Billionaire Empire System – Chapter 2
रवि घुटनों के बल बैठ गया। उसने माँ को गोद में उठाया। उनका चेहरा पसीने से भीगा था, होंठ सूखे, और आँखें आधी बंद।
"माँ!" उसकी आवाज़ फट गई। "माँ, आँख खोलो।"
सीता देवी की पलकें थोड़ी हिलीं। "रवि…" उन्होंने धीरे से कहा, "पानी…"
"ला रहा हूँ!" रवि पलटा। "लुट्टन, डॉक्टर को फ़ोन कर! जल्दी!"
लुट्टन ने अपना पुराना मोबाइल जेब से निकाला, स्क्रीन पर उँगली चलाई, और उसका चेहरा उतर गया।
"यार, मेरा बैलेंस ख़त्म है," उसने हकलाते हुए कहा। "कल ही डालना था, भूल गया।"
रवि ने अपना फ़ोन जेब से निकालकर उसकी तरफ़ फेंका। लुट्टन ने लपका।
"डॉक्टर साहब को… वो जो गली के नुक्कड़ पर हैं… उन्हें।" रवि अपनी माँ का सिर अपने घुटने पर रख रहा था और उसके हाथ काँप रहे थे। उसकी आवाज़ धीमी और ठंडी हो गई थी, जैसी हमेशा गुस्से में हो जाती थी। "बोलो, जल्दी आने को बोलो।"
लुट्टन बाहर भागा। उसकी चप्पलें फ़र्श पर चटाक-चटाक कर रही थीं।
कोठरी में सन्नाटा। बाहर दुकान की केतली अब भी सीटी बजा रही थी, पानी सूखने लगा था, और उसकी आवाज़ दीवारों से टकरा रही थी।
रवि ने अपनी माँ का चेहरा अपनी हथेली में लिया। "माँ, सुनो। मैं हूँ। रवि। आँख खोलो।"
सीता देवी की आँखें खुलीं। धुँधली, पर खुलीं। उन्होंने रवि का चेहरा देखा और होंठों पर एक कमज़ोर हँसी आई।
"तू रो रहा है?" उन्होंने फुसफुसाकर पूछा।
"नहीं," रवि ने आँखें पोंछते हुए कहा। "मुझे क्यों रोना आएगा?"
"तेरे पापा भी झूठ बोलते थे," माँ ने कहा। "बिलकुल ऐसे ही।"
रवि का गला भर आया। उसने माँ का सिर अपने सीने से लगा लिया और दरवाज़े की तरफ़ देखा, जहाँ से डॉक्टर के आने की आवाज़ आनी थी। पर आवाज़ नहीं आई। सिर्फ़ केतली की सीटी आ रही थी, जो अब कमज़ोर पड़ रही थी, और जैसे ही पानी सूखा, वो चुप हो गई।
और उसी चुप्पी में, रवि के कानों में मुन्ना भाई की वो बात गूँज उठी — "रोने वाला आदमी सच्चा होता है।"
माँ के हाथों में रामायण की किताब अब भी थी। उसने उसे ज़मीन से उठाया। किताब के बीच से एक पुरानी पीली पर्ची गिरी। रवि ने उसे उठाया — उस पर बस एक लाइन लिखी थी, पापा की लिखाई में — "सच की चाय हमेशा कड़वी होती है, बेटा। पर पीनी पड़ती है।"
तभी बाहर गली में ज़ोर की आवाज़ आई। लुट्टन चिल्ला रहा था, "डॉक्टर साहब नहीं हैं! वो गए हैं… वो कहाँ गए, भगवान भी मुझे भूल गया!"
रवि ने माँ को धीरे से तकिये पर लिटाया और उठकर दरवाज़े की तरफ़ देखा। उसके हाथ अब काँप नहीं रहे थे। वो ठंडे हो गए थे।
उसने जेब से वो खाली इंसुलिन की शीशी निकाली और मुट्ठी में भींच ली। काँच चुभा, पर उसने छोड़ी नहीं।
और उसी वक़्त, बाहर दुकान के सामने, एक सफ़ेद सूट पहने आदमी ने अपनी गाड़ी की खिड़की से झाँककर कहा, "ये चाय वाले की दुकान है न? जो रोज़ सुबह खुलती है?" और उसके पीछे बैठे आदमी ने धीरे से मुस्कुराकर कहा —
"बेटा, थोड़ी देर रुको। हमें उसी से बात करनी है।"
॥
रवि पलटा ही था कि पीछे से आवाज़ आई।
"रवि! रवि, जल्दी आ!"
लुट्टन की आवाज़ थी। फटी हुई, हाँफती हुई। रवि कुछ सोचे बिना भागा। केतली चूल्हे पर रह गई, दरवाज़ा खुला रह गया, और सफ़ेद सूट वाला आदमी गाड़ी में बैठा यही देखता रहा।
कोठरी का दरवाज़ा खुला था। सीता देवी ज़मीन पर पड़ी थीं। उनकी सफ़ेद साड़ी बिखरी हुई थी, एक हाथ फ़र्श पर, दूसरा सीने पर। रामायण की किताब दूर खुली पड़ी थी, पन्ने मुड़े हुए। और पानी का गिलास लुढ़ककर दीवार से जा टकराया था — छन्!
