Billionaire Empire System – Chapter 3
लुट्टन पहले ठिठका, फिर उसकी हँसी छूट गई। छोटी, फूटी हुई हँसी। रवि भी हँसा। दोनों की हँसी में रुलाई थी, पर हँसी थी। कोठरी में यह पहली आवाज़ थी, जो केतली की सीटी जाने के बाद आई थी।
"तीन सौ बीस और चाहिए," रवि ने नाक पोंछते हुए कहा।
"दादी कम्मो के पास जा," लुट्टन ने कहा। "वो पूरे इलाक़े की दादी हैं। उनके पास जो रखा है, वो किसी को दिखता नहीं, पर ज़रूरत पर निकल आता है।"
रवि दौड़कर गया। दादी कम्मो का घर दो गलियाँ छोड़कर था। दरवाज़े पर वो चारपाई पर बैठी पान चबा रही थीं। रवि को देखकर उन्होंने "अरे रे रे" कहा और चारपाई पर जगह बनाई।
"क्या हुआ, बेटा? उड़ा हुआ सा चेहरा है।"
"दादी, माँ…" रवि ने रुककर साँस ली। "इंसुलिन के पैसे चाहिए। तीन सौ बीस। तीन दिन में लौटा दूँगा, अपनी दुकान की कमाई से।"
दादी कम्मो ने पान चबाना रोक दिया। उनकी झुर्रियों वाली आँखों ने रवि के चेहरे को देखा। फिर वो धीरे से बोलीं, "ये चाय वाला रोज़ सुबह चार बजे उठता है, पर अपने लिए कभी एक अच्छी चादर नहीं खरीदता।"
रवि ने कुछ नहीं कहा।
दादी कम्मो उठीं, अंदर गईं, और एक पुराने टिन के डिब्बे से तीन सौ बीस रुपये निकालकर लाईं। गिनकर उसके हाथ में रखे।
"दादी, मैं लौटा—"
"सुन, बेटा।" उन्होंने उसका हाथ पकड़कर रोका। "तेरे पापा ने मेरे बेटे को मुफ़्त में दवाई दी थी। उस वक़्त मेरे पास दस रुपये भी नहीं थे। मैंने उनसे कहा भी था — 'बाबू, पैसे ले लो।' और उन्होंने क्या कहा था, मालूम है?"
रवि ने सिर हिलाया — नहीं।
"उन्होंने कहा था — 'काकी, दवाई की कीमत मरीज़ नहीं देता, बीमारी देती है। और बीमारी मेरी जेब में नहीं, भगवान के हिसाब में है।'" दादी कम्मो ने उसका हाथ थपथपाया। "मैं वो दिन कभी नहीं भूली। आज ये तीन सौ बीस वो दिन लौटा रहे हैं। तू इसे कर्ज़ मत समझ।"
रवि ने पैसे मुट्ठी में भींच लिए और झुककर उनके पैर छुए।
जब वो लौटा, डॉक्टर बाहर बैठे चाय पी रहे थे। रवि ने पूरे पैसे गिनकर उनके सामने रख दिए। डॉक्टर ने पैसे गिने, सिर हिलाया, और बैग से एक छोटी शीशी और एक नई सुई निकाली।
"इंजेक्शन देता हूँ," उन्होंने कहा। "आज रात आराम करने दो। सुबह फिर देखने आऊँगा।"
सुई लगी, माँ की साँस थोड़ी आराम से चलने लगी, और उनकी पलकें भारी होकर बंद हो गईं।
रवि चारपाई के पास ज़मीन पर बैठ गया। उसने माँ का हाथ पकड़ा। हाथ सूखा था, नसें उभरी हुई, और उँगलियों के जोड़ मोटे हो गए थे — सालों की चक्की और बर्तन माँजने से।
लुट्टन दरवाज़े पर ही खड़ा था। उसने धीरे से कहा, "मैं दुकान देखता हूँ, तू पास बैठ।" और चला गया।
कोठरी में बस दीये की लौ की हल्की कँपकँपी रह गई।
थोड़ी देर बाद माँ नींद में कुछ बड़बड़ाईं। रवि ने कान लगाया।
"रघु…" उनकी आवाज़ टूटी हुई थी, जैसे सपने में किसी से बात कर रही हों। "रघु, तुम जल्दी लौट आना। बच्चों को डर लगता है।"
रवि सन्न रह गया। उसके हाथ ठंडे हो गए। रघु?
पापा का नाम रघु था। पर माँ ने कभी उन्हें इस तरह नहीं बुलाया था। वो पापा को "प्रसाद जी" कहती थीं।
फिर कौन रघु है?
उसने माँ का हाथ थोड़ा कसकर पकड़ लिया। माँ ने आँखें नहीं खोलीं। बस होंठ फिर हिले, "बच्चों को डर लगता है।"
रवि कुछ नहीं बोला। उसने धीरे से सिर झुकाया और माँ के पैर छू लिए।
बाहर डॉक्टर ने अपना बैग उठाया। दरवाज़े तक आए, फिर रुक गए। उन्होंने पलटकर रवि को देखा। कोठरी की रोशनी में उनका चेहरा पीला दिख रहा था।
"बेटा, एक बात कहूँ?" उन्होंने धीरे से कहा, जैसे कोई भारी बोझ उतार रहे हों। "तुम्हारे पापा की मौत दिल के दौरे से नहीं हुई थी।"
रवि उठकर खड़ा हो गया। "क्या?"
