Billionaire Empire System – Chapter 21
दादी ने सीढ़ियाँ चढ़नी शुरू कीं, एक-एक पायदान, छड़ी की टप-टप के साथ। लुट्टन ने हाथ बढ़ाया, पर उन्होंने हाथ नहीं पकड़ा। "मैं अभी इतनी बूढ़ी नहीं हुई," वो बड़बड़ाईं।
वो शटर के सामने पहुँचीं और एक पल उसे देखा। फिर उन्होंने अपनी जेब से एक चाबी निकाली और रवि की तरफ़ बढ़ा दी।
रवि ने चाबी देखी। "ये?"
"इरा बेटी की चाबी।" दादी ने कुल्हड़ नीचे रखा। "वो रोज़ सुबह यहाँ आती थी, सात बजे, दफ़्तर खोलने से पहले। कभी-कभी मुझे नीचे दुकान वाले की बेंच पर बैठा देती थी, और कहती — 'दादी, आपकी चाय ठंडी हो गई, ये लो गरम।' कल रात भी वो यहाँ आई थी।"
रवि का हाथ चाबी पर कसा। "कब?"
"रात को नौ बजे के आसपास।" दादी ने रवि की आँखों में देखा। "और मैं नीचे की दुकान की बेंच पर बैठी थी, क्योंकि मेरे घुटने दुख रहे थे और रास्ते में लालटेन लेकर नहीं जाना था। तो मैंने सब देखा।"
सन्नाटा छा गया। लुट्टन ने साँस रोक ली।
"क्या देखा, दादी?" रवि की आवाज़ बहुत धीमी थी।
दादी ने चाय का आख़िरी घूँट लिया, और कुल्हड़ बेंच पर रख दिया। उनके चेहरे की झुर्रियाँ और गहरी हो गईं।
"इरा बेटी ऊपर गई। बीस मिनट रही। फिर उतरी — हाथ में एक थैला था, काले रंग का। वो सीढ़ियों पर रुकी और मुझे देखकर मुस्कुराई। कहा — 'दादी, आज बहुत बड़ी ख़बर लगी है।'" दादी की आवाज़ में पहली बार हिचक आई।
"फिर?" रवि ने कहा।
"फिर वो सड़क की तरफ़ बढ़ी। तभी सफ़ेद गाड़ी आई।" दादी ने अपनी छड़ी उठाई और हवा में एक सीधी लकीर खींची, जैसे गाड़ी का आना दिखा रही हों। "चमकदार। बिना आवाज़ के आई। दो आदमी उतरे। एक ने इरा बेटी का हाथ पकड़ा, बोला कुछ। इरा बेटी ने थैला सीने से लगाया और चीखी — 'मेरी कॉपी छोड़ो!'"
रवि का दिल ज़ोर से धड़का। "कॉपी?"
"हाँ, बेटा। कॉपी।" दादी की आवाज़ अब बहुत धीमी थी, और उनकी आँखें एक पल के लिए नीची हुईं। "और मैं… मैं कुछ नहीं कर पाई। बस बेंच से उठी, छड़ी उठाई, और चीखने लगी — 'हो गया! हो गया! किसी को बुलाओ!'" उनका हाथ काँपा। "पर चौक खाली था, बेटा। लोहे की दुकान बंद। कोई नहीं आया।"
रवि के हाथ से चाबी फिसल गई और धातु की सीढ़ी पर टन-टन करके उतरती चली गई।
"वो गाड़ी?" रवि ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडा गुस्सा अब बाहर आ रहा था। "किस तरफ़ गई?"
"उसी तरफ़ जिधर सारी बड़ी गाड़ियाँ जाती हैं।" दादी ने छड़ी से पूरब की तरफ़ इशारा किया। "टावर की तरफ़।"
लुट्टन ने अपने होंठ खोले, फिर बंद कर लिए।
रवि ने झुककर चाबी उठाई। वो शटर का ताला खोलने लगा। "दादी, आप घर जाइए। लुट्टन, तू दादी को —"
"नहीं।" दादी ने छड़ी ज़ोर से सीढ़ी पर मारी। टक! "मैं घर नहीं जाऊँगी।" उनकी आवाज़ में कुछ और था — डर नहीं, कुछ और। जैसे पुराना गुस्सा। "मैंने तेरे पापा को जवानी में देखा है, रवि। मैंने देखा है कैसे चुपचाप उस शहर में सच बोलने वाले लोगों को क्या होता है।" उन्होंने कुल्हड़ उठाया। "इरा बेटी भी उनमें से एक है।"
रवि ने शटर खोला। अंदर अंधेरा था — ट्यूबलाइट बंद थी। फ़र्श पर काग़ज़ बिखरे थे। एक कुर्सी उलटी पड़ी थी। और कमरे के बीच में, टेबल पर, एक पुराना लैपटॉप था — बंद। उसके ऊपर एक काग़ज़ का टुकड़ा रखा था।
रवि ने काग़ज़ उठाया।
उस पर स्याही से लिखा था — "चाय वाले को बता देना। घड़ी वाला सवाल अब उससे पूछा जाएगा।"
रवि के हाथ नहीं काँपे। उसने काग़ज़ मोड़ा और जेब में रखा। फिर वो पलटा।
"दादी," उसने कहा, "उस गाड़ी में कौन बैठा था?"
