Billionaire Empire System19 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 19

7 min read November 7, 2026

"कहा — 'साहब तुम्हें याद कर रहे हैं।'" लुट्टन ने नीचे देखा। "फिर उसने उसे बाइक पर बिठाया। मुन्ना भाई कुछ बोल नहीं रहे थे। बस जा रहे थे, जैसे उन्हें पता था कि ये दिन आएगा। मैं कुछ करता, तब तक बाइक निकल गई। रवि, मैं… मैं डर गया। मैं बाहर निकला ही नहीं।"

रवि ने उसकी बात सुनी। फिर वो धीरे से बेंच पर बैठ गया। उसने जेब से माला निकाली और उसे देखने लगा।

लुट्टन ने माला देखी और उसका चेहरा उतर गया। "ये तो मुन्ना भाई की…"

"पीछे की गली में पड़ी थी।" रवि की आवाज़ धीमी थी। "बाइक के निशान भी थे। और ये।" उसने रुमाल में लिपटा फटा काग़ज़ निकाला। "किसी ने इसे जान-बूझकर छोड़ा है या गिर गया। इसमें सेवा सदन का नाम है।"

लुट्टन ने काग़ज़ देखा, फिर रवि की तरफ़। "रवि, मैं तुझे एक बात कहूँ? ये सब… ये सब बहुत बड़ा है। तेरे पापा गए, मेरे पापा… नहीं, मेरे पापा तो कुछ थे ही नहीं। पर तू… तू एक चाय वाला है। तेरे पास घड़ी है, कुछ आवाज़ें हैं, ठीक है। पर बलवंत के आदमी मुन्ना भाई को उठा ले गए। तू क्या करेगा?"

रवि ने माला को अपनी हथेली में कसकर पकड़ा। दाने उसकी उँगलियों में चुभे।

"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "पर जो मेरे पास आता है, वो गायब हो जाता है। पहले पापा। फिर वो डॉक्टर… फिर रघुवीर हवलदार का डर… और अब मुन्ना भाई।"

"तो तू रुक जा।" लुट्टन उसके सामने झुक गया। "प्लीज, रवि। मैं तेरा दोस्त हूँ, तेरे साथ रहूँगा, पर रुक जा। तेरी माँ है। पिंकी है। तू भी गायब हो गया तो उनका क्या होगा?"

रवि ने माला को देखा, फिर लुट्टन के डरे चेहरे को। और उस पल उसे कुछ समझ आया — जो वो पिछले कुछ दिनों से महसूस कर रहा था, पर शब्दों में नहीं बदल पा रहा था।

वो अकेला नहीं था। और यही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी थी।

"लुट्टन," उसने धीरे से कहा, "तूने सही कहा। मैं चाय वाला हूँ। पर मेरे पापा भी चाय वाले थे, और वो भी किसी के लिए नहीं रुके थे।" उसने माला उठाई। "ये माला उसने पहनी है। इसे उसी के गले में वापस लगानी है।"

लुट्टन उसकी आँखों में देखता रहा। फिर उसने गहरी साँस ली और अपनी बनियान ठीक की। "भगवान भी मुझे भूल गया है," उसने बुदबुदाया, "पर तू भूला हुआ नहीं है। बता, क्या करना है?"

रवि मुस्कुराया नहीं। पर उसकी आँखों में कुछ जम गया था। "पहले ये पता करना है कि सेवा सदन की तिजोरी कहाँ है। काग़ज़ फटा है, पर नंबर का पहला हिस्सा दिख रहा है। इसे क़ासिम भाई के पास लेकर जाना है।"

"वो कौन?"

"वो जिसने दादी से कहा था कि घड़ी पापा को दी गई थी।" रवि उठा। "श्मशान के पीछे झोपड़ी है उसकी।"

लुट्टन ने घड़ी की तरफ़ देखा, जो रवि की जेब से आधी झाँक रही थी। "वो चीज़ फिर बोली?"

"बोली।" रवि ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। "कह रही थी कि जो मुँह माँगी नहीं मिलती, वो वक़्त आने पर मिलती है।" उसने लुट्टन की तरफ़ मुड़कर देखा। "मुझे लगता है, वक़्त आ गया है।"

तभी दुकान के सामने एक स्कूटी की ब्रेक चरमराई।

दोनों ने बाहर देखा। स्कूटी पर एक लड़की थी — इरा नहीं। उम्र पच्चीस के आसपास, गोल चेहरा, मुँह में च्युइंग गम, हाथ में मोबाइल और बगल में कुछ दबाए हुए। उसने हेलमेट उतारा, स्कूटी का स्टैंड लगाया और सीधे अंदर आ गई, जैसे यहाँ आना उसका रोज़ का काम हो।

"तुम रवि हो?" उसने पूछा, बिना नमस्ते किए।

"कौन हो तुम?"