"जो सर्टिफ़िकेट मैंने तब साइन किया था, वो मुझे आज तक चुभता है।" डॉक्टर की आवाज़ काँप रही थी। "मुझे उस वक़्त कुछ और कहना था। पर मैंने कहा नहीं। दस साल से ये बात मेरे सीने में पत्थर की तरह पड़ी है।" उन्होंने दरवाज़े की तरफ़ देखा, फिर धीरे से बोले, "और आज जब तुम्हारी माँ को देखा… मैं ये बोझ और नहीं उठा सका।"
रवि का गला सूख गया। "डॉक्टर साहब, आप क्या कह रहे हैं? पापा को…"
"ये बात अभी नहीं, बेटा।" डॉक्टर ने दरवाज़ा खोला। "माँ ठीक हो जाए, फिर मिलना। मुझसे कुछ पूछना हो तो पूछ लेना। पर एक बात याद रखना —" वो रुके, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई, "जो लोग बहुत ज़्यादा सच बोलते हैं, उन्हें थोड़ी बहुत ज़िंदगी की कीमत चुकानी पड़ती है। तुम्हारे पापा ने चुकाई थी।"
और वो चले गए। उनके जूतों की आवाज़ गली में दूर तक गई, फिर ख़त्म हो गई।
रवि दरवाज़े पर खड़ा रह गया। उसके हाथ फिर काँपने लगे थे। वो धीरे से चारपाई के पास लौटा, माँ के पास बैठा, और उसकी आँखों के सामने वो पीली पर्ची तैरने लगी — "सच की चाय हमेशा कड़वी होती है, बेटा। पर पीनी पड़ती है।"
दस साल। दस साल से वो सोचता आया था कि पापा दिल के दौरे से गए। और आज एक बूढ़े डॉक्टर ने एक लाइन में उसकी पूरी ज़िंदगी हिला दी।
वो माँ का हाथ पकड़कर बैठा रहा। बाहर आधी रात हो चुकी थी, गली में कुत्ते भौंक रहे थे, और दूर कहीं किसी रेडियो से कोई पुराना गीत बज रहा था।
तभी दुकान के दरवाज़े पर कोई ठोकर लगी — ठक्… ठक्… ठक्।
रवि पलटा। दरवाज़ा खुला रह गया था, और उसी में एक लिफ़ाफ़ा ठुका हुआ था। सादा, सफ़ेद। उस पर किसी की लिखाई में सिर्फ़ इतना लिखा था — "रवि प्रसाद।"
उसने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक मोटा सा कार्ड था, सुनहरे किनारे वाला, जिस पर लिखा था — "राय टावर, बारहवीं मंज़िल। कल सुबह दस बजे। एक चाय पिलाने की मिन्नत है। — बलवंत राय।"
नीचे छोटे अक्षरों में एक लाइन और थी: "तेरे पापा और मेरे बीच एक पुराना हिसाब बाक़ी है, बेटा। अब तेरा नंबर है।"
रवि के हाथ से कार्ड फ़र्श पर गिर गया। पीछे गली में किसी गाड़ी का इंजन शुरू हुआ, और उसकी आवाज़ रात में दूर तक गूँजती हुई चली गई।
॥
उस रात रवि को नींद नहीं आई। माँ चारपाई पर करवट बदलतीं, कभी होंठ हिलते, कभी साँस रुक-सी जाती। वो पास बैठकर उनकी साँसें गिनता रहा। डॉक्टर की बात सीने में कील की तरह धँसी थी — "तुम्हारे पापा की मौत दिल के दौरे से नहीं हुई थी।"
बाहर गली में भोर की हवा चलने लगी थी। रवि उठा, चूल्हे पर केतली रखी, पर आज चाय बनाने का मन नहीं था। वो पीछे की कोठरी में गया, जहाँ दस साल से पापा का सामान पड़ा था।
एक लोहे का बक्सा, ऊपर से जंग लगा। उसने ढक्कन खोला। अंदर पुरानी रसीदें, फटे काग़ज़, एक पुराना चश्मा जिसका एक काँच टूटा हुआ था, और सबसे नीचे मोटी गठरी में लिपटा कुछ।
कपड़ा खोला तो हाथ रुक गया।
एक घड़ी थी। टूटी हुई। सुइयाँ जहाँ की तहाँ रुकी, काँच काला पड़ चुका था, और किनारे पर एक निशान था। रवि ने उसे हथेली में लिया। माँ की आवाज़ याद आई — "तेरे पापा हर वक़्त घड़ी देखते रहते थे। कहते थे, वक़्त बताता है कब खड़ा होना है।"
रवि ने आस्तीन से काँच पोंछा। पीछे की तरफ़ एक छोटा ढक्कन था। नाखून से खोला। तभी छन्न! — एक पीला पत्तर अंदर से निकलकर फ़र्श पर गिरा।
उसने पत्तर उठाया। बारीक अक्षरों में कुछ उकेरा था। रवि ने आँखें सिकोड़कर पढ़ा — "जो ग़रीब के साथ खड़ा होगा, वो सब कुछ पाएगा।"
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