Billionaire Empire System – Chapter 57
वो उनके पास बैठ गया। माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया। उनका हाथ पहले से ज़्यादा ठंडा था, और पतला भी।
"तेरा चेहरा क्यों उतरा है?" उन्होंने पूछा।
"थक गया हूँ, बस।"
"झूठ।"
रवि ने माँ के हाथ पर अपना दूसरा हाथ रख दिया। उसने देखा कि उनकी उँगलियों के नाखून नीले पड़ रहे हैं। ये उसने पहले कभी नहीं देखा था। पहले कभी।
"माँ, आप आराम कीजिए।" उसने आवाज़ नरम रखी। "मैं अभी आया।"
"कहाँ से?"
रवि ने कुछ नहीं कहा। उसने सिर्फ़ कंबल ठीक किया और उठ खड़ा हुआ।
दरवाज़े पर पिंकी खड़ी थी। उसके हाथ में स्कूल की कॉपी थी, और आँखें बड़ी। शायद वो सब सुन चुकी थी।
"भैया?" उसने धीरे से कहा।
"तू अपनी पढ़ाई कर।" रवि ने कहा और बाहर निकल गया।
वो सीधा छत पर गया।
शाम का आसमान पीला था, बादलों के किनारे लाल थे। रवि छत की पुरानी दीवार के सहारे बैठ गया और जेब से घड़ी निकाली।
"सुना तूने?" उसने धीरे से कहा। "जो उसने कहा?"
घड़ी का काँच हल्का चमका। फिर सिस्टम की आवाज़ आई, छोटी और साफ़।
"सुना। पर शीशियाँ अभी बाक़ी हैं। तेरे पास सात दिन हैं।"
"सात दिन?" रवि ने सिर उठाया। "उसके बाद?"
"उसके बाद इंसुलिन नहीं मिलेगी।" सिस्टम ने कहा। "पर एक रास्ता है।"
रवि की साँस रुक गई।
"इंसुलिन नहीं। एक शक्ति है। छूने से हल्की बीमारी ठीक करने की।" सिस्टम ने कहा। "पर तेरे पॉइंट कम हैं। और याद रख — कीमत भुगतनी पड़ेगी।"
"कितने पॉइंट चाहिए?"
"एक हज़ार।"
रवि ने घड़ी का काँच देखा। एक हल्की लाइन चमकी, और उस पर लिखा था — पॉइंट: बारह सौ।
"बारह सौ हैं मेरे पास।" रवि ने कहा। "तो फिर कम कैसे?"
"क्योंकि एक हज़ार पॉइंट की शक्ति अकेली नहीं आती।" सिस्टम की आवाज़ थोड़ी धीमी हुई। "माँ की बीमारी बड़ी है, रवि। दो महीने की छूट दी थी, अब वो ख़त्म हो रही है। एक हज़ार पॉइंट से सिर्फ़ एक बार चलेगी। हमेशा के लिए नहीं।"
रवि कुछ देर चुप बैठा रहा।
"तो फिर हमेशा के लिए कितना?" उसने पूछा।
घड़ी चुप रही। बहुत देर।
"दस हज़ार।" सिस्टम ने कहा। "और ये अभी तेरे बूते की बात नहीं है। सिर्फ़ एक बार वाली शक्ति ले। बाक़ी बाद में।"
रवि ने अपनी हथेली देखी। चाय के धब्बे, पुराने जले निशान, और अब उन पर एक हल्की कँपकँपी जो अभी शुरू हुई थी।
"कीमत क्या है?" उसने पूछा।
"एक बार में लेने पर — तेरे हाथ दो दिन काँपेंगे। और बुख़ार चढ़ेगा।"
"बस?"
"बस इतना ही नहीं।" सिस्टम ने कहा। "तेरा शरीर कमज़ोर पड़ेगा। दुकान नहीं चला पाएगा। दो दिन तक तू बिस्तर से उठ नहीं पाएगा।"
रवि ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर मुस्कान आई नहीं।
"माँ ठीक हो," उसने कहा, "बाक़ी देखा जाएगा।"
"रवि।" सिस्टम की आवाज़ में कुछ था जो पहले कभी नहीं था। "कीमत सिर्फ़ शरीर की नहीं होगी। दुकान बंद रहेगी तो कमाई नहीं होगी। पिंकी की फ़ीस भी बाक़ी है। तू सोच ले।"
रवि ने घड़ी को हथेली में कस लिया।
"मैंने सोच लिया।"
"अभी नहीं।" सिस्टम ने कहा। "पहले एक हज़ार का हिसाब कर। तेरे पास बारह सौ हैं। एक हज़ार खर्च करने के बाद दो सौ बचेंगे। उससे कुछ नहीं होगा। पहले और पॉइंट कमा। फिर शक्ति ले।"
रवि ने घड़ी ऊपर उठाई। आसमान अब गहरा नीला हो रहा था।
"कैसे कमाऊँ? मिशन तो तब आते हैं जब कोई ज़रूरत में हो।"
"तो ज़रूरत ढूँढ।" सिस्टम ने कहा। "जा। गली में निकल। जिसे मदद चाहिए, वो तुझे मिलेगा। तू बस देखने की आँख लेकर चल।"
रवि उठ खड़ा हुआ।
वो रात भर सो नहीं पाया। करवट बदलता रहा। माँ की खाँसी हर दो घंटे में आती और वो हर बार उठकर दरवाज़े तक जाता, फिर चुपचाप लौट आता।
सुबह जब पहली किरण आई, वो उठ गया।
उसने दुकान नहीं खोली। शटर बंद रहा। वो सीधा गली में निकल गया।
