Billionaire Empire System – Chapter 48
रवि ने सिर झुका लिया। उसका गला भर रहा था, पर वो रोया नहीं। नहीं रोया।
पिंकी ने खुद को माँ के कंधे पर टिका दिया। "अब आप अकेली नहीं हैं, माँ," उसने फुसफुसाया। "अब हम तीन हैं।"
माँ ने दोनों को अपनी बाँहों में भर लिया। और इस बार रोते हुए वो हँस भी रही थीं — बहुत धीरे, बहुत थोड़ा, पर हँस रही थीं।
उस रात के बाद पहली बार, घर की हवा में डर की जगह कुछ और था।
कुछ देर बाद, रवि उठा। वो दरवाज़े तक गया और बाहर झाँका। गली में सुबह की धूप फैल रही थी। सामने लुट्टन की दुकान का शटर आधा खुला था, और वो लुट्टन ही था जो पान के पत्ते चबाते हुए अपने टेबल पर बैठा था — और साथ में, हैरानी से देखो तो — इरा ख़ान भी खड़ी थी। कंधे पर वही लैपटॉप बैग, हाथ में कॉपी।
रवि ने पलटकर माँ की तरफ़ देखा। "माँ, आज दस बजे मुझे राय टावर जाना है।"
माँ का चेहरा एक पल के लिए फिर डरा, पर फिर उन्होंने सीधी नज़र से देखा। "क्यों?"
"बलवंत ने बुलाया है। कहा है, एक चाय पिलाने की मिन्नत है।" रवि ने मुश्किल से मुस्कुराने की कोशिश की। "मैं जाऊँगा। पूरे शहर के सामने। कहूँगा वो सच जो सालों से दबा है।"
माँ ने उसका हाथ पकड़ा। कसकर। "और अगर वो तुझे जाने न दे?"
रवि ने घड़ी जेब में रखी। "उसके पास हथियार हैं, माँ। मेरे पास एक चाय की केतली, एक टूटी घड़ी, और आज पहली बार — आपका सच।" उसने माँ के हाथ को चूमा। "ये कम नहीं है।"
वो दरवाज़े से बाहर निकला। आँगन की धूप उसके चेहरे पर पड़ी — गरम, असली। पीछे से पिंकी की आवाज़ आई, "भैया, मैं भी चलूँगी!"
रवि मुड़ा। "नहीं, पिंकी। तू माँ के पास रह।"
"पर—"
"प्लीज," रवि ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो पिंकी को चुप करा देती थी। "तू मेरी सबसे बड़ी ताक़त है। तू यहाँ रहेगी, तो मैं वहाँ डरूँगा नहीं।"
पिंकी ने होंठ काटे, फिर सिर हिलाया।
रवि गली में उतरा। लुट्टन ने उसे देखते ही पान थूका और दौड़ा। "अबे, तू आज सुबह से ग़ायब है! और ये मैडम भी—"
"लुट्टन," रवि ने कहा, "बाइक निकाल。"
"कहाँ?"
"राय टावर।"
लुट्टन का मुँह खुला रह गया। "रवि, वो शेर की माँद है—"
"पता है।" रवि ने इरा की तरफ़ देखा। "तुम आ रही हो?"
इरा ने कॉपी सीने से लगाई। "मैं सब रिकॉर्ड करूँगी," उसने कहा। "हर शब्द।"
रवि ने सिर हिलाया। फिर उसने आसमान की तरफ़ देखा — जहाँ सुबह की धूप पुरानी गली की छतों पर फैल रही थी। उसने गहरी साँस ली।
"तो चलो," उसने कहा। "सच की चाय आज पूरे शहर को पिलानी है।"
पर जैसे ही वो बाइक पर बैठा, उसकी जेब में घड़ी की सुइयाँ एक बार फिर हिलीं — बिना बैटरी, बिना चाबी। काँच के पीछे एक छोटी लाइन उभरी, जो पहले कभी नहीं आई थी।
"आज जो तेरे सामने खड़ा होगा, वो बलवंत नहीं होगा।"
रवि का हाथ रुक गया। उसने घड़ी को जेब में दबाया और सामने देखा। सड़क के अंत में, टावर की शीशे वाली इमारत सूरज की रोशनी में चमक रही थी — और उसके ठीक नीचे, किसी ने पहले से एक छोटा सा मंच बना रखा था।
लुट्टन ने बाइक स्टार्ट की। "यार रवि," वो बोला, आवाज़ में हँसी और डर दोनों थे, "भगवान भी मुझे भूल गया है… पर आज तेरे साथ नहीं भूलेगा।"
बाइक चली। और रवि के कान में सिस्टम की आवाज़ आई, छोटी और ठंडी —
"नया मिशन खुल रहा है। नाम: सच की चाय। इनाम: अभी तय नहीं। शर्त: जो सामने आएगा, वो तेरा दुश्मन नहीं है।"
रवि ने पीछे मुड़कर देखा। गली के मोड़ पर माँ खड़ी थीं, दुपट्टे से हाथ पोंछती हुई। और उनके पीछे, दीवार से टिकी, एक परछाई खड़ी थी — लंबी, स्थिर, और बहुत पुरानी।
घड़ी फिर बोली, सिर्फ़ एक लाइन —
"वो आ गया।"
॥
बाइक ने गली का मोड़ लिया, और रवि ने पीछे मुड़कर देखा। माँ अब भी वहीं खड़ी थीं, दुपट्टे से हाथ पोंछती हुई। उनके पीछे दीवार से टिकी वो लंबी परछाई अब गायब हो चुकी थी, जैसे कभी थी ही नहीं।
लुट्टन ने बाइक भगाई। हवा में पान की महक और सड़क की धूल उड़ रही थी। रवि की जेब में घड़ी ठंडी थी, पर उसका दिल गरम। घड़ी ने जो कहा था — "वो आ गया" — वो लाइन उसके दिमाग़ में चक्कर काट रही थी।
"यार," लुट्टन चिल्लाया, हवा में आवाज़ दबती जा रही थी, "उस परछाई वाले को मैंने भी देखा। बता ना, कौन था?"
