Billionaire Empire System39 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 39

7 min read November 7, 2026

"क्यों सॉरी?" इरा ने हँसी रोकते हुए कहा। "चाय गिरी है, तुमने थोड़े न गिराया।"

रवि ने सिर हिलाया और सफ़ाई के लिए कपड़ा लेने अंदर गया। अंदर जाकर उसने एक गहरी साँस ली। उसकी छाती में कुछ हल्का महसूस हुआ — बहुत दिनों बाद। जैसे कोई भारी पत्थर थोड़ा-सा खिसक गया हो।

वो बाहर लौटा। इरा बेंच पर बैठी थी और अब उसके हाथ में वो मुड़ा हुआ पर्चा था जो कोमल ने भेजा था।

"ये कोमल का है," उसने कहा। "मैंने खोलकर नहीं पढ़ा। सोचा, तुम पढ़ लो।"

इरा ने पर्चा खोला। उसकी नज़र पहली लाइन पर पड़ी और उसका चेहरा बदल गया।

"क्या?" रवि ने पूछा।

इरा ने पर्चा उसकी तरफ़ सरका दिया। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे अब भी शब्दों पर यकीन न हो रहा हो।

"पढ़ो।"

रवि ने पढ़ा — "मैडम, मेरे घर फ़ोन आया है कि मेरी तनख्वाह बंद कर दी गई है। मेरे पापा की दवाई का पैसा उसी तनख्वाह से आता था। मैं डरती हूँ। प्लीज, मुझे माफ़ कर दो। मैं कल चैनल नहीं आ पाऊँगी।"

उसके नीचे एक छोटी लाइन थी, बहुत छोटे अक्षरों में, जैसे हाथ काँपते हुए लिखी गई हो — "मैडम, मुझे लगता है कि हमें कोई देख रहा है।"

रवि ने पर्चा नीचे रखा।

इरा ने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था, और उसके हाथ कुर्सी के पीछे से पकड़े हुए थे — जैसे अगर छोड़ दिए तो वो गिर पड़ेगी।

"कोमल के पापा," उसने कहा, होंठ सूखे हुए। "वो भी मेरे पापा की तरह…" वो वाक्य पूरा नहीं कर पाई।

रवि ने कुछ देर सोचा। फिर उसने अपनी जेब से घड़ी निकाली और सामने मेज़ पर रख दी।

घड़ी की सुइयाँ स्थिर थीं, काँच काला, पर उस पर एक नई लाइन धीरे-धीरे उभर रही थी — छोटी सुनहरी अक्षरों में।

इरा ने देखा।

"ये क्या है?" उसने पूछा।

रवि ने घड़ी पढ़ी — "जो डरता है, वो पहले बोलता है।"

उसने सिर उठाकर इरा की तरफ़ देखा। इरा की आँखों में वो सवाल था जो अभी वो बोल नहीं रही थी, पर जो उसकी आँखों से साफ़ चिल्ला रहा था — "ये घड़ी क्या है, रवि?"

रवि ने घड़ी हथेली में ली। उसकी धातु आज पहले से ठंडी थी, जैसे अंदर से कोई चीज़ जाग रही हो।

"इरा," उसने धीरे से कहा, "मुझे लगता है कि हमें पहले उस आदमी से मिलना चाहिए जिसे तुम्हारे पापा ने 'देर मत करो' लिखा था।"

इरा ने उसकी तरफ़ देखा। और पहली बार उसकी आँखों में, डर के ऊपर, कुछ और भी दिखा — भरोसा।

"कौन?" उसने पूछा।

रवि ने घड़ी मेज़ पर वापस रखी। उसकी नज़र बाहर गली पर पड़ी, जहाँ दोपहर की धूप ईंटों पर पीली हो रही थी, और दूर से शकुंतला के बर्तन माँजने की आवाज़ आ रही थी — खट… खट… खट…

"वो मुझे मिला," उसने कहा। "श्मशान के पास।"

इरा ने उसकी आँखों में देखा। "और उसने क्या कहा?"

रवि ने गहरी साँस ली।

"उसने कहा कि मैं अभी आने लायक नहीं हूँ। कि मेरे पास अभी सिर्फ़ दुख है।"

इरा एक पल को चुप रही। फिर उसने कप उठाया — तीसरी बार, और इस बार उसने पूरा पी लिया, एक ही साँस में, जैसे कोई दवाई पी रही हो।

"तो फिर," उसने कप नीचे रखते हुए कहा, "हमें उसे लायक बनना पड़ेगा।"

रवि ने उसकी तरफ़ देखा। बाहर गली में किसी बच्चे ने गेंद मारी — धड़ाम — और दूर किसी ने हँसते हुए कुछ चिल्लाया। दुकान के सामने लुट्टन की पान की दुकान से रेडियो की आवाज़ आई, जिसमें कोई पुराना गाना बज रहा था।

घड़ी मेज़ पर पड़ी थी। सुइयाँ स्थिर थीं, पर काँच के पीछे, बहुत धुँधला-सा, एक आकृति उभर रही थी — किसी दरवाज़े की, जिस पर एक ताले का निशान था।

और तभी इरा ने अपनी जेब से लैपटॉप निकाला। "मेरे पास एक चीज़ है," उसने कहा, आवाज़ में अब कुछ और था — ज़िद। "अगर तुम्हारे पापा खज़ांची थे और सेवा सदन के काग़ज़ छिपाते थे, तो एक जगह है जहाँ सब पुराने काग़ज़ जाते हैं। शहर का पुराना रिकॉर्ड रूम। पीछे वाले हिस्से में, चौकी के बेसमेंट में।"

रवि ने उसकी तरफ़ देखा। "तुम वहाँ गई हो?"