सुबह की गली अलग दिखती है। दूध वाले की साइकिल की घंटी, किसी के आँगन से चक्की की आवाज़, मंदिर से घंटे की गूँज। रवि पहले कभी इस तरह नहीं चला था — बिना किसी काम के, बस देखते हुए।
पहला मिला राजू, चाय की दुकान के पीछे वाले घर का छोटा लड़का। वो रो रहा था और अपनी माँ की साड़ी खींच रहा था।
"क्या हुआ?" रवि ने झुककर पूछा।
"जूता… जूता खो गया।" लड़के ने कहा, हिचकी लेते हुए।
उसकी माँ ने धीरे से कहा, "नया जूता रवि भैया। स्कूल के लिए। कहीं पीछे की गली में गिर गया शायद। ये तो खोजेगा नहीं, रो रहा है।"
रवि उठा। पीछे की गली में जाकर उसने ईंटों के ढेर के पीछे देखा, नाली के किनारे देखा। आख़िर में पुराने पीपल के नीचे, कूड़े के ढेर के बगल में मिला — एक छोटा, भूरा, धूल भरा जूता।
जब उसने लड़के को जूता दिया, तो वो हँस पड़ा। हँसी में हिचकी भी थी और सना हुआ नाक भी। उसकी माँ ने रवि की तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो रवि ने बहुत दिनों में किसी में नहीं देखा था।
घड़ी ने जेब में हल्का-सा झटका दिया। "मिशन पूरा। इनाम: तीन सौ पॉइंट।"
रवि चलता रहा।
दोपहर तक उसने नौकरी की — एक बूढ़े को जो रास्ता भूल गया था, उसके घर तक छोड़ा। दादी कम्मो की छड़ी जिसकी गाँठ ढीली पड़ गई थी, उसे मज़बूती से बाँधी। एक बूढ़े को प्याऊ से पानी पिलाया जो बहुत देर से धूप में बैठा था और उठ नहीं पा रहा था। शकुंतला के बेटे का कलम छपा हुआ बस्ता जो उसने स्कूल में कहीं छोड़ दिया था, उसे ढूँढकर लाया।
धूप सिर पर चढ़ आई थी। रवि का गला सूख रहा था और पैरों में छाले पड़ रहे थे। वो एक दीवार की छाया में बैठ गया और घड़ी निकाली।
पॉइंट: पंद्रह सौ।
उसने साँस रोक ली।
"पंद्रह सौ?"
"हाँ।" सिस्टम ने कहा। "एक हज़ार खर्च करने के बाद पाँच सौ बचेंगे।"
"तो मैं लेता हूँ।" रवि ने कहा।
घड़ी चुप रही।
"मैंने कहा, लेता हूँ।"
"पहले सोच ले।" सिस्टम ने कहा। "दो दिन काँपेंगे तेरे हाथ। बुख़ार आएगा। तू बिस्तर पर पड़ा रहेगा। दुकान बंद रहेगी। कोई तेरी मदद को नहीं आएगा, क्योंकि सबको लगेगा तू आराम कर रहा है। पिंकी की फ़ीस का क्या? माँ की दवा के बाद के खर्चे का क्या? सोच ले, रवि।"
रवि ने अपने हाथ देखे। धूल से भरे, एक जगह खरोंच लगी थी।
"दो दिन बाद मैं वापस उठूँगा या नहीं?" उसने पूछा।
"उठेगा।" सिस्टम ने कहा। "पर दो दिन कोई नहीं जानता कि तू क्या चुका रहा है।"
"माँ जानती होती तो वो कभी न मानती।" रवि ने धीरे से कहा। "इसीलिए वो नहीं जानेगी।"
वो उठा और घर की तरफ़ चल दिया।
शाम का वक़्त था। घर पहुँचा तो पिंकी दरवाज़े पर बैठी किताबें लिए। उसने देखा और उठ खड़ी हुई।
"भैया, तुम सुबह से कहाँ थे? दुकान भी नहीं खोली। दादी पूछ रही थीं—"
"बाद में, पिंकी।" रवि ने कहा। उसकी आवाज़ में कुछ था जिसने पिंकी को चुप करा दिया।
वो अंदर गया।
माँ खिड़की के पास बैठी थीं, कंबल लपेटे। खाँसी अब भी आ रही थी, पर पहले से तेज़। उन्होंने उसे देखकर कुछ कहना चाहा, पर खाँसी ने रोक दिया।
रवि उनके पास गया और बैठ गया।
"माँ।" उसने धीरे से कहा। "आप ठीक हो जाइए।"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा, उनकी आँखों में सवाल था।
रवि ने घड़ी जेब से निकाली, उसे दोनों हाथों में लिया और मन में कहा — "ले लो मेरे पॉइंट।"
घड़ी का काँच चमका। एक ठंडी लहर उसकी हथेलियों से शरीर में फैल गई। फिर उसने धीरे से अपना हाथ माँ के सिर पर रख दिया।
पहले कुछ नहीं हुआ। फिर माँ की खाँसी एक झटके में रुक गई। उनकी साँस — जो हफ़्तों से भारी थी, जिसमें घरघराहट थी — पहली बार साफ़ सुनाई दी। एक लंबी, आसान साँस।
माँ ने आँखें बड़ी कीं।
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