दादी कम्मो ने छड़ी टेकी और मुड़ गईं, जैसे जाने लगी हों। उनके होंठों पर वो पुरानी कहावत आई, पर इस बार वो पूरी नहीं बोलीं। वो आधी सीढ़ी पर रुकीं और बिना पलटे बोलीं —
"मैंने तो बस गाड़ी देखी थी, बेटा। अंदर कौन बैठा था — ये नहीं पूछा तो जवाब क्या दूँ?" वो एक पायदान और उतरीं। "पर इतना जानती हूँ — जिस आदमी की गाड़ी थी, उसकी खिड़की से जो हाथ बाहर आया था, उसकी उँगली पर एक मोटी सोने की अंगूठी थी।" उन्होंने रुककर साँस ली। "और उस उँगली में… एक पुरानी सफ़ेद स्याही का निशान था। उस आदमी ने कभी रंगोली बनाई होगी, बेटा। बहुत साल पहले।"
रवि और लुट्टन दोनों सीढ़ियों पर खड़े रह गए।
सफ़ेद कुर्ता। सोने की अंगूठी। सफ़ेद स्याही का निशान।
बलवंत राय।
रवि ने घड़ी जेब से निकाली। उसके हाथ अब भी नहीं काँप रहे थे। उसने घड़ी को अपने होंठों के पास लाया, जैसे कोई दुआ पढ़ रहा हो।
"अब तू मुझसे कुछ मत माँगना," उसने धीरे से कहा। "अब मैं तुझसे माँगूँगा। और तू देगी।"
घड़ी के काँच में एक पीली रोशनी एक पल के लिए चमकी, फिर बुझ गई।
लुट्टन ने धीरे से कहा, "रवि, अगर वो सच में बलवंत की गाड़ी थी… तो ये…" उसकी आवाज़ रुक गई।
"तो ये अब मेरी लड़ाई नहीं रही।" रवि ने घड़ी जेब में रखी और सीढ़ियों से नीचे देखा। "अब ये हिसाब है।"
नीचे दादी कम्मो चौक पार कर रही थीं, छड़ी की टप-टप गूँज रही थी।
रवि ने घड़ी जेब में रखी और सीढ़ी से नीचे उतरने लगा। आधे रास्ते पर उसका पैर रुका।
"लुट्टन।" उसने पलटकर देखा। "तू मेरे साथ चल रहा है। क्यों?"
लुट्टन ने कंधे उचकाए। "पता नहीं। बस… तेरा चेहरा देखकर डर लगा। ऐसा चेहरा मैंने किसी का नहीं देखा।"
"अगर बलवंत का आदमी तुझे पहचान ले, तो तेरे पापा का इलाज बंद हो जाएगा।"
लुट्टन ने जेब से पान की पुड़िया निकाली, देखी, फिर वापस रख दी — पहली बार उसने पान नहीं खाया। "तो बंद हो जाएगा। पर अगर मैं आज तेरे साथ नहीं चला, तो कल तेरे साथ खड़ा होने का हक़ भी नहीं रहेगा।" उसने आँखें नीची रखीं। "मेरे पापा मरेंगे तो मरेंगे, पर मेरा दोस्त ज़िंदा रहेगा।"
रवि कुछ नहीं बोला। उसने सिर्फ़ लुट्टन का कंधा पकड़ा और एक पल के लिए दबाया। सीढ़ी के नीचे से हवा का एक झोंका आया, जिसमें गीली सीमेंट और टूटे काग़ज़ों की गंध थी।
दरवाज़े पर पहुँचकर रवि रुका। उसने काग़ज़ का टुकड़ा फिर से खोला। स्याही सूखी थी, पर किनारे अभी भी गीले थे — किसी ने ये जल्दी में लिखा था। हाथ काँप रहा था। लिखने वाला भी डरा हुआ था।
"ये इरा का हाथ नहीं है," रवि ने कहा। "इरा की लिखाई उस रिपोर्ट पर देखी थी, जो उसने माँ को दी थी। उसके अक्षर गोल होते हैं। ये अक्षर नुकीले हैं।"
"तो किसने लिखा?"
"जो अंदर था। जिसने उसे ले जाते देखा और छुपकर बैठा रहा।" रवि ने काग़ज़ जेब में रखा। "कोई अंदर ही था। कोई जो जानता था कि मैं आऊँगा।"
बाहर निकलते ही रवि ने कोमल को देखा। वो सड़क के उस पार, एक पेड़ के नीचे खड़ी थी, दोनों हाथ से अपना बैग पकड़े। उसने दूर से ही देखा कि रवि के हाथ में चाबी है और शटर खुला है। वो भागकर आई।
"अंदर क्या है?" उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "इरा?"
"इरा यहाँ नहीं है।" रवि ने सीधे उसकी आँखों में देखा। "कोमल, तू अब भी मुझसे कुछ छिपा रही है। तेरे हाथ काँप रहे हैं।"
कोमल ने अपने हाथ बैग के पीछे छिपा दिए। "मैंने तुम्हें सब बता दिया।"
"नहीं।" रवि की आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो लुट्टन ने देखी थी। "तूने बताया कि इरा कल रात रिकॉर्डिंग लेकर गई थी। पर इरा को इतनी रात कौन बुलाता है? उसने किसी से मिलने का वक़्त लिया था। किससे?"
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