A Dark Secret – Chapter 97
मुझे पता ही नहीं चला कि वो कब आईं। उनका हाथ मेरे कंधे पर था, ऐसा जैसे कोई लोहे का शिकंजा लगा हो, और उनकी आँखें मेरी आँखों से उतनी ही कड़ी थीं।
"दीदी, हटो।"
"नहीं।"
"दीदी, वो अभी गया है। दो मिनट पहले। अगर मैं जल्दी करूँ तो —"
"तो क्या?" उन्होंने मेरा हाथ नहीं छोड़ा। "तो उस अंधेरे में तू अकेला जाएगा, और वो तुझे नाली के मोड़ पर इंतज़ार करता मिलेगा? उसने तुझे देखकर सिर हिलाया, अर्जुन। सिर हिलाया। मतलब उसने तुझे बुलाया।"
"दीदी —"
"मैंने एक बार ये अनदेखा किया था," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार टूटी। "एक बार। मेरे घरवाले ने कहा था, रात में उस रास्ते मत जाओ, और मैंने अनदेखा किया। अब मेरे घर में सिर्फ़ मैं बची हूँ और एक हिसाब की कॉपी। मैं इसे दोबारा नहीं करूँगी। चाहे जिसका बेटा हो।"
मैं चुप हो गया।
रात की हवा में सिर्फ़ नाली का पानी बोल रहा था।
"दीदी," मैंने धीमे से कहा, "अगर मैं आज नहीं गया, तो कल ये हाथ और मज़बूत हो जाएगा।"
"तो कल जा, पर अकेला नहीं।"
"किसके साथ? जुगनू?"
"जुगनू को तू साँस लेने के लिए रखता है या गवाही के लिए?" उन्होंने कहा, और जुगनू ने तुरंत अपना सिर नीचे कर लिया। "ये ग्यारह बरस का है, अर्जुन। अभी इसके हाथ में कोई पकड़कर देना है तो मेरा चमच दे दे।"
"तो क्या करूँ?"
"आज रुक।" उन्होंने मेरा हाथ छोड़ा, पर उनकी आवाज़ नहीं छोड़ी। "रुकने में शर्म नहीं है। शर्म ये है कि तू उसी रात मर जाए और तेरी अम्मा को किसी और के मुँह से पता चले।"
मेरे भीतर कुछ ढीला पड़ गया। वो ढीलापन जो डर के बाद आता है, जब शरीर को पता चलता है कि कोई उसे रोकने वाला मौजूद है।
"ठीक है," मैंने कहा।
रुक्मा ने मुझे घूरा।
"ठीक है?"
"ठीक है। आज नहीं।"
उन्होंने मेरे चेहरे को देखा, जैसे किसी सब्ज़ी को हथेली पर रखकर तौल रही हों।
"अच्छा," उन्होंने कहा, और फिर जुगनू की तरफ़ मुड़ीं। "तू अंदर जा। ढाबे के पीछे, नीम के नीचे। और जब तक मैं न बुलाऊँ, बाहर नहीं आएगा।"
"दीदी —"
"अंदर।"
जुगनू चला गया, पर जाते-जाते उसने एक बार पीछे देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो बड़ों की आँखों में नहीं होती। सच।
जब वो गया, मैं ट्रक के पास लौटा। दीदी मेरे पीछे आईं।
"देख," मैंने कहा, और टॉर्च जलाकर पाइप पर रखी। "ये घिसा हुआ नहीं है।"
उन्होंने झुककर देखा। मुझे लगा वो ज़्यादा नहीं देखेंगी। वो कमर पर हाथ रखकर खड़ी रहेंगी, ऐसा सोचा था।
पर वो झुकीं। बहुत करीब झुकीं। उनका गुच्छा झुका, चाबियाँ बजीं।
"ये कटा है," उन्होंने कहा।
मैंने उन्हें देखा।
"तुम्हें कैसे पता?"
"मेरे घर में," उन्होंने धीमे से कहा, "एक गाड़ी के पीछे का पहिया रखा है। तीन जगह से कटा हुआ। मैंने उसे फेंका नहीं। मैंने उसे अपने हाथ से धोया और उसे देखा। कटा हुआ धातु ऐसा ही दिखता है। बिल्कुल ऐसा ही।"
नाली का पानी बहता रहा।
"यही कट है," मैंने कहा। "मोती की केबल पर भी यही था।"
"तो मतलब दोनों एक ही आदमी —"
"एक ही हाथ," मैंने कहा।
उन्होंने अपनी आँखें सिकोड़ीं, और उनके चेहरे पर वो शांति आई जो उनके चेहरे पर सबसे डरावनी लगती है।
"अर्जुन," उन्होंने कहा, "इस ट्रक को रात में यहाँ खड़ा रहने देना बंद कर।"
"तो कहाँ रखूँ?"
"मेरे आँगन में।" उन्होंने अपने ढाबे की तरफ़ सिर हिलाया। "मेरे पीछे वाली जगह में। वहाँ सड़क नहीं है, वहाँ चार दीवार है। जो आदमी चार दीवार फांदेगा, उसके पैर में चूड़ी के टुकड़े चुभेंगे। मैंने वहाँ काँच बिछा रखा है।"
"दीदी —"
"बहाना मत बना। मैं सुबह से तेरे पीछे नहीं घूम रही। मैं बस तेरा ट्रक नहीं देखना चाहती जलता हुआ। एक बार देख चुकी हूँ।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"अभी नहीं," उन्होंने कहा। "सुबह। चार बजे। मगर की आवाज़ से पहले। तब कोई नहीं देखता।"
मैंने सिर हिलाया।
फिर मैंने अपनी जेब से कॉपी निकाली।
वो सिली हुई कॉपी, जिसके पन्ने मैंने खुद सिले थे, जिस पर मैं हर गाड़ी की आवाज़ लिखता हूँ, हर काम, हर रकम, हर तारीख़। मेरी माँ कहती है कि जो लिखा जाता है वो भूलता नहीं, और जो भूलता नहीं वो डरता नहीं।
मैंने रुक्मा दीदी के सामने, ट्रक के बोनट पर कॉपी रखी और कलम निकाली।
"क्या कर रहा है?"
"लिख रहा हूँ।"
"क्या?"
"आज की रात।" मैंने लिखा — सत्ताईस से आगे एक और रात। पीला ट्रक। ब्रेक पाइप। कटा हुआ, घिसा नहीं। नट खुला, आधा बंद। टिन की प्लेट में तरल। चाबी ज़मीन पर। पीछे के पहिये के पास ताज़ा पान की पीक और चप्पल की एड़ी। काले धागे वाला आदमी। नाली की तरफ़। रुका। पीछे देखा। सिर हिलाया।
"इतना सब याद है तुझे?" दीदी ने पूछा।
"मुझे आवाज़ें याद रहती हैं," मैंने कहा। "बाकी चीज़ें काग़ज़ पर लिखनी पड़ती हैं। काग़ज़ मरता नहीं।"
मैंने कलम रोकी। फिर एक आख़िरी लाइन लिखी।
दस या बारह शब्द।
"वो क्या लिखा?" दीदी ने पूछा।
मैंने कॉपी बंद की।
"अब से," मैंने कहा, "मैं सिर्फ़ सुनूँगा नहीं।"
"तो?"
"जवाब दूँगा।"
दीदी ने मेरी तरफ़ देखा। रात में उनका चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था, पर मुझे पता था कि वो मुस्कुरा नहीं रही थीं। वो शायद कोई दुआ पढ़ रही थीं, या कोई गाली। दोनों एक जैसी सुनाई देती हैं, जब कोई औरत अपने घर के मर्दों को बचाने की कोशिश कर रही हो।
"जवाब देने वाले बहुत आए हैं इस शहर में," उन्होंने कहा। "और सब यहीं पड़े हैं। नाले के किनारे।"
"तो मुझे नाले के किनारे नहीं पड़ना, दीदी।"
"तो फिर कहाँ?"
"काग़ज़ पर।" मैंने कॉपी उठाई। "अदालत में। मंच पर। जहाँ सब देख सकें।"
उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस मेरी कॉपी की तरफ़ देखा, जैसे उन्होंने उसमें कुछ ऐसा देखा हो जो मुझे अभी दिख नहीं रहा था।
फिर वो पलटीं और ढाबे की तरफ़ चल दीं।
"चाय रखी है," उन्होंने पीठ फेरकर कहा। "ठंडी हो जाएगी तो तू खुद बनाएगा।"
मैं हँस पड़ा। पहली बार उस रात।
मैं ट्रक के पास खड़ा रहा और मैंने पाइप को आख़िरी बार देखा। टॉर्च की रोशनी में वो कट बहुत छोटा लग रहा था। इतना छोटा कि कोई कहे, ये तो कुछ नहीं है भाई। ये तो पुराना है।
पर मैं जानता था।
जो चीज़ आदमी को मारती है, वो हमेशा छोटी होती है। एक कटा तार। एक ढीला नट। एक बंद आँख। एक बार का अनदेखा किया हुआ फ़ोन। एक चाय जो ठंडी नहीं होने दी गई।
मैंने टॉर्च बंद की और आसमान की तरफ़ देखा। सुबह होने में अभी देर थी।
तभी मुझे पीछे से आवाज़ आई।
"भैया!"
जुगनू। फिर से। ढाबे की तरफ़ से दौड़ता हुआ, पर इस बार उसके हाथ में कुछ था। एक टिन का गिलास। दीदी ने भेजा होगा।
पर उसका चेहरा वैसा नहीं था जैसा चाय लाने वाले का होता है।
वो मेरे पास आया और मेरी कमीज़ पकड़ ली।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"भैया, मैंने सोचा था।" उसकी साँस फूल रही थी। "जब मैं दीवार के पीछे छिपा था, तब मैंने सिर्फ़ माला नहीं देखी थी।"
"तो और क्या देखा?"
"उसके हाथ में," जुगनू ने कहा, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी हो गई कि मुझे झुककर सुनना पड़ा।
"क्या था?"
वो काँपने लगा। दीदी ने उसे अंदर भेजा था, पर वो भागकर बाहर आया था, सिर्फ़ इसलिए कि ये बात उसके भीतर नहीं रुक रही थी।
"बोल ना, जुगनू।"
उसने गला साफ़ किया।
"काले धागे वाले के हाथ में चलती प्लायर चमक रही थी।"
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