Billionaire Empire System20 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 20

7 min read November 7, 2026

"मेरे अब्बू की डायरी में।" कोमल ने सिर हिलाया। "पर ये काग़ज़ उनका नहीं है। ये उनकी डायरी के अंदर सिला हुआ था, दो पन्नों के बीच। मुझे आज सुबह मिला, जब मैं अब्बू का बुख़ार देखने उनके पास गई। मैंने मुश्ताक़ को बता दिया कि मेरे पास कुछ है।"

रवि का हाथ कॉपी पर कस गया। "क्यों बताया?"

"क्योंकि मैं डर गई थी।" कोमल की आँखें भर आईं। "मैं दो नावों पर पैर रखे खड़ी थी। एक तरफ़ अब्बू की जान, दूसरी तरफ़ इरा मैडम। मैंने सोचा, मुश्ताक़ को ये देकर मैं दोनों को बचा लूँगी।" उसने अपनी उँगली से आँसू पोंछा, ज़ोर से, जैसे गुस्से में। "सुबह मैंने मुश्ताक़ को फ़ोन किया। उसने कहा कॉपी लेकर शाम को आ जाओ। फिर मैंने इरा मैडम को फ़ोन किया… और वो बंद था।"

रवि ने आँखें बंद कर लीं।

क़ासिम भाई की बात याद आई — सच पहले अंदर चुभता है, फिर बाहर घाव देता है। और सिस्टम ने कल रात साफ़ कहा था — रात में आने वालों से दुकान बचाओ। उसने दुकान बचा ली। इरा को नहीं बचाया।

"तुमने मुश्ताक़ को ये कॉपी दिखाई?" रवि ने पूछा।

"नहीं। फ़ोन पर सिर्फ़ बात हुई। कॉपी मेरे पास है, उनके पास नहीं।"

"तो अब मत देना।" रवि ने कॉपी लुट्टन की तरफ़ बढ़ा दी। लुट्टन ने उसे अपनी मैली बनियान के अंदर, कमर पर खोंस लिया। "और तुम चैनल जाओ। अगर वहाँ कोई तुमसे कुछ पूछे, तो कहना — कॉपी जल गई थी।"

कोमल ने उसे देखा, जैसे किसी ऐसे आदमी को देख रही हो जिसे वो समझ नहीं पा रही। "तुम इरा मैडम को ढूँढने जा रहे हो? अकेले?"

"मेरे पास एक आदमी है।" रवि ने लुट्टन की तरफ़ देखा। "और एक चीज़ है जो बोलती है।"

कोमल की नज़र रवि की जेब पर गई, जहाँ से घड़ी का काला किनारा झाँक रहा था। उसने कुछ पूछने की कोशिश की, फिर चुप हो गई। "अगर तुम उसे ढूँढ लो…" उसकी आवाज़ भर्राई, "…तो उससे कहना कि कोमल ने कॉपी नहीं दी। कहना कि कोमल ने कॉपी बचा ली।"

रवि ने सिर हिलाया। "तुम जाओ।"

कोमल स्कूटी की तरफ़ बढ़ी, फिर रुकी। "रवि। चैनल के बॉस — नरेश बंसल। वो इरा मैडम को भी 'बिज़नेस' कहता है। मत जाना उसके पास। वो आदमी किसी का नहीं है।"

स्कूटी की आवाज़ दूर हो गई।

लुट्टन ने बनियान के अंदर से कॉपी निकाली और उसे देखा, जैसे पहली बार देख रहा हो। "यार रवि…" उसने शुरू किया, फिर रुक गया। कोई कहावत नहीं आई। कोई मज़ाक नहीं आया।

रवि ने उसकी तरफ़ देखा। "आज तेरी लॉटरी का टिकट मत लेना।"

लुट्टन ने उसे देखा।

"आज मेरे साथ चल।"

लुट्टन कुछ देर चुप खड़ा रहा। फिर उसने रवि की आँखों में देखा — और वो ठंडा गुस्सा देखा जो वो पिछले दस साल में कभी नहीं देख पाया था। न चीख, न गाली, न आवाज़। बस एक सपाट, ठंडी चुप्पी, जो किसी और की चुप्पी नहीं थी।

लुट्टन ने अपनी जेब से पान निकाला, उसे खाया नहीं। उसे काउंटर पर उलटा रख दिया। फिर वो अपने लॉटरी के टिकटों का ढेर उठाकर दराज़ में डालने लगा — धीरे-धीरे, एक-एक करके, जैसे कोई पूजा कर रहा हो।

"दस साल से मैं हर हफ़्ते ये टिकट खरीदता हूँ," वो बिना रुके बोला। "पाँच-पाँच रुपये। सोचता हूँ, एक दिन निकलेगा, और मैं तुझे बोलूँगा — साले, अब मैं तेरी चाय नहीं पिऊँगा, मैं अपनी चाय खुद बनाऊँगा।" उसने दराज़ बंद की। फिर अपनी मैली बनियान उतारी और उसे झाड़ा, दो बार, ज़ोर से। "आज नहीं खरीदूँगा।"

अचानक रवि की आँखें जलने लगीं। उसने तेज़ी से मुँह फेर लिया। लुट्टन को ये नहीं देखना चाहिए था। पर लुट्टन ने देख लिया — और उसने कुछ कहा भी नहीं। बस अपनी बनियान पहनकर दुकान की चाबी उठाई।