लड़की ने अपने हाथ में दबी चीज़ आगे बढ़ाई। रवि का दिल एक बार ज़ोर से धड़का। वो उसके पापा की आधी जली कॉपी थी — वही कॉपी जो कल उसके हाथ में थी, वही काग़ज़, वही जला हुआ किनारा।

"ये मुझे मेरे पापा की डायरी के अंदर मिली है," लड़की ने कहा। "तुम्हारे पापा ने हमारे पापा को कुछ दिया था। कुछ ऐसा जो अब तक छिपा था।"

रवि ने कॉपी ली। उँगली जले किनारे पर फिसली। उसने ऊपर देखा।

"तुम्हारे पापा कौन हैं?"

लड़की ने च्युइंग गम चबाना बंद किया। उसकी आँखों में वो डर था जो झूठ नहीं बोलता।

"मैं इरा की सहकर्मी हूँ। चैनल पर काम करती हूँ।" उसने हाथ आगे बढ़ाया। "मेरा नाम कोमल है। और रवि… इरा कल रात से गायब है। उसका फ़ोन बंद है।"

रवि की उँगलियों से कॉपी फिसलते-फिसलते बची। लुट्टन ने उसे पकड़ लिया।

कोमल ने रवि की आँखों में देखा। "मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगी। मुझे पता है इरा किस चक्कर में पड़ी थी। और मुझे ये भी पता है कि जो काग़ज़ उसके पास थे, वो उसे किसने दिए थे — उसी आदमी ने जिसके नाम से तुम्हारे पापा डरते थे।"

रवि ने एक गहरी साँस ली। जेब में मुन्ना भाई की माला थी, हाथ में पापा की जली कॉपी, और सामने एक ऐसी लड़की जो कह रही थी कि इरा गायब है।

घड़ी उसकी जेब में ठंडी हो गई, जैसे किसी ने उसे छू दिया हो।

और रवि को पता था — अब रुकने का वक़्त नहीं था।

॥

"इरा कल रात से गायब है।"

कोमल ने ये लाइन दोबारा कही, जैसे पहली बार रवि ने सुनी ही न हो। उसके हाथ में वो आधी जली कॉपी थी, और उँगलियाँ उसके जले किनारे को बार-बार सहला रही थीं, जैसे काग़ज़ को सहलाने से कोई ज़िंदा हो जाएगा।

रवि को अपनी आवाज़ अपनी नहीं लगी। "कब से?"

"रात नौ बजे के बाद। वो चैनल पर रिकॉर्डिंग लेकर गई थी। मुझे उसका आख़िरी मैसेज आया था — 'अगर सुबह तक मैं न आऊँ, तो रवि को बता देना।'" कोमल ने च्युइंग गम चबाया, फिर चबाना छोड़ दिया। "फोन बंद है। घर नहीं गई। मैंने उसकी माँ को भी नहीं बताया, रोती रहेंगी।"

लुट्टन ने पीछे से पूछा, "तुम कौन हो, बहन? सीधे आकर इतना बड़ा बम फोड़ दिया?"

"चैनल पर काम करती हूँ। इरा मैडम के साथ।" कोमल ने कॉपी रवि के हाथ में रख दी। "और मैं तुमसे झूठ बोलूँगी, तो काम नहीं चलेगा। इरा मैडम ने मुझे यहाँ नहीं भेजा। मैं खुद आई हूँ।"

रवि ने उसकी तरफ़ देखा। कोमल की आँखें एक पल के लिए नीचे गईं, फिर उठीं — और उसी पल रवि को पता चल गया कि ये लड़की डर में खड़ी है, झूठ में नहीं।

"बोलो," रवि ने कहा। आवाज़ धीमी थी।

कोमल ने स्कूटी की चाबी जेब में डाली, जैसे अपने हाथ को कुछ करने की जगह दे रही हो। "मेरे अब्बू बीमार हैं। किडनी। महीने में एक इंजेक्शन, दो हज़ार चार सौ रुपये। मेरी तनख्वाह बारह हज़ार है, रवि। चैनल छोटा है, तनख्वाह देर से आती है।" उसने गला साफ़ किया। "छह महीने पहले एक आदमी चैनल पर आया था — मुश्ताक़। बोला, तुम्हारे अब्बू का इलाज हम करेंगे। बदले में एक ही काम — इरा मैडम की हर बात, हर फ़ाइल, हर काग़ज़, सब हमें बताना।"

लुट्टन की दुकान से आती पान की महक भी रुक गई, ऐसा लगा।

"मैंने कहा नहीं," कोमल ने तेज़ी से कहा, जैसे कोई इल्ज़ाम धो रही हो। "मैंने साफ़ मना कर दिया था। पर फिर अब्बू की तबीयत बिगड़ी, अस्पताल वाले बोले पैसे लाओ, तो मैंने…" उसकी आवाज़ टूटी। "मैंने हाँ कह दी। मैं उन्हें बताती रही कि इरा मैडम कहाँ जाती हैं। पर इरा मैडम कभी कुछ बताती नहीं थीं, समझ रहे हो? वो अपना काम चुपचाप करती थीं। तो मैंने सिर्फ़ एक चीज़ दी — ये कॉपी।"

रवि ने हाथ में जली कॉपी देखी। "ये तुमने अपने अब्बू की डायरी में पाई?"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho