A Dark Secret – Chapter 98
जुगनू की बात सुनकर मैं कुछ देर चुप खड़ा रहा। टॉर्च हाथ में थी, बंद थी। अंधेरे में मुझे अपनी साँस सुनाई दे रही थी, और दूर कहीं टोल की तरफ़ कोई गाड़ी हॉर्न बजाकर चली गई।
"किस हाथ में?" मैंने पूछा।
"दाएँ हाथ में, भैया।" जुगनू ने अपना दायाँ हाथ ऊपर किया, जैसे स्कूल में जवाब दे रहा हो। "और प्लायर खुली थी। चल रही थी। ऐसी आवाज़ कर रही थी… ठक… ठक… ठक।"
"वो आवाज़ मुझे पता है," मैंने कहा।
"मुझे भी। अब पता है।"
उसकी आवाज़ में जो डर था, वो बच्चे का डर नहीं था। वो उस आदमी का डर था, जिसने पहली बार देख लिया हो कि दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो तार काटने से पहले आसपास नहीं देखते।
मैंने टिन का गिलास उसके हाथ से लिया। चाय अब गुनगुनी थी। मैंने एक घूँट पी और गिलास उसे वापस पकड़ा दिया।
"पी ले," मैंने कहा। "और सुन। तूने जो देखा, वो किसी को नहीं बताना। दीदी को भी नहीं। मैं खुद बताऊँगा।"
"भैया, वो मुझे देख लेगा तो?"
"नहीं देखेगा।"
"कैसे पता?"
"क्योंकि वो अब भी ये सोच रहा है कि उस रात उसे कोई नहीं देख रहा था।" मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "और तू अब से उसके सामने नहीं आएगा। तेरा काम सिर्फ़ देखना है, दिखना नहीं। समझा?"
उसने सिर हिलाया, पर उसका हाथ कमीज़ से नहीं छूटा।
"एक बात और," मैंने कहा। "तूने कहा, वो नाली के मोड़ पर रुका और ट्रक की तरफ़ देखा। फिर सिर हिलाया। कैसे हिलाया? ऊपर-नीचे, या दाएँ-बाएँ?"
जुगनू ने याद करने के लिए आँखें बंद कीं। ग्यारह बरस का लड़का, और उसकी याददाश्त किसी मुनीम की कॉपी जैसी।
"पहले ऊपर-नीचे," उसने कहा। "फिर वो हँसा। मुँह से आवाज़ नहीं आई, पर दाँत दिखे। और फिर वो हाथ में प्लायर को ऐसे घुमाया जैसे कोई चाबी घुमाता है।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा उतर गया।
वो सिर नहीं हिला रहा था। वो गिन रहा था। वो हमें बता रहा था कि उसने सब देख लिया है, और अब वो अपना हिसाब पूरा करके जा रहा है।
"अब सुन," मैंने कहा। "हमारे पास सुबह चार बजे तक का वक़्त है। और ये गाड़ी यहाँ नहीं रह सकती।"
जुगनू ने ट्रक की तरफ़ देखा। उसका चेहरा टॉर्च की पीली रोशनी में छोटा लग रहा था।
"ये चलेगी, भैया?"
"ये चलेगी," मैंने कहा। "इसकी ब्रेक नहीं है, ये बात अलग है।"
"तो?"
"तो पहले ब्रेक बनाऊँगा। फिर चलाऊँगा।"
मैंने औज़ारों का थैला खोला। अंदर सब कुछ वैसा ही था जैसा पापा ने छोड़ा था — दो नंबर का पाना, जिसके हैंडल पर तार लिपटा था, चार रिंच का सेट, जिसमें एक रिंच कम था, जला हुआ छोटा हथौड़ा, घिसी नोक वाली स्क्रू ड्राइवर, और वो पुलर जो पापा ने अपने हाथ से बनाया था। मैंने उन्हें छुआ नहीं, बस देखा। फिर थैले के नीचे से ब्रेक के तरल की आधी बोतल निकाली, जो मैंने कबीर की दुकान से साठ रुपये में ली थी।
मैं ट्रक के नीचे लेटा।
कटा हुआ पाइप मेरी आँखों के ठीक ऊपर था। छोटा, साफ़, चमकीला कट। जिस आदमी ने ये किया, उसने जल्दी नहीं की थी। उसने आराम से प्लायर लगाया, दबाया, और काट दिया — जैसे कोई रस्सी काटता है।
मैंने कट से चार अंगुल ऊपर पाइप काटा, सिरा मोड़ा, और उसी पीतल के नट से दबाकर बंद किया जो मेरी जेब में था। फिर तरल भरा।
"जुगनू, नीचे आ।"
वो घुटनों के बल आया।
"ये वाला पाइप देख रहा है? जब मैं पैडल दबाऊँगा, तू इस जोड़ पर हाथ रखेगा। अगर तेल की बूँद भी दिखे, तो चिल्लाना।"
"और अगर न दिखे?"
"तो हम चलेंगे।"
"भैया, क्या ये सच में ठीक हो गई?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो सच में पूछ रहा था, डर से नहीं, जानने के लिए।
"नहीं," मैंने सच कहा। "ये पूरी ठीक नहीं हुई। मैंने सिर्फ़ एक रास्ता बंद किया है। ये गाड़ी अब रुकेगी, पर मुझे इस पर भरोसा नहीं है। इसीलिए हम रफ़्तार नहीं बढ़ाएँगे। पहली गियर। बस। समझा?"
