Billionaire Empire System18 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 18

7 min read November 7, 2026

रवि ने उनकी तरफ़ देखा। "तो माँ, आप उन्हें रघु क्यों बुला रही थीं? इतने सालों बाद?"

माँ ने उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो रवि ने पहले नहीं देखा — जैसे कोई डर जो सोया नहीं, बस आँखें बंद किए लेटा था। "रवि," उन्होंने धीरे से कहा, "नींद में इंसान अपने सबसे पुराने घर लौट जाता है। मैं शायद उसी में लौट गई थी।"

वो उठीं और बर्तन धोने लगीं। रवि को पता था कि बात यहीं खत्म हो गई। पर उसके अंदर एक तीली सी जल गई थी। पापा का दो नाम थे। एक नाम जो दुनिया जानती थी, और एक जो सिर्फ़ घर जानता था।

दिन ढलने लगा। रवि ने दुकान खोली। ग्राहक आधे ही आए। दो लोगों ने दूर से देखकर मुँह फेर लिया। कोई कुछ कहता नहीं था, पर ख़ामोशी में सब कहा जा रहा था। "उस लड़के के पीछे मुश्ताक़ भाई पड़ गए हैं। अब क्या रहेगा इसका?"

लुट्टन दोपहर भर अपनी दुकान पर ही बैठा रहा। एक भी पान नहीं बेचा। दो बजे वो रवि की दुकान पर आया, बिना बोले एक बेंच पर बैठ गया, और देर तक अपने पान के पत्ते चबाता रहा।

फिर लुट्टन ने हल्की आवाज़ में कहा, "रवि, मुझे एक बात कहनी है।" उसने आसपास देखा, फिर कुर्सी खींचकर पास आया। "दस साल पहले, जिस रात तेरे पापा… जिस रात वो नहीं रहे, उस रात मैंने अपनी दुकान पर एक आदमी को फ़ोन पर बात करते सुना था। पर उस वक़्त मैं बारह साल का था। डर गया था। आज तक किसी को नहीं बताया।"

रवि ने उसकी तरफ़ देखा। "क्या सुना था?"

"कुछ साफ़ नहीं था। पर एक लाइन थी — 'साहब कह रहे हैं, अंदर का आदमी बहुत बोल रहा है।'" लुट्टन ने पान चबाना बंद कर दिया। "मुझे आज तक समझ नहीं आया कि अंदर का आदमी कौन था। पर कल जब मुश्ताक़ आया, और उसने ये बात कही कि 'अमानत लौटा दो' — मुझे वो लाइन याद आ गई। रवि, कहीं तेरे पापा को इसीलिए नहीं…"

वो वाक्य पूरा नहीं कर पाया। रवि ने उसका हाथ पकड़ा। "लुट्टन, तूने आज तक क्यों नहीं बताया?"

"डर था यार।" लुट्टन की आँखें छत की तरफ़ गईं। "मैं क्या करता? मैं एक पान वाला हूँ। मेरे पास ताक़त कहाँ है? और सच कहूँ तो मैं हमेशा सोचता था — जो बात मुझे पता है, वो शायद तेरे लिए खतरनाक है।"

रवि ने उसका हाथ छोड़ दिया और अपनी जेब से घड़ी निकाली। उसने घड़ी को हथेली पर रखा और देर तक देखा। लुट्टन भी उसे देख रहा था।

तभी घड़ी के काँच पर कुछ चमका। रवि ने आँखें सिकोड़कर देखा। काँच पर छोटे-छोटे अक्षर उभर रहे थे, जैसे कोई अंदर से लिख रहा हो।

"अगला मिशन," रवि ने धीरे से पढ़ा, "उस आदमी को ढूँढो जो तेरे पापा की मौत के वक़्त दुकान पर था। इनाम: एक हज़ार पॉइंट।"

लुट्टन ने पूछा, "क्या लिखा है?"

रवि ने जवाब नहीं दिया। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। क्योंकि उस रात दुकान पर जो आदमी था — वो मुन्ना भाई था। मुन्ना भाई, जो अब शहर में कहीं नहीं है।

॥

लुट्टन ने उसका हाथ पकड़कर हिलाया। "रवि! क्या हुआ? क्या लिखा है घड़ी पर?"

रवि ने घड़ी को मुट्ठी में बंद कर लिया। मुँह सूख रहा था, जैसे किसी ने उसके अंदर का सारा पानी खींच लिया हो। वो उठा, बेंच से टकराया, गिलास हिल गया, और वो बिना एक शब्द कहे सीढ़ी की तरफ़ बढ़ गया।

"अरे, कहाँ जा रहा है? रुक तो!"

"लुट्टन, तू घर जा।" रवि की आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी और का गला हो। "प्लीज, आज कुछ मत पूछ।"

वो छत पर पहुँचा। रात की हवा गरम थी, पर उसके शरीर में ठंडक भर गई थी। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे, और नीचे गली में किसी के बर्तन माँजने की आवाज़ आ रही थी। वो चारपाई पर बैठ गया और घड़ी को हथेली पर रखकर घुमाने लगा।

"तू क्या है?" उसने धीरे से पूछा। होंठ काँप रहे थे। "सच-सच बता। मैं अब और नहीं सह सकता। तू क्या है?"