"चल," वो बोला। "तेरी स्कूटी पर। और रास्ते में चाय नहीं पीयेंगे, बता देता हूँ। आज सुबह से मुझे भी कुछ अच्छा नहीं लग रहा।"

और यही वो पल था — दस साल की दोस्ती में पहली बार लुट्टन ने रवि से कोई सवाल नहीं पूछा। न कहाँ जाना है, न क्यों जाना है। बस चुपचाप बनियान पहनी और पीछे चल दिया। रवि को लगा कि उसके सीने में जो ठंडा गुस्सा जमा था, उसके ऊपर एक गरम चादर रख दी गई हो।

रास्ते में लुट्टन ने अपना फ़ोन निकाला और कुछ लिखा। रवि ने पूछा नहीं। लुट्टन ने खुद बोला, "अपनी बहन को मैसेज किया है कि आज रात घर देर से पहुँचूँगा।" उसने फ़ोन जेब में रखा। "वो डर जाती है।"

चैनल का दफ़्तर "ख़ान साहब की मस्जिद" के चौक पर था — एक पुरानी इमारत की पहली मंज़िल, जिसके नीचे एक लोहे की दुकान थी। दुकान पर ताले लगे थे। सीढ़ियाँ धीरे-धीरे उतरती हुई ऊपर जाती थीं, दीवार पर नीली-हरी पुताई उखड़ी हुई, और हर मोड़ पर एक ट्यूबलाइट जो चमकने से पहले तीन बार बड़बड़ाती थी।

ऊपर शटर पर ताला लगा था। एक हल्का-सा ताला, जैसे कोई सस्ती सुरक्षा।

रवि ने शटर पर हाथ रखा — ठंडा। उसने कोई आवाज़ नहीं की। लुट्टन ने पीछे से फुसफुसाया, "ये ताला बाहर से लगा है, अंदर से नहीं। मतलब कोई लास्ट में गया है और बाहर से बंद कर गया।"

रवि ने बगल की दीवार पर नज़र डाली। वहाँ नीले स्प्रे से कुछ लिखा था। अक्षर टेढ़े थे, पर साफ़ पढ़े जा सकते थे —

"हमारे यहाँ दाल-भात नहीं मिलता। यहाँ ख़बरें बनती हैं।"

लुट्टन ने धीरे से कहा, "ये किसने लिखा?"

"जिसने ताला लगाया।" रवि ने अपनी जेब से घड़ी निकाली।

घड़ी की सुइयाँ अभी भी रुकी थीं — उसी रात पर जब रवि के पापा चले गए थे। रवि ने उसे हथेली में रखा और धीरे से बोला, "इरा कहाँ है?"

कुछ नहीं हुआ। घड़ी की सुइयाँ चुप रहीं।

"बोल," रवि ने और धीरे कहा। "मेरे पास तेरी सुनने की आदत है। अब तू भी मेरी सुन। इरा कहाँ है?"

घड़ी का काँच कुछ पल के लिए धुँधला हुआ, और फिर एक आवाज़ आई — वो छोटी, चटपटी आवाज़ जो रवि अब पहचानने लगा था। पर इस बार उसमें एक अलग ठंडक थी।

"सिस्टम में खरीदने के लिए हैं — 'किसी की जगह बताने वाला नक्शा।' कीमत: एक हज़ार दो सौ पॉइंट। तुम्हारे पास बचे हैं चार सौ पॉइंट।"

रवि की उँगलियाँ कस गईं। "एक हज़ार दो सौ?" उसकी आवाज़ फट गई। "उसकी जान का सवाल है और तू पॉइंट गिन रहा है?"

"सिस्टम मुफ़्त में कुछ नहीं देता।" आवाज़ बिलकुल सपाट थी। "याद रखो — सिस्टम सिर्फ़ मदद के बदले मदद देता है।"

लुट्टन ने घड़ी की तरफ़ देखा। "ये बात कर रही है क्या?" उसने थोड़ा झुककर घड़ी के करीब आकर सुना। "उसने तुझे क्या बोला?"

"कुछ नहीं," रवि ने कहा। "बोली कि मेरे पास कम पड़ रहा है।" उसने घड़ी जेब में रखी।

"तो अब?"

"अब वो रास्ता जो पैसे नहीं मांगता।" रवि ने शटर पर हाथ रखा और सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा। "दादी कम्मो। वो इलाक़े की हर गाड़ी, हर आदमी, हर फ़ेरा जानती हैं। चल।"

वो मुड़े ही थे कि पीछे से एक आवाज़ आई — बूढ़ी, खुरदरी, जिसमें पान चबाने की आवाज़ घुली थी।

"अरे रे रे… तू इरा बेटी को ढूँढ रहा है?"

दोनों घूमे।

दादी कम्मो सीढ़ियों के नीचे खड़ी थीं। छड़ी एक हाथ में, दूसरे में चाय का कुल्हाड़ — भाप उठ रही थी, और उनके होंठों पर पान की लाली चमक रही थी। उनकी आँखें झुर्रियों में धँसी थीं, पर उन दोनों में एक ऐसी चमक थी जो अस्सी साल के बाद भी झूठ नहीं बोलती।

रवि ने एक कदम आगे बढ़ा। "दादी, आप यहाँ?"

"मैं हर जगह हूँ, बेटा।" दादी ने कुल्हड़ से चाय की चुस्की ली। "तू मुझे सुबह अपने घर छोड़ने आया था ना। तेरी दुकान से निकलकर मैं सीधी यहाँ आई। क्योंकि मुझे पता था — तू यहीं आएगा।"

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