"पता नहीं।"
"पता नहीं!" लुट्टन ने ब्रेक मारे और बाइक एक झटके से रुकी। "रवि, तू आज अजीब है। मुँह पर मक्खी मार दी है क्या? सुबह से तूने कुछ ठीक से बोला ही नहीं।"
रवि ने उसकी तरफ़ देखा। लुट्टन के माथे पर पसीना था, होंठों पर पान की लाली फैली हुई थी, और आँखों में वो डर था जो वो हँसी से छिपा रहा था।
"लुट्टन," रवि ने धीरे कहा, "माँ ने आज एक बात बताई। उस रात क़ासिम भाई हमारे घर आए थे। कपड़े में कुछ लपेटकर लाए थे। पापा से कहा — 'रघु, ये बही बच्चों के नाम है। इसे मेरे पास नहीं रख सकते, तुम रखो।' और फिर — 'अगर मैं न रहूँ, तो घड़ी रवि को, बही तेरे किसी अपने को।'"
लुट्टन का मुँह खुला रह गया। उसने पान का पत्ता चबाना भूल गया।
"तो मतलब," उसने धीरे से कहा, "पापा को पता था कि उनके साथ क्या होने वाला है।"
रवि ने कुछ नहीं कहा। बाइक फिर चली।
राय टावर सामने आया — बारह मंज़िला, शीशे की इमारत, सूरज की रोशनी में ऐसी चमक रही थी कि आँख चुभ जाए। पर जैसे ही वो पास पहुँचे, रवि का दिल धक् से रह गया।
नीचे जो छोटा मंच बना था, वो खाली था।
न कोई भीड़, न कोई कुर्सी, न बलवंत का कोई आदमी। सिर्फ़ एक लाल कालीन बिछा था, जिस पर धूल जमी थी, और बीच में एक लिफ़ाफ़ा रखा था। हवा उसे हिला रही थी, और वो किनारे पर जाकर रुक जाता था, जैसे गिरने से डर रहा हो।
लुट्टन ने बाइक रोकी। "ये क्या बकवास है? दस बजे का बुलावा था ना?"
रवि मंच के पास गया। उसने लिफ़ाफ़ा उठाया। ऊपर सिर्फ़ उसका नाम लिखा था — "रवि प्रसाद"। नीचे कोई मोहर नहीं, कोई पता नहीं।
उसने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक ही पन्ना था, मोटे काग़ज़ पर छोटी-सी लिखाई —
"बेटा, आज मैं नहीं आ सका। कुछ ज़रूरी काम आ पड़ा। पर तू आया — यही मेरे लिए बहुत है। तेरे पापा और मेरे बीच का हिसाब तो अब तेरे हाथ में है। एक चाय पिलाने की मिन्नत अब भी बाक़ी है। जल्द मिलेंगे।"
नीचे सिर्फ़ एक अक्षर था — "ब।"
रवि के हाथ काँपने लगे।
"ये तो जाल है," लुट्टन ने पन्ना पढ़कर कहा। "ये आदमी हमें नचा रहा है। समझा नहीं? उसने परछाई भेजी, धमकाया, और अब खुद ग़ायब।"
"नहीं लुट्टन," रवि ने धीरे कहा। "ये जाल नहीं है। ये तो… बताना है कि वो सब जानता है। जानता है कि मैं आज आऊँगा, जानता है कि मैं अकेला आऊँगा, और जानता है कि मैं क्या पूछने आया था। और वो इसीलिए नहीं आया — ताकि मैं डरूँ। ताकि मैं सोचूँ कि वो कहीं और है, मेरे पीछे है।"
लुट्टन ने अपना सिर खुजाया। "तो अब?"
रवि ने पन्ना जेब में रखा। उसने एक बार ऊपर देखा — बारहवीं मंज़िल पर शीशे के पीछे कोई नहीं था, पर किसी ने पर्दा खींच रखा था। रवि को लगा कि उस पर्दे के पीछे कोई खड़ा है, और वो हँस रहा है।
"अब घर चलो," उसने कहा। "आज के लिए यही बहुत है।"
घर लौटकर रवि ने शटर उठाया तो दुकान सूनी थी। शकुंतला आज नहीं आई थी — उसने कहा था मन बेचैन है। लुट्टन अपनी दुकान पर चला गया, पर जाते-जाते उसने रवि की तरफ़ देखा, जैसे कुछ कहना चाहता हो और कह न पाया हो।
रवि पीछे की कोठरी में गया। वहाँ रखा था एक लकड़ी का बक्सा, जिसमें पिंकी की किताबें और कॉपियाँ थीं। उसने ढक्कन उठाया, और उसके हाथों में वो कॉपी आई — जिसके ऊपर चिपके काग़ज़ पर उसकी बहन के गोल-गोल अक्षरों में लिखा था: "पिंकी ड्रीम प्रोजेक्ट"।
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