Billionaire Empire System – Chapter 49
रवि कुछ देर उसे थामे रहा। ये कॉपी वो कभी नहीं पढ़ता था — पिंकी की निजी चीज़ थी। पर आज हाथ अपने आप खुल गए, और पन्ने पलटने लगे।
पहला पन्ना —
"ड्रीम नंबर एक: भैया को एक नई केतली देनी है, जो सीटी बजाए। असली वाली सीटी, जैसी बड़े होटल में होती है। ताकि जब वो सुबह चार बजे उठे, तो केतली बजे और मैं भी उठ जाऊँ। मैंने सोचा है — अगर भैया चार बजे उठ सकता है, तो मैं क्यों नहीं? मुझे भी पढ़ना है। भैया अकेले क्यों मेहनत करें?"
रवि का गला रुंद गया।
दूसरा पन्ना —
"ड्रीम नंबर दो: माँ के इंसुलिन का पूरे साल का पैसा। एक साथ। ताकि भैया को हर महीने लुट्टन भाई से उधार न माँगना पड़े। मुझे पता है वो माँगता है, क्योंकि एक दिन मैंने सुना था — भैया ने फ़ोन पर कहा था, 'लुट्टन, इस महीने फिर से…' और फिर चुप हो गया था।"
रवि ने आँखें बंद कर लीं।
तीसरा पन्ना —
"ड्रीम नंबर तीन: अपना असली स्टेथोस्कोप। खिलौने वाला नहीं। जो असली डॉक्टर इस्तेमाल करते हैं।"
और उसके नीचे, किसी और दिन की लिखाई में, थोड़ी टेढ़ी-मेढ़ी —
"ड्रीम नंबर चार: पापा की मौत का सच। खुद ढूँढूँगी। अगर भैया न ढूँढ पाए तो। क्योंकि भैया बहुत कुछ उठा रहा है अकेले। अब मैं बड़ी हो गई हूँ।"
नीचे तारीख़ थी — पिछले हफ़्ते की।
रवि ने कॉपी धीरे से बंद की। उसके हाथ काँप रहे थे, पर अब डर से नहीं। उसने कॉपी सीने से लगाई, और फिर वैसे ही बक्से में रखकर ढक्कन बंद कर दिया।
वो उठा और आँगन में गया। पिंकी चक्की पर बैठी थी, बाल बिखरे, और वो कुछ बुदबुदा रही थी — शायद कोई सवाल याद कर रही थी।
"पिंकी।"
उसने सिर उठाया। "हाँ भैया?"
"तेरी फ़ीस।" रवि ने गला साफ़ किया। "तीन महीने की बाक़ी है ना?"
पिंकी का चेहरा उतर गया। "भैया, छोड़ ना। मैंने कहा था ना, बाद में—"
"नहीं।" रवि ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो कभी-कभी आती थी। "मैं दूँगा। खुद से। अपने पैसों से देने की कोशिश करूँगा, बस।" उसने एक पल रुककर कहा, "और माँ की दवाई के पैसे भी मैंने तेरी फ़ीस में क्यों दिए, वो भी बताता हूँ — क्योंकि वो बच्चे तेरे स्कूल में पढ़ते हैं। तेरे जैसे। और अगर मैं उनकी मदद नहीं करता, तो मैं तेरी कॉपी में लिखे उस नाम के लायक़ नहीं रहता, जो सबसे ऊपर है।"
पिंकी एक पल के लिए सन्न रह गई। फिर उसकी आँखों में पानी आ गया — पर वो रोई नहीं। वो उठी और रवि के गले लग गई।
"भैया," उसने आवाज़ दबाकर कहा, "कॉपी पढ़ी तुमने?"
रवि ने सिर हिलाया।
"गुस्सा नहीं हुई?" पिंकी पीछे हटी और उसकी आँखों में देखा। "वो पन्ना जो मैंने जोड़ा था — पापा वाला — वो मैंने तुम्हें डराने के लिए नहीं लिखा था। मैंने सोचा—"
"पता है," रवि ने कहा। "और सुन, फ़ीस से ज़्यादा ज़रूरी मेरे लिए ये है कि तूने ये लिखा।" उसने कॉपी की तरफ़ इशारा किया। "बाक़ी सब बाद में। पहले ये बता — तूने ये पन्ना कब जोड़ा?"
"पिछले हफ़्ते। जब हवलदार भैया आए थे और तुम्हारा चेहरा देखकर चले गए थे। तुम रात भर छत पर बैठे थे। मैंने सोचा — अगर भैया अकेले लड़ेगा, तो कहीं टूट न जाए। इसलिए मैंने लिख दिया कि मैं भी हूँ।"
रवि ने उसका सिर सहलाया। "तू है," उसने कहा। "तू सबसे बड़ी ताक़त है मेरी। सिस्टम से भी बड़ी।"
पिंकी हँसी। "सिस्टम क्या है भैया?"
रवि एक पल रुका। फिर बोला, "कुछ ऐसा जो तुझे बाद में बताऊँगा। पहले तू पढ़।"
शाम को रवि दुकान पर बैठा था। केतली धीमी आँच पर थी, और दालचीनी की महक उठ रही थी — वही महक जो दस साल पहले उस रात थी। पर आज वो महक उसे डरा नहीं रही थी। आज वो बस महक थी।
लुट्टन आया। उसके हाथ में पान का बीड़ा नहीं था। वो सीधा आकर रवि के सामने बैठ गया।
"क्या हुआ?" रवि ने पूछा। "आज पान नहीं?"