"समझा।"
"और एक बात।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। "अगर मैं कहूँ रुक जा, तो तू बीच में से हट जाना। गाड़ी के आगे नहीं आना।"
उसने सिर हिलाया।
हमने पीछे के पहियों के आगे ईंटें रखीं, फिर धीरे-धीरे हटाईं।
मैं केबिन में चढ़ा। सीट पर बैठते ही वो गंध आई — पुरानी चमड़े की, डीज़ल की, और उस सूखे रंग की जो अब भी मेरे हाथों में लगी थी। चाबी घुमाई। पहली बार में इंजन नहीं उठा। दूसरी बार में उसने खाँसी जैसी आवाज़ की — खर्र… खर्र… — और फिर बैठ गया।
मैंने उस आवाज़ को सुना।
पीले ट्रक की अपनी आवाज़ है। मैंने इसे पहले भी सुना था, पर आज वो अलग थी। आज वो थकी हुई थी। जैसे कोई बूढ़ा आदमी सुबह उठकर कहे, आज नहीं भाई, आज मत चलाओ।
"बस थोड़ी दूर," मैंने धीरे से कहा। किसी को सुनाने के लिए नहीं कहा था। "थोड़ी दूर और, बूढ़े। फिर तू आराम कर।"
जुगनू आगे-आगे चला, टॉर्च नीचे ज़मीन पर रखकर। मैंने गाड़ी पहली गियर में आगे बढ़ाई।
टोल के पीछे की गलियाँ पतली हैं। एक तरफ़ टिन की दीवारें, दूसरी तरफ़ नाली। बीच में सिर्फ़ इतनी जगह कि एक ट्रक निकल जाए और उसके दोनों तरफ़ एक-एक हाथ बचे। रात के तीन बजे वहाँ कुत्ते सोए थे, एक आदमी खुली चारपाई पर मुँह ढाँपकर सो रहा था, और एक जगह किसी ने ईंटों का ढेर लगा रखा था।
जुगनू ईंटें हटाता, फिर हाथ उठाकर इशारा करता — आ जाओ।
गाड़ी के पीछे का पत्ता चरमराता रहा। कहीं-कहीं धातु घिसती, जैसे कोई बच्चा नाखून किसी लोहे की मेज़ पर खींच रहा हो। और एक जगह दरवाज़े के अंदर कोई ढीला नट था, जो हर गड्ढे पर ठन-ठन करता।
मैं हर आवाज़ सुन रहा था। यही मेरा काम है। मुझे कोई ये नहीं सिखा सका कि गाड़ी में कौन सा पुर्ज़ा खराब है — मैंने खुद सीखा, गराज में लेटकर, रातों में, पापा की सीट के नीचे पड़े औज़ारों से।
और आज वही आवाज़ें मुझे बता रही थीं कि ये गाड़ी चलेगी, बस बहुत दूर नहीं।
पौने चार बजे हम रुक्मा दीदी के घर के पीछे वाली गली में पहुँचे। मैंने इंजन बंद किया। मेरे हाथ काँप रहे थे — मज़दूरी के नहीं, उस डर के बाद जो आदमी लड़ाई के बाद महसूस करता है।
जुगनू ने फाटक खटखटाया। दो बार। फिर तीन बार।
अंदर से लालटेन की रोशनी आई, और फिर दीदी की आवाज़।
"कौन?"
"मैं, दीदी। अर्जुन।"
कुंडी खुली।
रुक्मा दीदी सफ़ेद सूती साड़ी में थीं, सिर पर पल्ला, हाथ में लालटेन। उनके चेहरे पर नींद नहीं थी। लगता था वो सोई ही नहीं।
"आ गया," उन्होंने कहा। यह सवाल नहीं था।
"आ गया।"
उन्होंने लालटेन ऊपर उठाई और ट्रक की तरफ़ देखा। पीली गाड़ी अंधेरे में एक बड़े जानवर जैसी खड़ी थी, धूल से ढकी, एक हेडलाइट पर टेप लगी।
"अंदर ले आ," उन्होंने कहा। "आँगन में जगह है। पर सुन, आँगन में काँच बिछा है। मैंने बिछाया है। रात में कोई दीवार फाँदे तो पैर में चुभे।"
"तो मैं हटा दूँगा।"
"हटा दे। पर जो काँच उठाएगा, उसी के पैर में लगेगा। संभलकर।"
मैंने छत पर पड़ी जूट की बोरी उठाई और आँगन में बिछे काँच को बोरी से धकेलकर एक कोने में कर दिया। जुगनू टॉर्च लेकर खड़ा रहा। काँच की आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई दाँत पीस रहा हो।
फिर मैंने गाड़ी पीछे की तरफ़, धीरे-धीरे, आँगन में लाई। चारों तरफ़ चारदीवारी, ऊपर खुला आसमान, और टिन की एक छत जो सिर्फ़ एक कोने पर थी।
इंजन बंद किया। तब जाकर मैंने साँस ली।
दीदी ने लालटेन नीचे रखा और सीधे गाड़ी के पास चलीं।
"दिखा," उन्होंने कहा।
मैं समझ गया। मैंने टॉर्च जलाई और ट्रक के नीचे की तरफ़ रोशनी की।
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