रवि घुटनों पर बैठ गया। उसने माँ को गोद में उठाया। उनका चेहरा पसीने से भीगा था, होंठ सूखे, और आँखें आधी बंद।
"माँ!" उसकी आवाज़ फट गई। "माँ, आँख खोलो।"
सीता देवी की पलकें थोड़ी हिलीं। "रवि…" उन्होंने धीरे से कहा, "पानी…"
"ला रहा हूँ!" रवि पलटा। "लुट्टन, डॉक्टर को फ़ोन कर! जल्दी!"
लुट्टन ने अपना पुराना मोबाइल निकाला, स्क्रीन पर उँगली चलाई, और उसका चेहरा उतर गया।
"यार, मेरा बैलेंस ख़त्म है," उसने हकलाते हुए कहा। "कल ही डालना था, भूल गया।"
रवि ने अपना फ़ोन जेब से निकालकर उसकी तरफ़ फेंका। लुट्टन ने लपका।
"गली के नुक्कड़ वाले डॉक्टर साहब को।" रवि अपनी माँ का सिर अपने घुटने पर रख रहा था और उसके हाथ काँप रहे थे। उसकी आवाज़ धीमी और ठंडी हो गई थी, जैसी हमेशा गुस्से में हो जाती थी। "बोलो, जल्दी आने को बोलो।"
लुट्टन बाहर भागा। उसकी चप्पलें फ़र्श पर चटाक-चटाक कर रही थीं।
कोठरी में सन्नाटा। बाहर केतली अब भी सीटी बजा रही थी, पानी सूखने लगा था, और उसकी आवाज़ दीवारों से टकरा रही थी।
रवि ने अपनी माँ का चेहरा हथेली में लिया। "माँ, सुनो। मैं हूँ। रवि। आँख खोलो।"
सीता देवी की आँखें खुलीं। धुँधली, पर खुलीं। उन्होंने रवि का चेहरा देखा और होंठों पर एक कमज़ोर हँसी आई।
"तू रो रहा है?" उन्होंने फुसफुसाकर पूछा।
"नहीं," रवि ने आँखें पोंछते हुए कहा। "मुझे क्यों रोना आएगा?"
"तेरे पापा भी झूठ बोलते थे," माँ ने कहा। "बिलकुल ऐसे ही।"
रवि का गला भर आया। उसने माँ का सिर अपने सीने से लगा लिया और दरवाज़े की तरफ़ देखा। बाहर गली से आवाज़ आई — चप्पलों की चटाक-चटाक, और एक बूढ़ी खाँसी।
डॉक्टर आए। साठ के ऊपर के बूढ़े, झुकी कमर, हाथ में काला बैग जिसका हैंडल टेप से लिपटा हुआ था। उन्होंने पहले जूते उतारे, फिर अंदर आए, फिर बिना कुछ पूछे माँ की कलाई पकड़ी।
"शुगर?" उन्होंने पूछा।
"हाँ," रवि ने कहा। "इंसुलिन… शीशी ख़त्म हो गई थी।"
डॉक्टर ने बैग से एक छोटी मशीन निकाली। सुई चुभोई, मशीन में देखा, और उनका चेहरा कस गया।
"बेटा, शुगर बहुत ज़्यादा है।" उन्होंने मशीन रवि की तरफ़ घुमाई। "इंसुलिन दो दिन से नहीं लगी है क्या?"
रवि ने कुछ नहीं कहा। बस सिर नीचा कर लिया।
"अभी इंजेक्शन नहीं मिलेगा तो हालत ख़राब हो सकती है। बेहोशी बढ़ेगी, फिर…" डॉक्टर ने बात अधूरी छोड़ दी। फिर बैग बंद करते हुए बोले, "एक बात और सुन लो। इंसुलिन के लिए तीन हज़ार दो सौ रुपये लगेंगे। एक महीने की खुराक। और ये सिर्फ़ शुरुआत है।"
तीन हज़ार दो सौ।
रवि ने जेब में हाथ डाला। उसकी उँगलियों ने उन्हीं चार सौ बीस रुपये को छुआ। वो काग़ज़ की मुड़ी हुई गड्डी थी। एक सिक्का भी नहीं बढ़ा था।
उसने हाथ जेब में ही रखा और दीवार की तरफ़ देखा। माँ चारपाई पर पड़ी थीं, साँस धीमी। कोठरी में पीली रोशनी थी, दीवार पर पापा की तस्वीर, और उसके नीचे छोटा दीया — जो माँ ने सुबह जलाया था, वो अब भी जल रहा था।
लुट्टन दरवाज़े पर खड़ा था। वो धीरे से अंदर आया। रवि के पास रुका, और बिना कुछ कहे अपनी मैली बनियान की जेब से एक छोटी गठरी निकाली।
उसने रवि का हाथ पकड़ा और गठरी उसमें रख दी।
रवि ने देखा। गठरी खोली। अंदर पुराने नोट थे — दो हज़ार। कुछ मुड़े हुए, कुछ पर पान की हल्की लाली।
"लुट्टन…"
"ये मेरी बहन की शादी के लिए जोड़ रहा था," लुट्टन ने तेज़ी से कहा, आँखें नीची किए हुए। "पर अभी तू ज़्यादा ज़रूरी है। मेरी बहन रुक जाएगी, तेरी माँ नहीं रुकेगी।"
रवि उसकी तरफ़ देखता रह गया। आँखें भर आईं, पर आँसू नहीं आए। गला इतना भर गया था कि आवाज़ नहीं निकल रही थी।
"तेरे पापा भी मुझे भूल गए हैं," रवि ने धीरे से कहा।
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