लुट्टन ने जेब से चाबी निकाली। बाइक की चाबी। उसने उसे मेज़ पर रख दिया, रवि की तरफ़ सरका दिया।
"ले," उसने कहा।
रवि ने चाबी देखी, फिर उसका चेहरा। "ये क्या है?"
"मेरी बाइक की चाबी।" लुट्टन ने गला साफ़ किया। "आज से तेरी मुसीबतें मेरी हैं, और मेरी लॉटरी तेरी।" उसने मुश्किल से मुस्कुराने की कोशिश की, पर मुस्कान आई नहीं। "और सुन — मुझे पता है मैं मज़ाकिया हूँ, हर बात में कहावत घुसा देता हूँ। पर आज मज़ाक नहीं कर रहा। कल जब तू राय टावर गया, मेरा कलेजा मुँह में आ गया था। मैं सोच रहा था — अगर तुझे कुछ हो गया, तो मैं क्या करूँगा? मैं तो बस पान बेचना जानता हूँ।"
रवि ने चाबी उठाई। उसने लुट्टन के हाथ पर रख दी।
"रख अपनी चाबी," उसने कहा। "मुझे तेरी बाइक नहीं चाहिए। मुझे तू चाहिए — पैदल भी साथ चलेगा तो काफ़ी है।"
लुट्टन ने चाबी पकड़ी और कुछ देर उसे घुमाता रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "यार रवि, भगवान भी मुझे भूल गया है…" और फिर रुककर, "पर आज लगता है, उसने तुझे याद रखने के लिए मुझे भेज दिया है।"
रवि हँसा। पहली बार पूरे दिन में सच्ची हँसी।
रात गहरी हो चली थी। रवि अपने कमरे में गया। माँ सो चुकी थीं, पिंकी की किताब पर लैंप जल रहा था। उसने लैंप बुझाया, कमरे का दरवाज़ा धीरे से बंद किया, और बिस्तर पर गिरा।
जब उसने तकिये को ठीक किया, तो उँगली किसी काग़ज़ से टकराई।
उसने काग़ज़ निकाला। साधारण पन्ना, कोई लिफ़ाफ़ा नहीं, कोई मोहर नहीं। बस सफ़ेद काग़ज़ पर काँपती स्याही में पाँच लाइनें —
"कल सुबह छह बजे।
श्मशान के पीछे।
अकेले आना।
और घड़ी लेकर आना।
— क़ासिम"
रवि बिस्तर पर बैठ गया। उसने इधर-उधर देखा — खिड़की बंद थी, दरवाज़ा बंद था, कमरे में कोई नहीं। काग़ज़ तकिये के नीचे कैसे आया?
उसने जेब में हाथ डाला। घड़ी निकाली। काँच के पीछे सुइयाँ अब भी रुकी थीं, काली, चुप। न कोई लाइन, न कोई चेतावनी, न सिस्टम की कोई आवाज़।
पहली बार, घड़ी बिलकुल चुप थी।
उसने घड़ी हथेली में कसकर दबाई, जैसे कोई हाथ थाम रहा हो। फिर वो खिड़की के पास गया और बाहर देखा। गली सूनी थी, सिर्फ़ एक दूर का दीया किसी के आँगन में टिमटिमा रहा था।
"क़ासिम भाई," उसने धीरे से कहा, अपनी साँस में।
और घड़ी के काँच के पीछे, हल्का-सा, एक पुराने काग़ज़ जैसा पीला धुआँ उठा — जैसे कोई बहुत दूर से, बहुत पुराने कमरे से, हाँ कह रहा हो।
॥
पीला धुआँ घड़ी के काँच के पीछे उठा और फिर खो गया, जैसे किसी ने दूर से हाथ हिलाकर हाँ कह दी हो और मुँह फेर लिया हो।
रवि ने घड़ी कान के पास उठाई। सिर्फ़ सन्नाटा। न सिस्टम की आवाज़, न कोई लाइन। उसने तकिये के नीचे फिर हाथ डाला। काग़ज़ वहीं था। काँपती स्याही अब भी गीली लग रही थी, जैसे अभी-अभी किसी ने लिखकर रखा हो।
रवि खिड़की तक गया और बाहर झाँका। गली सूनी। दूर किसी आँगन में दीया टिमटिमा रहा था। उसने दरवाज़े की कुंडी छुई — बंद। फिर वो बिस्तर पर बैठ गया, घड़ी हथेली में लिए, और सुबह होने का इंतज़ार करने लगा।
पर नींद आई ही नहीं। पूरी रात उसके कान में एक ही आवाज़ घूमती रही — "अकेले आना।"
चार बजे जब केतली ने सीटी बजाई, तो रवि ने पहली बार उसे नहीं उठाया। उसने घड़ी जेब में डाली, चप्पल पहनी, और दुकान का शटर खोले बिना बाहर निकल गया।
गली में अंधेरा था। कुत्ते सो रहे थे। एक कौआ किसी तार पर बैठा काँव-काँव कर रहा था, जैसे रवि को बुला रहा हो। रवि ने पीछे मुड़कर देखा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno