रवि ने एक गहरी साँस ली। उसकी उँगलियाँ जेब में घड़ी पर टिकी थीं। घड़ी गरम थी — तेज़ गरम।

"अठारह सौ पॉइंट," घड़ी ने फुसफुसाया। "चाहो तो अभी खर्च करो। पर याद रख — जो अभी खर्च करेगा, कल के लिए कुछ नहीं बचेगा।"

रवि ने हाथ जेब से निकाला। खाली हाथ।

"मुश्ताक़ भाई," उसने कहा। "शकुंतला दीदी से हटो।"

"वो तेरी दुकान पर बर्तन माँजती है, बेटा। तेरी नहीं है।"

"मेरी गली की है," रवि ने कहा। "और गली की बात गली वाले करेंगे। तुम बाहर के हो।"

मुश्ताक़ ने चश्मा वापस पहना। उसके होंठ हिले, पर हँसी नहीं आई।

"ठीक है," वो बोला। "आज बात और बढ़ाने का मन नहीं है।" उसने आदमियों को इशारा किया। "कल शाम तक घड़ी। वरना अगली बार ये दुकान नहीं होगी, बेटा। तेरा घर होगा।"

वो पलटा। दोनों आदमी पीछे हटे। भीड़ ने रास्ता दिया।

और रवि ने साँस छोड़ी। पहली बार उसे लगा कि उसके घुटने काँप रहे हैं। उसने दीवार का सहारा लिया।

तभी मुश्ताक़ रुक गया।

वो पलटा नहीं। बस वहीं खड़ा रहा, पीठ रवि की तरफ़, और आवाज़ इतनी धीमी कि सिर्फ़ रवि सुन सके।

"वैसे, एक बात बता दूँ। तेरी माँ का इंसुलिन…" वो रुका। गली में एक कुत्ता भौंका और चुप हो गया। "अब शहर में कहीं नहीं मिलेगा, बेटा। साहब ने कह दिया है। सब दवा की दुकानों पर।"

रवि का दिल एक पल के लिए रुक गया।

"जो दवा साहब की मर्ज़ी से आती है," मुश्ताक़ ने कहा, "वो साहब की मर्ज़ी से ही जाती है।" और वो चल दिया। काली गाड़ी का दरवाज़ा खुला, बंद हुआ, और गाड़ी गली से निकल गई।

रवि वहीं खड़ा रहा। दादी कम्मो ने उसका कंधा छुआ, पर उसे आवाज़ सुनाई नहीं दी।

शकुंतला ने बाल्टी उठाई। उसके हाथ काँप रहे थे, पर उसने हँसने की कोशिश की। "देखा, रवि? मैंने कहा था ना, ये लोग डराते हैं। और डरने से ही तो ये बड़े हुए हैं।" फिर उसकी आवाज़ टूट गई। "बस… बस अपनी बात कह दी। अब जाती हूँ।"

वो बाल्टी लेकर अंदर चली गई। पर रवि ने देखा — दरवाज़े के पास उसने मुँह दुपट्टे से ढक लिया था।

लुट्टन दौड़ता हुआ आया, हाँफ रहा था, हाथ में पान का डिब्बा अब भी पकड़े हुए। "यार रवि! मैं दौड़कर पुलिस को बुलाने गया था, पर रघुवीर सिंह चौकी में नहीं थे, और जो बैठा था उसने कहा — 'लिखवाई करवा लो, फिर आना!'"

"ठीक है," रवि ने कहा।

"ठीक है?! यार, तेरे घर पर हमला हो गया और तू 'ठीक है' बोल रहा है?"

"कुछ नहीं हुआ, लुट्टन।" रवि दुकान की तरफ़ चला। "बस दुकान बंद करनी है।"

उसने शटर पकड़ा। हाथ अब भी काँप रहे थे। शटर नीचे आया — धड़ाम!

दुकान के अंदर अंधेरा था। केतली की भाप अभी भी उठ रही थी, चाय की गंध अब भी तैर रही थी। रवि बेंच पर बैठ गया। घड़ी निकाली। उसका काँच हल्का पीला था, सुइयाँ रुकी हुईं।

"घड़ी," उसने धीरे से कहा। आवाज़ सूखी थी। "ये सच है? इंसुलिन…"

"सच है," घड़ी ने कहा। आवाज़ आज पहले से धीमी थी। "मैंने बाज़ार की हवा सुनी है। किसी दुकान से इंसुलिन का डिब्बा ग़ायब हो गया है। बाक़ी दुकानों पर बात पहुँच गई है — 'रवि प्रसाद के घर पर मत देना।'"

"तो क्या कोई रास्ता है?"

घड़ी कुछ देर चुप रही।

"रास्ता है," उसने कहा। "छूने से हल्की बीमारी ठीक करने की शक्ति। एक हज़ार पॉइंट। सोने के लिए बीमारी नहीं ठीक करनी पड़ती, आँखों से गिरने वाली दवा की ज़रूरत नहीं पड़ती। पहुँच जाओ, हाथ रखो, दर्द चला जाएगा।"

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