"तीन बार।" इरा ने लैपटॉप खोला। "तीनों बार हवलदार रघुवीर ने मुझे रोका।" उसने स्क्रीन पर कुछ दिखाया। "पर तीसरी बार, जब मैं लौट रही थी, मैंने देखा कि उन्होंने अपनी जेब से एक चाबी निकाली और अंदर जाकर दरवाज़ा बंद किया।"

रवि की आँखें सिकुड़ीं।

"रघुवीर? वही हवलदार जो मुझसे आज सुबह मिला?"

इरा ने उसकी तरफ़ देखा। "तुमसे मिला?"

"श्मशान में। कह रहा था, पापा ने उसे बूढ़े के पास जाने को कहा था।" रवि ने रुककर सोचा। "और उसने मुझे चेतावनी दी — 'पीछे मत पड़ो।' पर अगर वो खुद चाबी लेकर उस रिकॉर्ड रूम में जाता है…"

इरा ने लैपटॉप बंद कर दिया।

"तो शायद," उसने धीरे से कहा, "वो उतना डरपोक नहीं जितना दिखता है।"

दोनों एक पल चुप बैठे रहे। फिर रवि उठा और केतली फिर गैस पर रख दी।

"एक और चाय?" उसने पूछा।

इरा ने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर थकान थी, आँखों में पानी था, पर उसने सिर हिलाया — हाँ में।

रवि ने दो कप निकाले। दो, तीसरा नहीं। और जब पानी गरम हो रहा था, तब उसने धीरे से कहा, "इरा, तुम्हारे पापा के उस पर्चे पर — 'सलाम भाई, अब देर मत करो' — क्या तुमने कभी सोचा कि वो किसने लिखा?"

इरा ने कप की तरफ़ देखा। "हर रोज़ सोचती हूँ। हर रात।"

रवि ने चाय छानी। भाप उठी और उस भाप में, एक पल के लिए, उसे अपने पापा का चेहरा दिखा — धुँधला, पर मुस्कुराता हुआ। उसने आँखें झपकीं और चेहरा गायब हो गया।

"मेरे पास एक अंदाज़ा है," उसने कहा, कप इरा की तरफ़ सरकाते हुए। "पर वो अभी बोलूँगा नहीं। पहले उस रिकॉर्ड रूम में जाना है।"

इरा ने कप उठाया। इस बार उसकी उँगलियाँ नहीं काँपीं। "कब?"

रवि ने बाहर देखा। दोपहर ढल रही थी, और गली की छाया लंबी होने लगी थी।

"आज रात," उसने कहा। "जब रघुवीर ड्यूटी पर न हो।"

इरा ने सिर हिलाया।

इरा ने कप दोनों हाथों से पकड़ा और उसकी भाप अपने चेहरे पर लेने लगी। "रवि," उसने कहा, और आवाज़ में वो नरमी थी जो पहले कभी नहीं थी, "एक बात पूछूँ?"

"पूछो।"

"तुम्हारे पापा… वो भी उसी दिन गए थे न? जिस दिन मेरे पापा गए थे?"

रवि के हाथ रुक गए। केतली अभी भी गरम थी, पर उसने उसे नीचे नहीं रखा। उँगलियों पर हल्की जलन हुई, और उसने महसूस किया कि वो जलन असली है — बाकी सब पुराना दर्द था, ये आज का था।

"हाँ," उसने कहा। "उसी रात। वो मुझे बोलकर गए थे कि 'बेटा, मैं ज़रूरी काम से जा रहा हूँ, सुबह तक लौट आऊँगा।' " उसने कप मेज़ पर रख दिया, ज़ोर से, और चाय थोड़ी छलक गई। "सुबह लौटे तो… बस एक थैला लौटा। कपड़े, घड़ी, और एक पुरानी तस्वीर जिसमें सिर्फ़ आधा चेहरा था। बाकी आधा फटा हुआ।"

इरा ने उसकी तरफ़ देखा। उसने कुछ कहना चाहा, पर रवि ने हाथ उठाकर रोक दिया।

"मत कहो कि तुम्हें अफ़सोस है।" उसकी आवाज़ भारी थी, पर गुस्से वाली नहीं। "मुझे अफ़सोस नहीं चाहिए। मुझे उस आधी तस्वीर का बाकी आधा चाहिए।"

इरा ने कप नीचे रखा। और फिर उसने कुछ ऐसा किया जो रवि को उम्मीद नहीं थी — उसने अपनी जेब से एक छोटा, मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला और मेज़ पर रख दिया।

"ये मुझे कोमल ने सुबह दिया था," उसने कहा। "कह रही थी कि अकेले मत पढ़ना।"

रवि ने काग़ज़ की तरफ़ देखा। बाहर गली में लुट्टन का रेडियो अब भी बज रहा था, पर आवाज़ दूर हो गई थी, जैसे किसी ने उसे धीमा कर दिया हो।

"अब खोलो," इरा ने कहा।

रवि ने काग़ज़ खोला। कोमल की लिखाई थी — छोटी, काँपती हुई अक्षर, जैसे लिखते वक़्त हाथ काँप रहे हों।

"मैडम, मेरे घर फ़ोन आया है कि मेरी तनख्वाह बंद कर दी गई है। मुझे माफ़ कर दो। मैं डरती हूँ।"

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