चुप्पी।

"बोल ना!" रवि की आवाज़ फट गई। "तू रोज़ नया मिशन देता है, नए पॉइंट, नई बातें। पर तू क्या है, ये कभी नहीं बताया। तू पापा की घड़ी है या कोई जिन्न है या… मेरे दिमाग़ का खेल?"

घड़ी के काँच के पीछे हल्की नीली रोशनी फैली। फिर वो आवाज़ आई — छोटी, चटपटी, पर आज उसमें कुछ अलग था। जैसे कोई बूढ़ा आदमी बच्चे से बात कर रहा हो।

"मैं वो हूँ जो तेरे पापा ने छोड़ा था।"

रवि का साँस रुक गया। उसने घड़ी को आँखों के सामने उठाया। "पापा ने छोड़ा था? तो मुझे दस साल बाद क्यों मिला? दस साल! मैं बच्चा था तब। माँ ज़मीन पर गिरी थी, मैं रोता रहा, और तू कहाँ था?"

काँच पर रोशनी धीमी हुई, फिर फिर जली।

"जो चीज़ मुँह माँगी नहीं मिलती, वो वक़्त आने पर खुद मिलती है।"

"ये कोई जवाब हुआ?" रवि ने घड़ी को ज़ोर से पकड़ा। "मेरे पापा को किसने मारा? तू जानता है ना? तू सब जानता है!"

पर इस बार काँच खाली रहा। रोशनी बुझ गई। बस एक लाइन उभरी — "मिशन जारी है।"

रवि देर तक वहीं बैठा रहा। आसमान धीरे-धीरे हल्का होने लगा। नीचे गली में अज़ान की आवाज़ आई, फिर चप्पलों की खड़खड़ाहट, फिर किसी के ज़ोर से थूकने की आवाज़। शहर उठ रहा था, और रवि के अंदर एक ही बात चल रही थी।

उस आदमी को ढूँढो जो उस रात दुकान पर था।

वो उठा। पीछे की गली की तरफ़ चल पड़ा। सुबह की पहली किरण दीवारों पर पड़ रही थी, जहाँ चूने की पपड़ी उखड़ी थी और नीचे गीली मिट्टी में बकरियों के पैरों के निशान थे। वो जगह पर पहुँचा जहाँ मुन्ना भाई रात को लेटते थे — एक पुराने पीपल के नीचे, टूटे पत्थर के पास।

वहाँ कोई नहीं था।

रवि का दिल एक बार ज़ोर से धड़का। उसने चारों तरफ़ देखा। पत्थर पर धूल थी, जैसे कुछ घसीटा गया हो। मिट्टी में बाइक के पहिये का एक गहरा निशान था, जो गली से आकर यहीं रुका था और फिर उल्टा मुड़ गया था।

फिर उसकी नज़र पत्थर के नीचे दबी एक चीज़ पर पड़ी। उसने झुककर उसे निकाला।

एक पुरानी तुलसी की माला। दाने घिसे हुए, धागा चार जगह से गाँठा हुआ। यही माला मुन्ना भाई के गले में हमेशा रहती थी। रवि ने माला को हथेली में रखा। वो अभी भी हल्की गरम थी।

माला के साथ एक काग़ज़ का टुकड़ा था — फटा हुआ, कोने से आधा। ऊपर कुछ छपाई थी, पुरानी छपाई, जैसे कोई मशीन से लिखा हो। रवि ने आँखें सिकोड़कर पढ़ा।

"सेवा सदन — तिजोरी नंबर…"

आगे का हिस्सा फटा हुआ था। उँगली से छूने पर काग़ज़ चूरा-चूरा होने लगा, जैसे बहुत पुराना हो।

रवि ने माला अपनी जेब में डाली और काग़ज़ को सँभालकर रुमाल में लपेट लिया। उसका गला सूख रहा था। मुन्ना भाई ने कल कहा था — "कल सुबह पीछे वाली गली में मिलना। मैं तुझे वो बताऊँगा जो मैंने उस रात देखा था।"

और अब वो गायब था।

रवि लौटकर दुकान पर आया। शटर आधा उठा हुआ था। अंदर लुट्टन बैठा था, दोनों हाथों में सिर रखे। जैसे ही रवि अंदर आया, वो उठ खड़ा हुआ।

"तू कहाँ चला गया था?" लुट्टन की आवाज़ में पहली बार डर था, मज़ाक नहीं। "मैं यहाँ बैठा था, तभी…"

"क्या हुआ?"

"एक दुबला आदमी आया था। काले कपड़े, मुँह पर कुछ बँधा हुआ।" लुट्टन ने पान थूका, पर हाथ काँप रहा था। "वो सीधे मुन्ना भाई के पास गया, जो सामने पेड़ के नीचे बैठा था। उसने उसका हाथ पकड़ा और कहा…"

लुट्टन रुक गया। पानी माँगने की ज़रूरत नहीं थी, उसका गला ख़ुद सूख रहा था।

"कहा क्या?" रवि ने उसका कंधा पकड़ा।

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